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क्या एनआरसी असम में सैकड़ों परिवारों के टूटने की वजह भी बनने वाला है?
क्या एनआरसी असम में सैकड़ों परिवारों के टूटने की वजह भी बनने वाला है?
Date : 04-Sep-2019

-अरुणाभ

असम में तमाम औरतें और बच्चे एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं हैं जबकि परिवार के कई अन्य सदस्यों को भारत का नागरिक मान लिया गया है।

31 अगस्त। सुबह के लगभग 10 बजे का समय। असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी की अंतिम सूची बस प्रकाशित ही होने वाली है। सम्सुल हक यहां के बक्सा जिले के एक छोटे से गांव अता में खेती-किसानी करते हैं। वे गांव के बाजार में स्थित एक इंटरनेट कैफे में जाने के लिए बेचैन हैं लेकिन मूसलाधार बारिश की वजह से ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। वे परेशान हैं क्योंकि उनकी पत्नी रहीमा खातून और तीन बच्चियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। उन्हें एनसीआर की पिछली सूचियों में शामिल नहीं किया गया था। हम अपने फोन पर उनका नाम चेक करने की बात कहते हैं। जब हम संबंधित वेबसाइट में 21 डिजिट का एप्लीकेशन रेफरेंस नंबर यानी एआरएन डाल रहे होते हैं, उस समय कमरे में मौजूद सभी लोगों के चेहरों पर तनाव साफ पढ़ा जा सकता है। जैसे ही हम उन्हें यह बताते हैं कि उन सभी का नाम अंतिम सूची में आ गया है, घर में जश्न जैसा माहौल हो जाता है। सम्सुल मुस्कुराते हुए कहते हैं ‘अब मेरी सारी टेंशन खत्म हो गई है।’ रहीमा अपने मायके वालों को फोन करके उन्हें यह खुशखबरी देती हैं। उनकी बेटी अज़मीना अपने नाना-नानी को बताती है, ‘हां-हां बिल्कुल पक्की बात है। हमारा नाम इसमें है।’

