संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 अगस्त : कोई भी सालगिरह अधिक याद दिलाती है विरोधाभास
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 अगस्त : कोई भी सालगिरह अधिक याद दिलाती है विरोधाभास
Date : 14-Aug-2019

आजादी की सालगिरह जैसे जो मौके साल में एक बार आते हैं, वे कई विरोधाभासों को याद दिला जाते हैं। प्रेस की आजादी की सालगिरह आती है, तो याद दिलाती है कि प्रेस किस-किस तरह आजाद नहीं है। संविधान की सालगिरह आती है तो याद पड़ता है कि संविधान को किस-किस तरह कुचला जा रहा है, किस-किस तरह उसे अनदेखा किया जा रहा है। इसी तरह आजादी की सालगिरह बताती है कि किन-किन चीजों में देश और इसके लोग आजाद नहीं हुए हैं। किस-किस चीज से आजादी मिलना बाकी है, या मिलना चाहिए, या मिली हुई आजादी खो चुकी है। ऐसी ही तमाम बातों के बीच हिन्दुस्तान की सालगिरह एक बार फिर आकर खड़ी हो गई है, और आज की सुबह-सुबह छत्तीसगढ़ की पुलिस के तीन सिपाही मिलकर एक छोटे से बच्चे को पीटते हुए नजर आ रहे हैं, और ऐसे वीडियो याद दिलाते हैं कि हिन्दुस्तानी पुलिस का किस तरह अंग्रेज सोच से आजाद होना अभी बाकी ही है। उसे अंग्रेजों ने गुलाम हिन्दुस्तानियों पर काबू और जुल्म करने के हिसाब से ढाला था, और आजाद हिन्दुस्तान ने इस सांचे को तोडऩे की कोशिश कभी इसलिए नहीं की कि सत्तारूढ़ लोगों को ऐसी जुल्मी पुलिस माकूल बैठती है, सुहाती है, उनके बड़े काम आती है। 
लेकिन कुछ दूसरे मुद्दों को देखें तो लगता है कि आज देश में हो रही बेइंसाफी, कमजोरों पर जुल्म देखते हुए सत्ता की जो चुप्पी जारी है, क्या उस चुप्पी से आजादी एकदम ही जरूरी नहीं है? एक तरफ तो यह चुप्पी अपने आपमें जब सत्ता की होती है, तो वह एक जुल्म की शक्ल में इतिहास में दर्ज होते चलती है। और दूसरी ओर इस चुप्पी को अनदेखा और अनसुना करने के लिए सत्ता कई किस्म के नाटक करती है जो कि आज देश में देखने मिल रहे हैं। देश के असल मुद्दों की अनदेखी की आजादी तो ताकतवर तबकों को मिल गई है, लेकिन कातिल चुप्पी से आजादी के कोई आसार नहीं है। देश के असल मुद्दे कहीं सिर न उठाने लगें, इसलिए एक के बाद दूसरी लुभावनी, भावनात्मक और भड़काऊ बातों का सैलाब समंदर के नमकीन पानी की लहर सरीखा लगातार जारी रखा जाता है ताकि नमकीन पानी से भरी आंखें कहीं असल मुद्दे देख न ले। लोगों के दिल-दिमाग लगातार एक ऐसे कीर्तन से घेरकर रखे जा रहे हैं कि समझदारी की कोई बात उन तक पहुंच न जाए, कोई सच, वैज्ञानिक सोच, न्यायसंगत आवाज पहुंच न जाए। 

यह एक ताजा गुलामी है, जो कि आजादी के पूरे हासिल पर छा चुकी है। सोच की यह गुलामी, विचारों की यह तंगदिली, तर्कशक्ति का यह तंगनजरिया एक राष्ट्रीय गौरव बनाकर पेश किया जा रहा है, और लोग इस हड़बड़ी में उसे निगले जा रहे हैं कि कहीं वे देश के गद्दार न करार दे दिए जाएं। देश की आम सोच को भावनात्मक उत्तेजना का गुलाम बनाकर इंसाफ की आजादी खत्म की जा रही है, और देश का बहुमत मानो इसी का जश्न मना रहा है। लोकतंत्र को महज एक जनमतसंग्रह बनाकर रख दिया गया है, और बहुमत को इंसाफ का विकल्प मान लिया गया है। अगर भारत के पुराने किस्से-कहानियों की जुबान में कहें तो आज कौरवों को यह हक हासिल है कि वे गिनती के गिने-चुने पांडवों की भीड़-हत्या कर दें, और वह जायज भी कहलाए। लोकतंत्र बहुमततंत्र में बदलने के बाद अब भीड़तंत्र की शक्ल में अपने सबसे हिंसक रूप के साथ हिन्दुस्तानियों के भीतर की हजारों बरस पहले की हिंसानियत के डीएनए सैकड़ों पीढ़ी बाद फिर हासिल कर रहा है, और इसके लिए राष्ट्रप्रेम के तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल करके ऐसी हिंसानियत को देशभक्ति, देशप्रेम की ढाल भी मुहैय्या कराई जा रही है। 

आजादी की सालगिरह यह सोचने पर मजबूर करती है कि करीब एक सदी के संघर्ष से हासिल आजादी इस पौन सदी में ही कहां पहुंच गई है? लेकिन जिस तरह आधुनिक पर्यटन केन्द्रों में मशीनों से पानी में लहरें पैदा की जाती हैं, अधिक हिन्दुस्तानी दिमाग न्याय और तर्क की बातें सोचें, उसके पहले और कोई राष्ट्रवादी लहर आकर उनकी आंखों में नमकीन पानी भर देगी।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments