संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अगस्त : अराजकता को सामाजिक मान्यता, सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अगस्त : अराजकता को सामाजिक मान्यता, सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा
Date : 26-Aug-2019

लोकतंत्र में हर बात कानूनी के शिकंजे में कसकर नहीं की जा सकती। बहुत से ऐसे पहलू रहते हैं जिनमें लोकतांत्रिक परंपराओं, या इंसानियत कहे जाने वाले मूल्यों के पैमानों पर चीजों को आंका जाता है, और कानूनी बंदिश न रहने पर भी सही और गलत तय करके काम किए जाते हैं। भारत जैसे देश में अदालत का हाल यह है कि किसी गुनहगार के छूट जाने की पूरी संभावना या आशंका रहती है, और बहुत कम मुजरिम सजा पाते हैं। जो सजा पाते भी हैं, उनकी भी अगर ऊपरी अदालत में अपील करने की ताकत रहती है तो वे लड़ते-लड़ते ही पूरी जिंदगी गुजार लेते हैं, और बहुत कम लोग निचली अदालत से मिली हुई सजा काटते हैं। ऐसे में अभी जब उत्तरप्रदेश में एक पुलिस अफसर की हत्यारी भीड़ को अदालत से जमानत मिली, और आरोपी जेल से निकलकर बाहर आए, तो समारोह करके जयश्रीराम और वंदेमातरम के नारों के साथ उनका सम्मान किया गया। यह पहला मौका नहीं है, झारखंड में कई महीने पहले उस वक्त के एक केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने भी जेल से जमानत या पैरोल पर छूटकर आए बलात्कार के आरोपियों, या कत्ल के आरोपियों का माला पहनाकर स्वागत किया था। उत्तरप्रदेश के जिस बलात्कारी विधायक सेंगर को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को दखल देना पड़ा, और राज्य की योगी सरकार की उसे बचाने की साजिशों के खिलाफ जमकर लताड़ लगानी पड़ी, उस सेंगर की तस्वीरें अभी भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों के साथ होर्डिंग्स पर दिखीं। 

देश की अधिकतर पार्टियों को अपने मुजरिमों से अधिक परहेज नहीं दिखता है। भाजपा इस मामले में बाकी पार्टियों के मुकाबले बहुत आगे चल रही है, लेकिन बहुत सी दूसरी पार्टियां भी उससे कुछ किलोमीटर पीछे चल रही हैं। यह हाल उन पार्टियों की बदहाली नहीं बताता, लोकतंत्र की बदहाली बताता है कि किसी को कोई शर्म नहीं रह गई है, और हत्या और बलात्कार जैसे मामले भी अब राजनीति में पूरी तरह से सम्माननीय हो गए हैं। लोगों को याद होगा कि जम्मू में जब एक खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और पुलिस समेत कई लोगों ने, जिनमें एक जोड़ी बाप-बेटे भी थे, बलात्कारियों में कई लोग देवताओं के नाम वाले लोग भी थे, जिन्हें आखिर में जाकर अदालत से सजा हुई, उन्हें बचाने के लिए जम्मू में भाजपा के एक बड़े नेता की अगुवाई में तिरंगे झंडे लेकर लोगों ने जुलूस निकाला था। उस मामले में पुलिस को जांच नहीं करने दी जा रही थी, बलात्कार की शिकार बच्ची को वकील नहीं मिलने दिया जा रहा था, और वैसे में भी देश के कई साम्प्रदायिक संगठन खुलकर बलात्कारियों के साथ खड़े हुए थे, गिरफ्तार आरोपियों की रिहाई की मांग हो रही थी।

भारत में आज हवा इतनी जहरीली हो चुकी है कि दूसरे धर्म की बच्ची से बलात्कार भी सामाजिक मान्यता पाते जा रहा है। राजनीतिक दलों को अगर अदालती फैसलों की वजह से किसी बलात्कारी को पार्टी से निकालना भी पड़ रहा है, तो रात गुजरने के पहले उसकी पत्नी को या परिवार के किसी व्यक्ति को पार्टी में आनन-फानन स्थापित कर दिया जाता है। लोकतंत्र में ऐसी सोच को रोकने के लिए किसी तरह का कानून न तो है, और न ही बनाया जा सकता। भारत में जहां की चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, संसद और सरकार, इन सबके बनाए हुए नियम-कानून आए दिन कुचले जाते हैं, वहां पर नए कानून बनाकर किसे रोका जा सकता है कि वे बलात्कारी का सम्मान न करें, हत्यारे का सम्मान न करें। हर किसी के पास या तो जनता की अदालत का तर्क है, या कानून की अदालत का तर्क है। जो लोग जनता की अदालत में फंस जाते हैं, उन्हें अचानक कानून की अदालत पर पूरा भरोसा हो जाता है। और जो लोग कानून की अदालत में घिर जाते हैं वे जनता की अदालत में जाने की बात कहने लगते हैं। लोकतंत्र ऐसी घटिया सोच का सामना करने के लिए, उसमें जिंदा रहने के लिए बना हुआ तंत्र नहीं है। यह तो एक बुनियादी भलमनसाहत के लिए बना हुआ तंत्र है जो कि आज के हिन्दुस्तान में बहुत हद तक बेअसर हो चुका दिख रहा है, पेनिसिलिन की तरह जिससे कि आज कोई बीमारी ठीक नहीं हो सकती। देश में धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, राजनीतिक विचारधारा के नाम पर अराजकता बढ़ते-बढ़ते अब इतनी आम हो गई है कि उसे सामाजिक मान्यता मिल गई है। यह सिलसिला जाने कहां जाकर थमेगा। 
-सुनील कुमार

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