विचार / लेख

लोहिया ने कश्मीर पर तो यह भी कहा था
लोहिया ने कश्मीर पर तो यह भी कहा था
Date : 08-Aug-2019

सुदीप ठाकुर

डॉ. लोहिया अनुच्छेद 370 को भारत तथा पाकिस्तान के रिश्ते से जोडक़र देखते थे। वह यह भी मानते थे कि भारत और पाकिस्तान का महासंघ बन जाए तो कश्मीर का मसला स्वत: ही खत्म हो जाएगा। भारत पाकिस्तान के महासंघ की उनकी परिकल्पना अखंड हिंदू राष्ट्र की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की परिकल्पना से एकदम अलग थी।

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपने राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से जरूर की थी, लेकिन उनकी पहचान कांग्रेस खासतौर से प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कट्टर विरोधी के रूप में हुई। यह अलग बात है कि पंडित नेहरू ने युवा लोहिया की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें कांग्रेस के विदेश मामलों का प्रभार सौंपा था। स्वतंत्रता मिलने से पहले ही कांग्रेस से अलग हो चुके लोहिया को कभी सरकार में रहने का मौका नहीं मिला। 
डॉ. लोहिया सिर्फ एक बार 1963 में उप चुनाव में फर्रूखाबाद से लोकसभा के लिए चुने गए थे। मगर अपने अल्प संसदीय जीवन में ही उन्होंने संसद और देश की राजनीति में जो छाप छोड़ी, वैसा उदाहरण दूसरा और नहीं मिलता है। संसद के भीतर पंडित नेहरू तक अपने से तकरीब बीस साल छोटे लोहिया को डॉ. साहब कहकर संबोधित करते थे। हालांकि लोहिया के लोकसभा में रहते ही नेहरू का निधन हो गया था और उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। लोहिया का कांग्रेस विरोध इसके बाद भी जारी रहा। 
12 अक्तूबर, 1967 को लोहिया का 57 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। मगर पिछले 52 वर्षों में शायद ही संसद का कोई सत्र हो, जब किसी भाषण या संदर्भ के रूप में लोहिया का जिक्र न आता हो। ताजा मौका था संसद में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और इस राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेश में बांटने से संबंधित नरेंद्र मोदी की अगुआई और भाजपा के प्रभुत्व वाली एनडीए सरकार की घोषणा का। 
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने धारा (अनुच्छेद) 370 के संदर्भ में लोहिया का जिक्र किया। शाह ने कहा कि डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि धारा 370 को हटाए बिना कश्मीर का भारत में एकीकरण नहीं हो सकता। यह माना जा सकता है कि शाह ने अपने जन्म (22 अक्तूबर, 1964) से 41 दिन पहले यानी 11 सितंबर, 1964 को तीसरी लोकसभा में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पर डॉ. लोहिया का सदन में दिया गया भाषण जरूर पढ़ा होगा।
डॉ. लोहिया अनुच्छेद 370 को भारत तथा पाकिस्तान के रिश्ते से जोडक़र देखते थे। वह यह भी मानते थे कि भारत और पाकिस्तान का महासंघ बन जाए तो कश्मीर का मसला स्वत: ही खत्म हो जाएगा। भारत पाकिस्तान के महासंघ की उनकी परिकल्पना अखंड हिंदू राष्ट्र की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की परिकल्पना से एकदम अलग थी।
उन दिनों सर्वोदयी नेता भी कश्मीर मसले का हल करने का प्रयास कर रहे थे। पर लोहिया को उन पर भी भरोसा नहीं था। 
तो क्या कहा था लोहिया ने? उन्होंने कहा, ‘मैं याद दिला दूं लाल बहादुर शास्त्री को कि डाकू समस्या, जमीन समस्या, फिल्मी अश्लील पोस्टरों की समस्या, कोई भी सर्वोदय हल नहीं कर पाया। सिवाए इसके कि कुछ हो हल्ला मचा। कश्मीर के मामले में भी कहीं यही न हो करके रहे, क्योंकि शास्त्री जी पहले भी कमजोर थे और अब पहले से ज्यादा कमजोर हैं। ’ 
आगे उन्होंने कहा- ‘अगर जो दोष या पाप सत्रह साल पहले हुआ था, हिंदुस्तान और पाकिस्तान का, दोनों जगहों की जनता से, चाहे पूरा नहीं, छोटा-सा भी कदम उठाया जा सके, मामला सोचा जा सकता है और दिमाग में लचीलापन आ सकता है।  दिमाग लचीला बनाना चाहिए।’
जिस दौर में छप्पन इंच के सीने की बात की जाती हो, उसमें लोहिया जिस लचीलेपन की बात कर रहे थे, उसके बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता। तो क्या कहा लोहिया ने? उन्होंने कहा, ‘लेकिन लचीले दिमाग का यह मतलब नहीं होता कि एक जड़ता को छोडक़र दूसरी जड़ता को पकड़ लिया जाए। एक तरफ जड़ बन जाएं, कि कश्मीर हम किसी हालत में छोड़ेंगे नहीं, और दूसरी तरफ जड़ बन जाएं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का रिश्ता सुधारने के लिए हम कश्मीर को छोडऩे को तैयार हैं। लचीला दिमाग एक ही हो सकता कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का महासंघ बने तभी यह मसला हल किया जा सकता है और इसके ऊपर इधर, उधर बीच में कोई न कोई रास्ता निकाला जा सकता। वह काम है संघ बने।’
इतिहास यह सुविधा देता है कि आप उसमें से अपनी सुविधा से संदर्भों को काटकर अपने मतलब की बातें सामने रख दें। फिर भी यह तो पूछा ही जा सकता है कि लोहिया जिस महासंघ की बात कर रहे थे, वह आज की सरकार और सत्ताधारी पार्टी को स्वीकार्य होता? 
लोहिया ने कहा, ‘जो लोग यह कहते हैं कि राष्ट्रपति अयूब और पाकिस्तान की सरकार महासंघ के बारे में सोच विचार करने के लिए तैयार नहीं है, तो मैं खाली यह कह देना चाहता हूं कि सरकारों के सोच विचार के बाद भी किसी भले आदमी को बहुत ज्यादा जड़ नहीं रहना चाहिए। सरकारें बदलती रहती हैं। सरकारों के विचार बदलते रहते हैं। इसलिए महासंघ वाला यह विचार एक सही विचार है। इसमें से एक बात मैं साफ कर दूं। किसी भी हालत में महासंघ बनाने का जब हम विचार करते हैं, तो बहुत कुछ देने को हम तैयार नहीं हैं, यह मान लेना चाहिए। पाकिस्तान यह कहता है कि नये महासंघ के संविधान में, दो में से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दो में एक जब तक पाकिस्तान खुद न कहे कि इस अवस्था को बदल दो , पाकिस्तान का ही रहेगा- तो मैं इस बात को मानने के लिए तैयार हो जाऊंगा। इसके अलावा मैं यह भी कहना चाहता हूं कि अगर पल्टनी मामला, विदेश नीति का मामला और आने जाने के मामले में संबंध रहें, लेकिन नागरिकता के मामले में बिल्कुल पक्का संबंध रहना चाहिए और महासंघ का विषय कम से कम ऐसा होना चाहिए, नागरिकता का, जैसे आज हिंदुस्तान की नागरिकता और पाकिस्तान की नागरिकता अलग अलग है, तो यह एक नागरिकता एक हो जानी चाहिए। इस पर मैं जोर दूंगा और बाकी चीजों के ऊपर ढीला ढाला महासंघ बनाने को तैयार रहेंगे।’
गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा और लोकसभा दोनों ही सदनों में बार बार यह दोहराया कि धारा (अनुच्छेद) 370 से सिर्फ तीन परिवारों को फायदा हुआ। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन समझा जा सकता है कि उनका इशारा अब्दुल्ला, मुफ्ती और संभवत: गांधी-नेहरू परिवार की ओर था। मुफ्ती परिवार के साथ उनकी अपनी पार्टी के रिश्ते अधिक पुराने नहीं हुए हैं, जब दोनों ने मिलकर जम्मू-कश्मीर में सरकार चलाई थी। वहीं अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार का हिस्सा थी। 
अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने से पहले ही उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को नजरबंद कर दिया गया था और अब भी वे हिरासत में हैं। राम मनोहर लोहिया जब सांसद बने थे, उस दौरान उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला जेल में थे। एक अप्रैल, 1964 को शेख अब्दुल्ला की रिहाई को लेकर जब लोकसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लाया गया था, तो डॉ. लोहिया ने उसका समर्थन किया था। इसके दो दिन बाद तीन अप्रैल, 1964 को जब पूर्वी बंगाल में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर एक प्रस्ताव आया था, तो इस पर अपनी बात रखते हुए लोहिया ने यह भी कहा था, ‘मैं शेख अब्दुल्ला की रिहाई के बारे में भी कहना चाहता हूं। शायद मैं पहला व्यक्ति हूं, जो पिछले कई बरसों से शेख जी की रिहाई की बात कर रहा हूं। 
लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि मैंने अपना कर्तव्य निभा दिया और अब मैं शेख जी को एक सलाह देना चाहता हूं। पहले भी दी थी कि वह गद्दी की तरफ निगाह न रखें, लोगों की तरफ निगाह रखें। वह कोशिश करें कि अब जो भी उनका समय बाकी रह गया है उसमें वह हिंदू-मुस्लिम और हिंद-पाकिस्तान के रिश्ते सुधारें।’
राम मनोहर लोहिया संवाद और लचीलेपन के साथ ही लोकतांत्रिक परंपराओं पर यकीन करते थे। हम स्वीकार करें या न करें, उन्हें पंडित नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री दोनों ने ही, जिनके प्रधानमंत्री रहते लोहिया संसद में रहे, उन्हें पूरा सम्मान दिया। यदि राम मनोहर लोहिया आज होते, तो सबसे पहले वह जम्मू-कश्मीर के नेताओं की रिहाई की मांग करते, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
( राम मनोहर लोहिया के संसद में दिए गए भाषण लोकसभा में लोहिया के नाम से 1972 में संकलित किए गए थे। इनका संपादन बदरीविशाल पित्ती, अध्यात्म त्रिपाठी और ओमप्रकाश निर्मल ने किया था)

 

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