संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  10 अगस्त : मीडिया के नाम से काम कर रहे लोगों को पारदर्शी रहना चाहिए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 10 अगस्त : मीडिया के नाम से काम कर रहे लोगों को पारदर्शी रहना चाहिए
Date : 10-Aug-2019

अभी जब कश्मीर को केन्द्र सरकार ने केन्द्र शासित प्रदेश बनाया है, और देश भर के गैरकश्मीरी लोगों में से एक बड़े तबके के लोग इस पर सोशल मीडिया में गंदी बातें लिख रहे हैं, तो कुछ लोगों ने यह बात भी लिखी है कि किस तरह देश के मीडिया के नामी-गिरामी चेहरे इन बातों को अनदेखा कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे ही चर्चित टीवी-सितारों के नाम गिनाए हैं कि जब आजम खान ने लोकसभा में एक महिला सांसद के बारे में आपत्तिजनक बात कही, तो ये तमाम नाम उन पर टूट पड़े थे, और उन्होंने आजम के खिलाफ क्या-क्या लिखा था। इसी तरह आज जब कश्मीर की लड़कियों को सामान की तरह बाकी देश में लाने की खुली चर्चा चल रही है, और इसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर तक शामिल हो गए हैं, तब नामी-गिरामी टीवी चेहरों की यह टोली उसे अनदेखा करते हुए खामोश है। 

दरअसल इस देश में मीडिया के लोगों के बीच खेमेबंदी इतनी मजबूत हो गई है कि बहुत से पत्रकारों को कायदे से तो अपने पसंदीदा राजनीतिक दल में चले जाना चाहिए। ऐसा करके वे अधिक ईमानदार हो सकेंगे, और उनकी टीवी-पत्रकारिता की साख भी बढ़ सकेगी। मीडिया के लोगों का राजनीतिक रूझान कोई गलत बात नहीं है, अगर वह खुलकर मंजूर किया जाए। बहुत से नामी-गिरामी अखबारों के संपादक भी राजनीतिक दलों, राजनीतिक विचारधारा, या किसी सांस्कृतिक खेमे से जुड़े रहते हैं, और जब वे इस बात को खुलकर मंजूर कर लेते हैं, तो कोई दिक्कत नहीं बचती। मीडिया को कहीं से भी निष्पक्ष या तटस्थ रहने की जरूरत नहीं रहती, और उसे अपनी प्रतिबद्धता, अपनी पसंद या नापसंद खुलकर बताते हुए उसके बाद लिखना या बोलना चाहिए जिससे उसकी कही बातों को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में लिया जा सके। खतरा वहीं रहता है जहां लोग तटस्थ बने रहने का अभिनय करते हैं, और बेशर्मी के साथ किसी नेता या किसी पार्टी के चापलूस बने हुए काम करते हैं। 

भारत में कई राजनीतिक दलों के अपने अखबार हैं। दक्षिण भारत में पार्टियों या नेताओं के अपने टीवी चैनल भी हैं। यह एक अधिक ईमानदार व्यवस्था है जिसमें पार्टी के मुखपत्र, या ऑर्गन कहे जाने वाले अखबारों को उनकी संबद्धता के साथ ही देखा जाता है। वामपंथी पार्टियों, शिवसेना, भाजपा या कांग्रेस पार्टी के अपने अखबार हैं जिनसे कभी भी तटस्थ होने की उम्मीद नहीं की जाती। लेकिन जब देश के प्रमुख समाचार चैनल या कई अखबार चुनाव के वक्त या फिर पांचों बरस बारहमासी तटस्थता की खाल ओढ़े हुए बेईमानी का प्रचार करने में लगे रहते हैं, तो उनकी वजह से पूरे मीडिया की साख खत्म होती है। आज हिन्दुस्तान में टीवी चैनलों पर समाचार देखते हुए लोगों को यह समझ नहीं पड़ता कि विचारों के सैलाब में से समाचार कैसे निकाले जाएं, और उनके किन हिस्सों पर भरोसा किया जाए। टीवी की खबरों में जितने तथ्य रहते हैं, उससे अधिक विशेषण रहते हैं, और लोग चारण या भाट की तरह, या मुखौटे पहनकर फुटपाथ पर प्रचार करने वालों की तरह लगे रहते हैं, और वे अपने आपके पत्रकार होने का दावा भी करते हैं। 

भेडि़ए को भेडि़ए की तरह रहना चाहिए, उसमें कोई बुराई नहीं है, उसकी अपनी एक नस्ल है, और फिर वह हिंसक हो, या मांसाहारी हो, वह उसका चरित्र है, उसकी कुदरती जरूरत है। दिक्कत तब है जब भेडिय़ा गाय की खाल ओढ़कर आए, और फिर लोगों को धोखा देकर खाए। देश के टीवी चैनलों में से एक-दो चैनल खुलकर साम्प्रदायिक, और हिंसक हैं, भड़काऊ हैं, और धर्मान्धता बढ़ाते चलते हैं। ऐसे में उनको पहचानना बड़ा आसान रहता है, और बाकी चैनलों को, कुछ अखबारों को भी अपने दर्शकों और पाठकों के लिए ऐसी सहूलियत का इंतजाम करना चाहिए। टीवी समाचार चैनल अपने चैनल के निशान के साथ-साथ पसंदीदा पार्टी का निशान भी लगा सकते हैं, और उससे वे एकदम से बेईमान से हटकर ईमानदार हो जाएंगे। भारत में पुरातत्व के जानकार पत्थरों पर लिखे हुए को पढ़कर बताते हैं कि सैकड़ों बरस पहले भी किस तरह चारण और भाट रहते थे जिन्हें राजा के गुणगान करने की तनख्वाह मिलती थी। आज भी अगर लोग अपनी यह शिनाख्त उजागर करके यह काम करेंगे तो उनका अधिक सम्मान होगा, वरना आज वे बिके हुए मीडिया के नाम से जाने जाते हैं। लोगों को जो काम करना हो, ईमानदारी से और पारदर्शी तरीके से करना चाहिए।
-सुनील कुमार

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