संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 अगस्त : सच को छुपाने और दबाने से नुकसान छोड़ कोई नफा नहीं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 22 अगस्त : सच को छुपाने और दबाने से नुकसान छोड़ कोई नफा नहीं
Date : 22-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके के फर्जी दस्तखत से एक चिट्ठी छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी विधायकों को भेजी गई जिनमें राज्यपाल नियुक्त होते ही उनकी तरफ से कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त की बात कही गई थी। वे खुद भाजपा की नेता रही हैं और छत्तीसगढ़ की राज्यपाल बनने के पहले वे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में मनोनीत उपाध्यक्ष थीं। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कांग्रेस विधायकों को खरीदने की बात लिखकर उनको बदनाम करने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन वह कोशिश इतनी बचकानी, फूहड़, और अविश्वसनीय हो गई है कि साधारण समझ वाले लोग भी इसे फर्जी ही मानेंगे। लेकिन आजकल लोग अपनी समझ से अधिक भरोसा वॉट्सऐप पर आई हुई अफवाहों पर करते हैं, गढ़े हुए झूठों पर करते हैं, इसलिए ऐसी साजिश का भांडाफोड़ भी जरूरी है। आज जब हम अपने अखबार में इस समाचार को सबसे पहले उजागर कर रहे थे, तो सरकार के कुछ लोगों को यह ठीक लगा कि इसे प्रकाशित न किया जाए। लेकिन इसे न छापने से वॉट्सऐप पर तैरती हुई जालसाजी का भांडाफोड़ तो नहीं हो पाता, और महज एक फर्जी चिट्ठी घूमती रहती, और हर कोई तो इसे जांच-परख नहीं पाते। इसलिए सच को रोकना ठीक नहीं होता, अगर सच घर बैठे रहता है तो झूठ पूरे शहर का फेरा लगाकर आ जाता है। 

आज महज इसी बात पर हम इस जगह इस मुद्दे पर नहीं लिखते, अगर इस देश में कश्मीर में आज खबरों पर लगी हुई रोकटोक इतनी लंबी न खिंच गई होती। केन्द्र सरकार ने धारा 370 हटाने और कश्मीर को केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने के फैसले की घोषणा करने के पहले ही कश्मीर में सुरक्षा बलों की इतनी बड़ी तैनाती कर दी थी, पूरे फोन और इंटरनेट बंद कर दिए गए थे, लोगों की जिंदगी थाम दी थी, और खबरों पर पूरी रोक लगा दी थी। नतीजा यह हुआ कि वहां से निकलने वाली खबरों में क्या सच है और क्या नहीं इसका खुलासा करने के लिए सरकार अपने नजरिए से सच और झूठ स्थापित करती रही। दुनिया के कुछ विश्वसनीय समाचार स्रोतों के मुकाबले किसी भी सरकार की ऐसी हालत में विश्वसनीयता बहुत कम हो जाती है जिसने कि खबरों पर रोक लगाकर रखी है। इसलिए कश्मीर को लेकर जिन लोगों की भावनाएं केन्द्र सरकार के साथ है, उन्हें वहां की किसी खबर से कोई लेना-देना भी नहीं है। वे कश्मीर के हालात को लेकर फिक्रमंद भी नहीं हैं, और कश्मीरी लोग उनके जेहन में सबसे आखिर में आने वाली चीज हैं। लेकिन कम संख्या में रहने वाले जो लोग इंसाफ की बात सोचते हैं, कश्मीरियों के बुनियादी हकों को मानते हैं, वे वहां की सही खबरों को जानने की कोशिश करते हैं तो हिन्दुस्तान के मीडिया का एक छोटा हिस्सा ही उनको नसीब होता है जो कि सरकार की कार्रवाई की स्तुति का कीर्तन करने में नहीं लगा है। देश के बाहर का कुछ मीडिया मिलता है जो कि भारत सरकार के किसी किस्म के दबाव में नहीं है, जो सच को सामने रखने की हिम्मत रखता है, और पूरी ताकत से सच को जुटाने की कोशिश भी करता है। जब देश के अधिकतर मीडिया से लोगों को सच नहीं मिल पा रहा है, कश्मीर के आज के आंखों देखे हालात नहीं मिल पा रहे हैं, तो वे सच और झूठ का फर्क नहीं कर पा रहे हैं, और दोनों किस्म की अफवाहों के बीच अपनी भावनाओं से सच तय कर रहे हैं, आगे बढ़ा रहे हैं। 

कभी भी सच को दबाने या छुपाने से किसी का भला नहीं होता। इस देश में इंदिरा के वक्त आपातकाल देखा था, और छत्तीसगढ़ के विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के सेंसर मंत्री के रूप में इतनी बदनामी पा चुके थे कि वे राष्ट्रीय राजनीति में कभी इस खोए हुए सम्मान को वापिस नहीं पा सके, और देश-दुनिया का मीडिया उनके आखिरी वक्त तक उनके खिलाफ रहा, इतिहास में सेंसरशिप का दौर सबसे अधिक बदनाम रहा। कश्मीर को लेकर सच को सामने आने देना चाहिए, और अभी वहां के बारे में अगर सोशल मीडिया पर कुछ लोग ऐसी बात करते हैं, तो भावनाओं के सैलाब पर आसमान पहुंचे हुए लोग उनके खिलाफ गालियों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। भीड़ की दी हुई गालियों से सच और हकीकत नहीं बदलते। कश्मीर में जैसी हिंसा की आशंका थी, वैसी कोई हिंसा नहीं हुई है, और अब केन्द्र सरकार को खुद अपनी साख के लिए कश्मीर को देश की मूलधारा में आने देना चाहिए। इतने लंबे समय तक उसे बाकी दुनिया से काटकर रखने से नफा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है। 
-सुनील कुमार

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