संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  7 अगस्त : भले लोगों का एकाएक जाना लोगों का मन बड़ा दुखा गया
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 अगस्त : भले लोगों का एकाएक जाना लोगों का मन बड़ा दुखा गया
Date : 07-Aug-2019

एक पखवाड़े के भीतर दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की दो बड़ी महिला नेताओं का गुजर जाना दिल्ली की आंखों को गीला कर गया है। शीला दीक्षित के बाद सुषमा स्वराज। दोनों की सोच एकदम अलग, दोनों की पार्टियां एकदम अलग, लेकिन दोनों के व्यक्तित्व की कुछ बातें ऐसी रहीं कि जिन्हें लेकर पार्टियों के आर-पार, खेमों के आर-पार, राजनीति से बाहर के लोगों के बीच भी एक दुख दिखा, उनके लिए तारीफ दिखी, और लोग अच्छी बातें कहते दिखे। इन दोनों की सज्जनता से परे, काबिलीयत से परे, और कामयाब राजनीतिक करियर से परे इनके बीच बहुत सी और बातें एक सी नहीं रहीं, लेकिन दोनों की भलमनसाहत को लोग जिस तरह याद कर रहे हैं, उससे एक बात उभरकर आती है कि भले लोगों के बीच भलमनसाहत की थोड़ी सी कदर अभी बाकी है। और राजनीति महज ओछेपन का खेल नहीं रह गई है, और लोग अच्छी बातों का अब तक सम्मान करते हैं। 

यह बात कहना आज जरूरी इसलिए हो गया है कि राजनीति मुजरिमों से लद चुकी है, ओछापन एक लुभावना औजार हो गया है, नैतिकता की कोई जगह नहीं रह गई है, और ऐसे में कम संख्या में रह गए, अल्पसंख्यक बिरादरी की तरह एक बिरादरी बन गए भले लोगों को भी अच्छी तरह याद करना जरूरी है। चूंकि सत्ता से जुड़ा हुआ बहुत लंबा राजनीतिक जीवन आमतौर पर कुछ विवादों से घिर ही जाता है, इसलिए शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज दोनों के साथ कुछ अप्रिय बातें जुड़ी रहीं जिनकी चर्चा के बिना उनके व्यक्तित्व पर चर्चा अधूरी रहेगी। शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों में कुछ भ्रष्टाचार हुआ था, जिसकी सीधी जवाबदेही उन पर नहीं थी, लेकिन वह उनके कार्यकाल में जरूर हुआ था। इसी तरह सुषमा स्वराज के लंबे सत्ताकाल में कर्नाटक में खदानों के मालिक रेड्डी बंधुओं के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते उनकी तस्वीर से वे कभी नहीं उबर पाईं, और जैसे-जैसे रेड्डी बंधु जुर्म की दुनिया में शोहरत पाते रहे, सुषमा स्वराज तोहमत पाती रहीं। इसके अलावा एक और बात के लिए सुषमा स्वराज को याद किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। जब देश में कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री चुना था, उसके ठीक पहले संसद में सुषमा स्वराज ने अपने खुद के स्तर से खासे नीचे जाकर कहा था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी, जमीन पर सोने लगेंगी, और एक भिक्षुणी की जिंदगी गुजारेंगी। उनके यह कहने के बाद भी सोनिया को नेता चुना गया था, यह अलग बात है कि उन्होंने खुद यह फैसला लिया कि मनमोहन सिंह उनके मुकाबले बेहतर प्रधानमंत्री होंगे, और वे यह ओहदा मंजूर नहीं करेंगी। इसलिए सुषमा की बात पूरी होने का मौका नहीं आया। 

लेकिन इससे परे यह याद रखने की जरूरत है कि संसद के भीतर, संसद के बाहर, संयुक्त राष्ट्र संघ में, या दूसरे सार्वजनिक मंचों पर सुषमा स्वराज ने अपनी पार्टी की नीतियों पर चलते हुए अपने खुद के संघ के बुनियादी मूल्यों पर चलते हुए एक राजनीतिक और संसदीय शिष्टाचार कायम रखा, और उस बात के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। वे बहुत शानदार बोलने वाली थीं, संसद में भाजपा की अगुवाई करने में वे एक बहुत मजबूत नेता साबित हुईं, और जब तक मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना आसमान पर छा नहीं गई थी, ऐसा मानने वाले लोग कम नहीं थे कि एक दिन वे भाजपा की प्रधानमंत्री बन सकती हैं। मोदी एक अभूतपूर्व कद और विशाल अस्तित्व लेकर भाजपा की केन्द्रीय राजनीति में पहुंचे, और भाजपा के तब तक के तमाम राष्ट्रीय नेता एक-एक कर, धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए जिनमें सुषमा स्वराज भी शामिल थीं। पिछली मोदी सरकार के पांच बरस के कार्यकाल में वे अपने तमाम राजनीतिक जीवन के सबसे कमजोर दौर से गुजरीं, जब प्रधानमंत्री ही सारी विदेश नीति को तय कर रहे थे, उस पर अमल कर रहे थे, और सुषमा महज उनके एक सहायक के रूप में विदेश मंत्री के ओहदे पर बैठी हुई भर थीं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मोदी ने एक धूमकेतू की तरह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी, और उनके आभामंडल में किसी और की कोई गुंजाइश नहीं थी। बाद में अपनी सेहत के चलते वे खुद ही मोदी सरकार के दूसरे, और मौजूदा कार्यकाल में किनारे हो गई थीं, और सत्ता से रिटायर होने के बाद एक बरस भी वे नहीं गुजार पाईं, और सेहत उनका साथ छोड़ गई। एक वक्त था जब देश की भाजपा की राजनीति में सुषमा स्वराज बहुत बड़ा नाम बन चुकी थीं, और तब तक नरेन्द्र मोदी गुजरात से बाहर निकले भी नहीं थे। लेकिन राजनीति महज बरसों की गिनती नहीं होती है, वह किसी वक्त पर सत्ता पर काबिज रहने की सबसे अधिक काबिलीयत रखने का नाम भी होती है, और उसमें मोदी के मुकाबले और कोई भी नेता दूर-दूर तक नहीं टिक पाए थे, लेकिन फिर भी सुषमा ने एक सहायक की भूमिका में भी पांच बरस गुजारते हुए दुनिया भर के हिन्दुस्तानियों की मदद करने, भारत आकर इलाज करवाने के लिए पाकिस्तान सहित बाकी पड़ोसी देशों के मरीजों की मदद करने का जो काम किया है, उसे लोग हमेशा याद रखेंगे। शीला दीक्षित को भी डेढ़ दशक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए उसे एक बेहतर ढांचा देने के लिए याद रखा जाएगा, और राजनीति में ऊंचे आदर्शों पर चलने, भलमनसाहत कायम रखने के लिए भी याद रखा जाएगा। 

एकाएक दिल्ली में बसी हुई इन दो बड़ी नेताओं का जाना भारतीय राजनीति के केन्द्र में भलमनसाहत के घनत्व को एकाएक कम कर गया है। 
-सुनील कुमार

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