लेकिन इस इलाके के सभी परिवार सम्सुल के परिवार जैसे खुशकिस्मत नहीं हैं। उनके लिए एनआरसी की अंतिम सूची और भी दुख और चिंता लेकर आई है। यह सूची असम में रहने वाले ‘असली’ भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए है। इसे पहली बार 1951 में प्रकाशित किया गया था। अब इसे अपडेट किया गया है ताकि उन लोगों की पहचान की जा सके जो 25 मार्च 1971 के बाद अवैध रूप से बांग्लादेश से असम में घुस आए हैं। 31 अगस्त को प्रकाशित अंतिम एनआरसी में असम के 19.06 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं हैं। एनआरसी के लिए कुल 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। जुलाई 2018 में इसकी जो अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित हुई थी उसमें 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे। इस साल जून में करीब एक लाख और लोगों के नामों को सूची से हटा दिया गया था।
चूंकि आवेदन करने वालों में से कई लोग कट ऑफ डेट के बाद पैदा हुए थे इसलिए उन्हें दो तरह के दस्तावेजों को दिखाने की जरूरत थी - लीगेसी दस्तावेज जो यह साबित करते कि उनके पूर्वज 1971 से पहले भारत में रहते थे। दूसरे लिंक दस्तावेज जो यह साबित करते कि वे ऐसे लोगों के वंशज हैं।
जिन लोगों के नाम एनआरसी की अंतिम सूची में शामिल नहीं है उनमें से कई ऐसी औरतें और बच्चे भी हैं जिनके परिवार के दूसरे सदस्य इस सूची में शामिल हैं। ये औरतें और बच्चे असम के भारतीय नागरिकों के साथ अपने रिश्ते को साबित नहीं कर सके हैं। अब उन्हें असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में अपील करनी है जो इस मामले में बेहद सख्त माना जाता है। अगर वे यहां भी खुद को भारतीय साबित नहीं कर सके तो इन सभी को बंदी बनाया जा सकता है।
एनआरसी में शामिल होने की प्रक्रिया में 14 साल से छोटे ऐसे बच्चों के लिए कुछ विशेष प्रावधान है जिनके मां-बाप का नाम इस सूची में शामिल है लेकिन जो यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि वे उनकी ही संतानें हैं। लेकिन इन प्रावधानों का फायदा सभी को नहीं मिल सका है।
जिनके नाम अंतिम एनसीआर में शामिल नहीं है उनमें नौ साल की कुलसना खातून भी शामिल है। वह भी बक्सा की ही रहने वाली है। उसका नाम 2018 में छपी एनसीआर की ड्राफ्ट सूची में तो शामिल था, लेकिन जून में वाली लिस्ट में इसे हटा दिया गया। उसके रिजेक्शन नोट में लिखा था कि ‘लीगेसी पर्सन’ के साथ उसका रिश्ता साबित नहीं हो सका है। इसका मतलब यह था कि वह उन लोगों की बेटी नहीं है जिनकी खुद को बताती हैं। शनिवार को उसके पिता का नाम तो एनआरसी में शामिल हो गया लेकिन उनका भविष्य अभी भी अनिश्चित है। कुलसना खातून के माता-पिता ने एनआरसी के अधिकारियों को उसका एक जन्म प्रमाण पत्र दिया था। बिल्कुल ऐसे ही प्रमाण पत्र के आधार पर उसकी छोटी बहन मुन्नी अख्तरा का नाम इस सूची में शामिल कर लिया गया है।
कुलसुना की मां नबीरुन्निसा का नाम भी एनआरसी में शामिल नहीं है। जबकि उनके माता, पिता और भाइयों के नाम इसमें हैं। उन्होंने अपने पिता से अपने रिश्ते को साबित करने के लिए ग्राम पंचायत का एक सर्टिफिकेट जमा किया था। लेकिन इसे पर्याप्त नहीं माना गया। अब नबीरुन्निसा की समझ में यह नहीं आ रहा है कि वे अपने लिए परेशान हों या अपनी बेटी के लिए।
पास के बाजेगांव में मालती बाला घोष के सामने भी इसी तरह की समस्या है। ग्राम पंचायत का जो सर्टिफिकेट उन्होंने अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को साबित करने के लिए दिया था, उसे तब भी वैध नहीं माना गया जब उस पर ब्लॉक स्तर के एक अधिकारी के दस्तखत थे।
ग्राम पंचायत के सर्टिफिकेट देने वालों को असम में सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा है। 2017 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इसे अवैध घोषित कर दिया था। लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अच्छी तरह छानबीन की शर्त पर इसके इस्तेमाल की इजाजत दे दी थी। यहां के तमाम लोगों की मानें तो एनसीआर की ताजा सूची में इसे बेहद कम तवज्जो दी गई है।
‘मैं जब कभी स्कूल ही नहीं गई तो और किस तरह के दस्तावेज दे सकती हूं’ मालती पूछती हैं, ‘हमारे पास देने के लिए अब और कुछ नहीं है। अब यह सरकार पर है कि वह हमारे साथ क्या करती है। वह हमारी मदद करती है या हमें मार देती है या जो भी करती है।’
मालती के घर से थोड़ी दूर नीला घोष के परिवार के सामने इससे भी बड़ी दिक्कतें हैं। नीला घोष के पांच में से चार बच्चे एनसीआर में शामिल नहीं हैं। बच्चों के टीकाकरण से जुड़े दस्तावेजों के खारिज हो जाने के बाद नीला के परिवार ने उनके जन्म प्रमाण पत्र भी बनवा लिए थे। लेकिन परिवार का कहना है कि वे उन्हें जमा ही नहीं कर पाए क्योंकि उन्हें दोबारा सुनवाई के लिए बुलाया ही नहीं गया।
‘हमें कभी नोटिस ही नहीं मिला’ उनका सबसे बड़ा बेटा इंद्रजीत घोष कहता है, ‘जब हमने कंप्यूटर पर चेक किया तब तक हमारी तारीख निकल चुकी थी।’ जब नीला घोष का परिवार संबिधित दफ्तर में पहुंचा तो उनसे कहा गया कि उन्हें दोबारा नोटिस भेजा जाएगा। लेकिन घोष परिवार के मुताबिक ऐसा हुआ नहीं। और बीते शनिवार को एक बार फिर से उनके बाहरी होने पर मुहर लगा दी गई।
‘इसमें हमारी क्या गलती है’ इंद्रजीत पूछता है, ‘हम वहां तीन बार गए लेकिन उन्होंने हमसे बात तक नहीं की।’
पास के बारपेटा रोड कस्बे में जब हम पहुंचते हैं तो यहां पास के गांवों के मुकाबले खेत कम और मकान ज्यादा नजर आते हैं। लेकिन एनसीआर से जुड़ी कहानियां यहां भी वैसी ही हैं। इस कस्बे में रहने वाली दुर्गा कोच मंडई का नाम भी नई सूची में शामिल नहीं है। वे भी यह साबित नहीं कर सकीं कि उनके पूर्वज भारत में 1971 से पहले आए थे। वे खुद को 55 साल का बताती हैं अगर इसे मान ले तो वे खुद 1971 से पहले पैदा हुई थी।
मंडई कोच राजबोंग्शी समुदाय से आती हैं जो इस इलाके के सबसे पुराने निवासियों में से एक हैं। तेरहवीं शताब्दी से करीब 700 साल तक बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर-पूर्व के कई हिस्सों में कोच राजवंशी राजाओं का कामतापुर साम्राज्य फैला हुआ था। ‘मैं लोगों से सुनती रहती हूं कि अगर हमारा नाम नहीं आया तो वे हमें यहां से बाहर भेज देंगे’ दुर्गा कहती हैं, ‘यह सोचकर ही मैं बहुत डर जाती हूं।’ (सत्याग्रह)

 

 

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