संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 अगस्त : तबादलों का एक तो मौसम  गलत, और फिर तरीका भी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 30 अगस्त : तबादलों का एक तो मौसम गलत, और फिर तरीका भी
Date : 30-Aug-2019

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ हफ्तों से तबादलों को लेकर भारी गहमागहमी चल रही है। सरकारी विभागों में हजारों तबादले हुए हैं, और तकरीबन ऐसा ही किसी भी सरकार के रहते हुए होते आया है। इस बार कुछ विधायक अपनी नाराजगी के साथ स्कूल शिक्षा मंत्री पर पिल पड़े इसलिए खबरें कुछ अधिक बनी, वरना स्कूल शिक्षा विभाग सरकार का सबसे बड़ा विभाग है, और उसमें सबसे अधिक संख्या में तबादले होते ही हैं। लेकिन हर विपक्ष सत्ता पर तबादला उद्योग का आरोप लगाता है, और ये शब्द अब धीरे-धीरे अपना असर खो बैठे हैं। इसलिए आरोपों से परे यह सोचने की जरूरत है कि किसी सरकार की तबादला नीति और उस पर अमल में कौन सी बातों का ख्याल रखना चाहिए, ताकि सरकार का कामकाज बेहतर चल सके, और अधिकारी-कर्मचारी भी अपने परिवार का ख्याल रख सकें। 

छत्तीसगढ़ में बस्तर एक ऐसा इलाका है जहां जाकर कम ही लोग ऐसे हैं जो कि अधिक समय तक रूकना चाहते हैं। अधिकतर अफसर-कर्मचारी नक्सल-हिंसा वाले, पिछड़े हुए बस्तर जाने से बचने के लिए मोटा खर्च करने के लिए भी तैयार रहते हैं, और पिछली रमन सरकार के सुरक्षा सलाहकार देश के सबसे चर्चित पुलिस अफसर केपीएस गिल ने एक औपचारिक इंटरव्यू में कहा भी था कि बस्तर से बाहर निकलने के लिए पुलिस के छोटे कर्मचारी भी बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देते हैं। गिल उस समय छत्तीसगढ़ सरकार के सुरक्षा सलाहकार रह चुके थे, और उन्होंने खास बस्तर पर राय देने के लिए ही मेहनताने पर रखा गया था। आज भी ऐसी चर्चाएं आम रहती हैं। ऐसे में राज्य शासन को यह सोचना चाहिए कि क्या वह बस्तर और सरगुजा को मिलाकर आदिवासी क्षेत्र का एक ऐसा अमला बांट सकती है जो कि अधिक वेतन-भत्ते पाकर इन्हीं इलाकों में आखिरी तक काम करने के लिए तैयार हो? तबादले पर लोग वहां न जाएं, या जाते ही छुट्टी लेकर बैठ जाएं, या लौटने की फिराक में खर्च पर उतारू रहें, तो ऐसे लोगों से जनता की किसी सेवा की उम्मीद की नहीं जा सकती। प्रदेश में सबसे भ्रष्ट और कमाऊ माने जाने वाले आरटीओ दफ्तर के दुर्ग जिले के अफसर को बस्तर भेजा गया, तो उसने आनन-फानन नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसलिए बस्तर जैसे इलाके के लिए सरकार को परंपरागत तौर-तरीकों से अलग एक ऐसा काडर बनाना चाहिए जो कि अपनी मर्जी से वहां काम करने वाला हो। राज्य शासन के भीतर राजधानी में मंत्रालय की एक इमारत में काम करने के लिए कर्मचारियों का एक अलग काडर बना हुआ है, और वे कर्मचारी वहां से बाहर कहीं और नहीं भेजे जा सकते। इसलिए बस्तर-सरगुजा के लिए, या अकेले बस्तर के लिए एक काडर बनाना चाहिए ताकि सरकार हर बरस इसी बात से न जूझती रहे कि बरसों से बस्तर में फंसे लोगों को कैसे मैदानी इलाकों में तैनाती दी जाए, क्योंकि आज तो जब तक कोई एवजी वहां पहुंच न जाए, तब तक वहां तैनात अफसर-कर्मचारी को तबादले पर भी निकलने की इजाजत नहीं रहती। इस मुद्दे पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि बस्तर के धुर नक्सल इलाके में जंगल के बीच गांवों में एक ऐसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता 11 बरस से लगातार काम कर रही है जो खुद कैंसर से जूझ भी रही है, इलाज के लिए शहर जाना भी पड़ता है, लेकिन वह वहां डटी हुई है। 

दूसरी बात यह कि स्कूल-कॉलेज में दाखिलों का वक्त मई-जून में निकल चुका है। अब किसी के तबादले से उसका परिवार महीनों तक परेशान रहता है, या फीस और यूनिफॉर्म के नुकसान में रहता है, पढ़ाई का नुकसान झेलता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। सरकारी अमला इंसान है, और उसका परिवार भी है जिसके बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए शैक्षणिक सत्र शुरू होने के महीने-दो महीने पहले ट्रांसफर का काम खत्म हो चुका रहना चाहिए ताकि लोग नई जगहों पर जाकर वहां अपने बच्चों का दाखिला करवा सकें। तबादलों को महज राजनीतिक नाराजगी निकालने के लिए, या किसी को उपकृत करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि मुख्यमंत्री के अपने जिले दुर्ग में कितनी स्कूलें सैकड़ों बच्चों के रहते हुए एक-एक शिक्षक की रह गई हैं, बाकी का या तो तबादला हो गया है, या उनकी तैनाती ही नहीं हुई है। यह सिलसिला भी खत्म होना चाहिए, और इसके लिए सरकार पारदर्शी तरीके से इंटरनेट पर यह डाल सकती है कि किस स्कूल-कॉलेज में कितने पद हैं, कितने भरे हुए हैं, और खाली पद कब से खाली हैं। यह बहुत आसान सा काम है, और इससे एक नजर में लोगों को पूरे प्रदेश का हाल दिख जाएगा। 
-सुनील कुमार

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