संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  19 अगस्त : भारत की इस मंदी को एक संभावना भी बना सकते हैं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 अगस्त : भारत की इस मंदी को एक संभावना भी बना सकते हैं
Date : 19-Aug-2019

भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग को लेकर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं कि किस कंपनी ने अपने कितने कारखानों को कितने हफ्तों या महीनों के लिए बंद कर दिया, कौन सी ऑटो कंपनी कितने हजार कर्मचारियों की छंटनी कर रही है, और देश में पिछले तीन या छह महीनों में कितने हजार ऑटोमोबाइल डीलरशिप बंद हो चुकी हैं। हालत यह है कि आज कारखानों और डीलरों के अहातों में इक_ा दुपहिया-चौपहिया बिकने में अगले कई महीने लग जाएंगे, और ग्राहकी बढऩे के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। जाहिर है कि देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का हाल यह है कि चड्डी-बनियान तक बिकना घट गया है, और इसकी खबरें दुनिया के एक मान्य सिद्धांत को भी बताती हैं कि जब पुरूषों के चड्डी-बनियान बिकना कम हो जाएं, तो वह अर्थव्यवस्था की बदहाली का सुबूत होता है। अब जब सावन खत्म हो चुका है, कांवड़ यात्रा निपट चुकी है, अमरनाथ यात्रा का वक्त भी खत्म हो गया है, कश्मीर बाकी देश का हिस्सा बना दिया गया है, देश की आबादी को काबू में करने का नया फतवा जारी हो गया है, और मानो उस फतवे के खिलाफ उसी खेमे के एक दूसरे वजनदार व्यक्ति ने हिन्दुओं को अपनी आबादी बढ़ाने का फतवा भी दे दिया है, तब देश की सब समस्याओं को खत्म मानते हुए, अर्थव्यवस्था पर भी थोड़ी सी चर्चा कर लेनी चाहिए। 

आज देश में जिस तरह फोन और इंटरनेट बाजार का एक बड़ा हिस्सा अंबानी के हाथ आ चुका है, और बाकी टेलीफोन कंपनियां एक-एक कर बिकती जा रही हैं। साल के आखिरी में देश की अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़े दूरसंचार क्षेत्र की कमाई को बढ़ा हुआ जरूर बता देंगे, लेकिन उसमें कंपनियां घट चुकी रहेंगी, और एक अंबानी के हिस्से कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा रहेगा। देश का सकल राष्ट्रीय उत्पादन या जीडीपी एक धोखा खड़ा करने वाला आंकड़ा रहता है क्योंकि वह एक अंबानी, एक अदानी, और मनरेगा मजदूरों सबकी कमाई को मिलाकर उसका औसत निकालकर देश की औसत आय बता देता है, और उसकी कुल आय को वह सकल राष्ट्रीय उत्पादन बता देता है। इसलिए ये आंकड़े सफेद झूठ के और ऊपरी दर्जे का झूठ होते हैं, इनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन आज निजी गाडिय़ों की बिक्री का जो भट्टा बैठा हुआ है, उस बीच कुछ सोचने की भी जरूरत है। 

कहा जाता है कि जब बादल बहुत घने और काले रहते हैं, तो उन्हीं के किनारे से कहीं एक चमकीली लकीर उभरती है। ऐसी ही सिल्वर लाईनिंग आज ऑटोमोबाइल इस्तेमाल में हो सकती है। जब लोगों की औकात निजी गाडिय़ां खरीदने की रह नहीं गई हैं, तब सरकार और समाज दोनों के सामने यह मौका है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। शहरों में आवाजाही के लिए छोटी और बड़ी बसों का, मेट्रो या किसी और किस्म की ट्रेन का ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि निजी गाडिय़ों की जरूरत को ही घटा दे। इससे यह हो सकता है कि कारों और दुपहियों का कारोबार घट जाए, लेकिन दुनिया में कई कारोबार घटते हैं, और कई कारोबार बढ़ते हैं। ऐसे ही लोगों के रोजगार भी एक जगह से हटकर दूसरी जगह चले जाते हैं। जब एटीएम शुरू हुए थे तो लोगों को लगता था कि बैंकों में कैशियरों की लाखों कुर्सियां छिन जाएंगी, लेकिन कोई नौकरी गई नहीं, और हर एटीएम के पीछे एक या दो चौकीदार लगने लगे। ऐसा ही हाल कार बनाने वाली कंपनियों का हो सकता है कि उनकी बढ़ोत्तरी रूक जाए, लेकिन बसें बनाने वाली कंपनियों का कारोबार खूब बढ़ सकता है, मेट्रो बनाने वाली निर्माण कंपनियों का काम खूब बढ़ सकता है। 

दरअसल ऑटोमोबाइल क्षेत्र की दिक्कत तो एक दिक्कत है, बड़ी दिक्कत दुनिया के शहरों में क्षमता की है कि वहां की सड़कें, वहां की पार्किंग कितनी गाडिय़ों को ढो सकती हैं। दुनिया को गाडिय़ों के बोझ और उनके जहर से बचाने के लिए यह जरूरी है कि लोगों की अपनी निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटाई जाए, और उनके सामने एक सस्ता, आसान, और सहूलियत का सार्वजनिक विकल्प उपलब्ध कराया जाए। भारत में सरकारें बहुत रफ्तार से ऐसा नहीं सोचती हैं, और अभी भी निजी गाडिय़ों को ही बैटरी से चलने वाली बनाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि निजी गाडिय़ां लोगों के निजी घर में नहीं चलतीं, उनके लिए शहरीकरण की योजना और उसके ढांचे की जरूरत पड़ती है। इसलिए निजी वाहनों को निजी उपयोग की सुविधा के बजाय शहरों पर बोझ मानकर उस हिसाब से शहरी यातायात की एक नई योजना बनाना चाहिए जिसमें निजी गाडिय़ों को घटाना एक बड़ा मुद्दा हो। निजी गाडिय़ों की खपत घटने की फिक्र को मौका मानकर उसका इस्तेमाल करते हुए शहरी सार्वजनिक परिवहन की तरफ तेजी से जाना चाहिए।
-सुनील कुमार

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