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क्या जम्मू-कश्मीर का संवैधानिक दर्जा घटाना विश्वासघात है?
क्या जम्मू-कश्मीर का संवैधानिक दर्जा घटाना विश्वासघात है?
Date : 09-Aug-2019

-संदीप पाण्डेय
भारत सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 व उसकी धारा 35-ए को कमजोर करने की कोशिश जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ विश्वासघात माना जाएगा। संविधान के ये प्रावधान कश्मीर के भारत में विलय के समय हुए समझौते के आधार पर भारत और कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह के बीच बने थे। जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा उस समझौते की आत्मा है जिसके आधार पर जम्मू-कश्मीर भारत के साथ मिलने को तैयार हुआ था। वहां के लोग भारत के साथ ही रहना चाहते थे, यह जम्मू-कश्मीर के संविधान में उल्लिखित इस बात से ही स्पष्ट है कि 'जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।'
 यह बात भारत के संविधान में भी नहीं लिखी गई है, लेकिन एक अभियान चलाकर जम्मू-कश्मीर को बदनाम किया गया, मानों विशेष दर्जे के कारण उसे कोई अतिरिक्त सुविधा मिल रही हो। हकीकत तो यह है कि सरकारों की नीतियों के कारण जम्मू-कश्मीर के साथ हुए समझौते के कई प्रावधानों की अवहेलना हुई है और नतीजे में वह लगातार अस्थिरता व हिंसा का शिकार समस्याग्रस्त राज्य बन गया है। संविधान के अनुच्छेद 370 व 35-ए के साथ जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं और इनके साथ छेड़छाड़ यहां के लोगों में भारत सरकार के खिलाफ  और अधिक अलगाव पैदा करेगा जिससे परिस्थितियां और बिगडेंग़ी।
जम्मू-कश्मीर के धार्मिक आधार पर दो टुकड़े कर और उन्हें केन्द्र शासित क्षेत्र का दर्जा देना हास्यास्पद व वहां के लोगों के साथ क्रूर मजाक है। भारत में कई जगहों पर जनता छोटे राज्यों की मांग कर रही है। मसलन-उत्तरप्रदेश में मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य को चार छोटे राज्यों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित है।  महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की पृथक राज्य की पुरानी मांग है, उत्तर कर्नाटक की पृथक राज्य की मांग है। इन मांगों को अनदेखा कर जम्मू-कश्मीर पर विभाजन थोपना गैर-लोकतांत्रिक है। राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर उसे सामान्य राज्य के भी दर्जे से वंचित कर एक केन्द्र शासित क्षेत्र बना देना सत्ता के विकेन्द्रीकरण की मान्यता के ठीक विपरीत है। देश के अन्य केन्द्र शासित क्षेत्रों द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त करने और दिल्ली जैसे प्रदेश द्वारा पूर्ण राज्य की मांग के आंदोलन इस निर्णय से प्रभावित होंगे। साफ  है कि केन्द्र नहीं चाहता कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाल हो। वह उसे लकवाग्रस्त और केन्द्र पर आश्रित राज्य ही बनाए रखना चाहता है ताकि जब चाहे वहां मनमानी की जा सके। जम्मू-कश्मीर में जो किया जा रहा है वह सत्ता का केन्द्रीयकरण है जिसके परिणाम हमेशा बुरे होते हैं।
कश्मीर में सेना व अद्र्धसैनिक बलों की लगातार उपस्थिति से हालात कभी सामान्य नहीं हुए। उल्टे मानवाधिकार उल्लंघन की कई घटनाएं हुईं जिससे आम जन का भारत सरकार से मोह भंग भी हुआ। हाल के वर्षों में छर्रे वाली बंदूकों का इस्तेमाल तो निर्दयता की हद है। क्या भारत सरकार इस किस्म के हथियारों का प्रयोग देश के किसी भी अन्य हिस्से में किन्हीं प्रदर्शनकारियों के खिलाफ  करेगी? यह दिखाता है कि कश्मीर के लोगों के साथ हमेशा भेदभाव हुआ है और जबाव में उन्होंने अपने साथ होने वाले अत्याचारों को सहन ही किया है।
ऐसे में जम्मू-कश्मीर के लोग जब स्वायत्तता की बात करते हैं तो केन्द्र सरकार उनका दमन करती है। वह उन्हें स्वायत्ता भी देने को तैयार नहीं होती। आखिर स्वायतत्ता कौन नहीं चाहता? जो विशेष दर्जा जम्मू-कश्मीर को मिला है वह तो हरेक राज्य को मिलना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के अलावा दस अन्य राज्यों के लिए भी अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधान किए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 243 के अंतर्गत ग्रामसभा के स्तर पर भी स्वशासन की कल्पना है। पूर्व में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहां राज्यों ने अपनी स्वायत्तता का अहसास कराया है। राबड़ी देवी व ममता बैनर्जी जैसी मुख्यमंत्रियों ने अपने को प्रधानमंत्री के आधीन मानने से इंकार किया है।
 कर्नाटक की हाल की सिद्दारमैया सरकार ने राज्य का अलग झंडा बना लिया था और जम्मू व कश्मीर के बाद वह दूसरा ऐसा राज्य बन गया था। नगालैंड भी अलग संविधान व झंडे की मांग कर रहा है। वह भारत की आधीनता की बजाए भारत के साथ सह-अस्तित्व चाहता है। तमिलनाडु की सरकार 'राष्ट्रीय शिक्षा नीतिÓ के 'त्रिभाषा फार्मूलेÓ की बजाए अपने हिन्दी विरोध के कारण सिर्फ  'दो-भाषा फार्मूलाÓ मानती है। क्या ऐसे निर्णयों से देश की एकता और अखंडता खतरे में पड़ जाती है? फिर हम जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता की चाहत को लेकर इतना परेशान क्यों होते हैं? इस देश में ऐसे भी लोग हैं जो देश के कानूनों की खुले आम धज्जियां उड़ाते हैं और सरकारें उनका साथ देती हैं क्योंकि वे सत्ता से जुड़े होते हैं। 
जम्मू-कश्मीर के साथ संवैधानिक व भौतिक दोनों ही प्रकार की छेड़छाड़ जम्मू व कश्मीर व भारत दोनों के लिए ठीक नहीं है। जम्मू व कश्मीर में पूर्व की स्थिति को बहाल किया जाना चाहिए, तुरंत चुनाव कराए जाने चाहिए, सुरक्षा बलों को जम्मू व कश्मीर के अंदरुनी इलाकों से हटाया जाना चाहिए। कश्मीर के लोगों, संगठनों व राजनीतिक दलों के साथ बातचीत कर ऐसा हल निकाला जाना चाहिए जिससे जम्मू व कश्मीर में परिस्थितियां सामान्य हो सकें। (सप्रेस)
(लेखक विकास और शिक्षा के मुद्दों पर लिखते हैं तथा मेगसेसे अवार्ड से सम्मानित हैं।)

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