संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 अगस्त :  ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 अगस्त : ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम
Date : 31-Aug-2019

छत्तीसगढ़ का जो आदिवासी इलाका बस्तर लगातार नक्सल हिंसा की वजह से खबरों में रहता है, या वहां की बाकी खबरें सुरक्षाबलों के हाथों नक्सलियों के मारे जाने की रहती हैं, उस बस्तर में देश और दुनिया के बाकी हिस्सों के लोग आने से भी कतराते हैं, और अपनी बच्चों को भेजने से भी कतराते हैं कि धमाकों में इतनी मौतों वाले इलाके में क्यों जाया जाए। यह एक अलग बात है कि खुद बस्तर के जो पर्यटन केंद्र हैं, उनको नक्सली हाथ भी नहीं लगाते हैं, और तमाम सैलानी महफूज रहते आए हैं। लेकिन बस्तर के नक्सल हिंसाग्रस्त इलाकों में बसे हुए लोगों का हाल बहुत अलग है, और आज जब वहां की दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर उपचुनाव का मौका आ खड़ा हुआ है, तो कांगे्रस और भाजपा दोनों की तरफ से दो ऐसी महिलाओं के बीच चुनाव होना तकरीबन तय माना जा रहा है जिन्होंने नक्सल हिंसा में ही अपने-अपने पति खोए हैं। नक्सलियों के खिलाफ बस्तर में सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई लडऩे वाले कांगे्रस के बड़े नेता महेंद्र कर्मा को बस्तर के झीरम घाटी हमले में नक्सलियों ने छांटकर, तलाशकर, नाम पूछकर मारा था, और कुछ महीने पहले ही वहां से भाजपा विधायक बने भीमा मंडावी पुलिस चेतावनी के बावजूद बस्तर में सफर करते हुए नक्सली धमाके में मारे गए थे। ऐसे दोनों परिवारों से इन दोनों की पत्नियां चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हैं, और इस मौके पर इनका यह रूख देखते हुए यह लगता है कि नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र और कब्जे वाले इलाके में रहते हुए ये महिलाएं इतना हौसला दिखा रही हैं, बावजूद इसके कि वे कभी भी नक्सली निशाने पर आ सकती हैं, जान खो सकती हैं। लोगों को याद होगा कि महेंद्र कर्मा राज्य बनने के बाद से लगातार नक्सलियों के निशाने पर थे, और अपने घर में भी वे संगीनों के साए में ही सो पाते थे।

इस तरह का हौसला उन परिवारों में भी देखने मिलता है जिनके कोई सदस्य पुलिस या किसी दूसरे सुरक्षाबल में रहते हुए नक्सल मोर्चे पर शहीद हुए हैं, और परिवार के दूसरे सदस्य इसके बाद भी वर्दी वाली ऐसी खतरनाक नौकरी करने जाते हैं, और फिर नक्सल मोर्चे पर पहुंच जाते हैं। ऐसी कहानियां फौज में शहीद हुए लोगों की भी सुनाई पड़ती हैं जहां एक शहादत के बाद भी मां-बाप दूसरे बच्चों को फौज में भेजते हैं। अभी-अभी तो एक शहीद फौजी की पत्नी की कहानी अखबारों में आई है कि किस तरह वह एक सौंदर्य स्पर्धा जीतने के करीब थी, और पति की शहादत के बाद उसने इस ब्यूटी कान्टेस्ट से बाहर निकलकर फौज में जाने का इम्तिहान दिया, और फौज में नौकरी भी पा ली।

इस किस्म की बातों को सुनकर लगता है कि इसी देश की आबादी के बीच चाहे गिनती में कम हों, लेकिन ऐसे लोग हैं जो कि लगातार हौसला दिखाते हैं, और जान की जोखिम उठाते हुए भी दिखाते हैं। यह उस देश में है जहां पर लोग ट्रैफिक के चालान से बचने के लिए सड़कों पर गाडिय़ां दौड़ाते भाग निकलते हैं, जहां पर लोग अपनी लाश को जल जाने देते हैं, लेकिन जीते-जी नेत्रदान का फॉर्म भी भरने की जहमत नहीं उठाते। लोग अस्पताल में भर्ती अपने रिश्तेदार को भी खून देने को तैयार नहीं होते, सड़क पर जख्मी को अस्पताल पहुंचाने भी तैयार नहीं होते, और ऐसे लोगों को लालच देने के लिए अभी पुदुचेरी राज्य में यह योजना बनाई है कि किसी जख्मी को अस्पताल पहुंचाने वाले को पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।

आज का हिंदुस्तान कहने के लिए तो एक बहुत ही आक्रामक राष्ट्रवाद के रास्ते पर चल रहा है जिस सड़क को बनाने के लिए पड़ोसी देश को भी एक दुश्मन के पुतले की तरह पेश किया गया, और देश के भीतर भी कुछ तबकों को दुश्मन की तख्ती लगाकर निशाने पर खड़ा किया गया है। आक्रामक राष्ट्रवाद के चलते जो लोग भीतर और बाहर के ऐसे दुश्मन करार दिए गए लोगों की भीड़त्या पर उतारू रहते हैं, उन लोगों का राष्ट्रवाद भी देश के भीतर उन्हें कोई भला काम करने की तरफ नहीं ले जाता, कोई चुनौती मंजूर करने की तरफ नहीं ले जाता। ऐसे माहौल में हम उन महिलाओं को सलाम करते हैं जो कि जान के खतरे के बीच भी लोकतंत्र पर खड़े रहकर या तो विधानसभा और संसद पहुंचने की चुनौती मंजूर करती हैं, या जो परिवार की शहादत के बाद भी पुलिस, सुरक्षाबल, या फौज पहुंचकर फिर जोखिम उठाती हैं, या फिर अपने बेटे-बेटियों या भाई-बहनों को ऐसे खतरों के बीच लोकतंत्र या देश की सेवा के लिए भेजती हैं। ऐसी तमाम हौसलामंद महिलाओं को सलाम।
-सुनील कुमार

 

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