संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 अगस्त : आरक्षण से सामाजिक न्याय व्यापक अर्थ से व्यापक दायरे में तुरंत करने की जरूरत है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 21 अगस्त : आरक्षण से सामाजिक न्याय व्यापक अर्थ से व्यापक दायरे में तुरंत करने की जरूरत है
Date : 21-Aug-2019

छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले भाषण में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया है, और कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि ओबीसी तबका राज्य की तकरीबन आधी आबादी है, और इसे एक संगठित समुदाय माना जाता है, राजनीतिक रूप से ताकतवर भी। लेकिन मध्यप्रदेश कुछ महीने पहले ही इस काम को कर चुका था, और वहां जो  एक मांग उठी है, उस पर छत्तीसगढ़ को भी गौर करना चाहिए। मध्यप्रदेश में ओबीसी समुदाय के भीतर भी अतिपिछड़ों के लिए एक आरक्षण की मांग की जा रही है। दूसरी मांग मध्यप्रदेश ने पहले ही पूरी कर दी है, अनारक्षित तबकों में से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण, जो कि केन्द्र में मोदी सरकार पहले ही कर चुकी है। इस तरह अब छत्तीसगढ़ के सामने दो सवाल खड़े हुए हैं कि ओबीसी के भीतर अत्यंत पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का एक हिस्सा सुरक्षित करना जिससे कि अनारक्षित तबकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरा मामला है अनारक्षित तबकों के भीतर गरीबों के लिए दस फीसदी का, जिससे कि गैरगरीब अनारक्षित लोगों के लिए नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में अवसर सीमित होंगे। 

सामाजिक न्याय के नजरिए से इन दोनों बातों के बारे में सोचना जरूरी है, और चूंकि छत्तीसगढ़ में ओबीसी आरक्षण हाल ही में 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया गया है, इसलिए अगर जल्द ही इसके भीतर अतिपिछड़ों के लिए एक हिस्सा सुरक्षित किया जाता है, तो उसमें संपन्न ओबीसी तबके के अलावा किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि किसी भी आरक्षित तबके के भीतर जब उनकी आबादी का एक हिस्सा संपन्न और सक्षम हो जाता है, तो आरक्षण के तमाम फायदों को यही मलाईदार तबका खा लेता है। ऐसा सिर्फ ओबीसी के साथ होता हो वह भी नहीं, हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों के लिए भी यह मांग करते आ रहे हैं कि क्रीमीलेयर को इसके फायदों से बाहर किया जाए। जो लोग सांसद, विधायक या मंत्री बन चुके हैं, या अखिल भारतीय सेवा के अफसर या जज बन चुके हैं, या जिनकी कमाई एक सीमा से अधिक हो चुकी है, उनके बच्चों की तैयारी के मुकाबले उन्हीं के आरक्षित तबकों के गरीब बच्चे किस तरह मुकाबला कर सकते हैं, यह साफ समझ आता है। दिक्कत यह है कि दलित और आदिवासी आरक्षण से क्रीमीलेयर हटाने का अधिकार, और उसकी जिम्मेदारी जिस मलाईदार तबके पर है, उसके अपने हित ऐसे फैसले से सबसे पहले मारे जाएंगे। इसलिए न तो संसद-विधानसभा, और न ही सरकार या अदालत में बैठे ताकतवर लोग ऐसा होने दे रहे। जिस सामाजिक न्याय की सोच के साथ दलित-आदिवासी आरक्षण शुरू किया गया था, वह आरक्षित तबके के भीतर ही एक बहुत बड़ा सामाजिक अन्याय बन चुका है, और जब तक संपन्न-सक्षण तबके को हटाया नहीं जाएगा, सचमुच ही वंचित तबका आरक्षण का फायदा नहीं पा सकेगा। 

इसी तरह छत्तीसगढ़ में बढ़ाए गए ओबीसी आरक्षण के भीतर तुरंत ही अतिपिछड़ों के लिए इस बढ़े हुए आरक्षण को पूरे का पूरा अलग कर देना चाहिए। ओबीसी को पहले की तरह आरक्षण मिलता रहे, और यह नई बढ़ोत्तरी सिर्फ अतिपिछड़ों के लिए लागू की जाए, या 27 फीसदी का एक पर्याप्त हिस्सा अतिपिछड़ों के लिए लागू किया जाए। छत्तीसगढ़ राज्य में गरीबी के सर्वे के जो आंकड़े हैं, वे बताते हैं कि पिछड़े वर्ग के भीतर भी गरीबी रेखा के नीचे की एक बड़ी आबादी है। ऐसे लोग सक्षम और संपन्न  ओबीसी नेताओं, कारोबारियों, और बड़े किसानों के बच्चों का कोई मुकाबला नहीं कर सकते। अब रहा सवाल अनारक्षित तबके के भीतर आर्थिक कमजोर लोगों के लिए अनारक्षित सीटों में से 10 फीसदी को अलग रखने का। यह इसलिए जरूरी है कि अनारक्षित तबके का भी 90 फीसदी हिस्सा ऐसा होगा जो कि आर्थिक कमजोर होगा, लेकिन जो मुकाबले की तैयारी नहीं कर पाता। ऐसे 90 फीसदी हिस्से के लिए अगर 10 फीसदी सीटों को अलग कर भी दिया जाता है, तो उससे अनारक्षित तबके के भीतर भी किसी सक्षम से बराबरी के अवसर नहीं छिनेंगे क्योंकि सामान्य सीटों में से 90 फीसदी सीटें तो इन अनारक्षित तबके के 10 फीसदी लोगों के लिए मौजूद रहेंगी ही।

आरक्षण के मुद्दे पर जब सामाजिक न्याय की बात होती है तो वह चुनिंदा मुद्दों पर नहीं की जा सकती, सामाजिक न्याय को एक व्यापक अर्थ में और व्यापक दायरे में लागू करने पर ही न्याय हो सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी ताजा घोषणा के साथ जोड़कर इन दो बातों को तुरंत ही लागू करना चाहिए, और संविधान के दायरे में दलित-आदिवासी तबकों में से मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने की एक राजनीतिक पहल करनी चाहिए, क्योंकि संसद की सहमति के बिना शायद कोई राज्य उसे अपने स्तर पर न कर सके। आज जनता के भीतर से इंसाफ के लिए लडऩे वाले जो लोग हैं, उन्हें भी किसी भी तबके के फायदों से क्रीमीलेयर को अलग करने के लिए संघर्ष करना चाहिए ताकि सामाजिक न्याय सचमुच ही अन्याय के शिकार लोगों तक पहुंच सके। 
-सुनील कुमार

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