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असम में जिस डॉक्टर ने अपना ख़ून देकर बचाई थी जान, उसे ही मार डाला
असम में जिस डॉक्टर ने अपना ख़ून देकर बचाई थी जान, उसे ही मार डाला
Date : 05-Sep-2019

दिलीप कुमार शर्मा

मेरा सब कुछ खत्म हो गया। लोगों की जान बचाने वाले को कोई इतनी बेरहमी से कैसे मार सकता है? मेरे पति ने इसी चाय बागान में काम करते हुए एक मजदूर को अपना खून देकर उसकी जान बचाई थी। ये 1984 की बात है। आप उन लोगों (चाय मजदूरों) से पूछिए यह बात सच है या नही। फिर क्यों मारा मेरे पति को?

ये कहते-कहते 61 साल की अपराजिता दत्ता की आवाज धीमी हो जाती है। हाथ के इशारे से अपने पति डॉ. देबेन दत्ता की तस्वीर दिखाते हुए वो जोर-जोर से रोने लगती हैं।दरअसल, बीते शनिवार को असम के टियोक चाय बागान के अस्पताल में चाय श्रमिकों की भीड़ ने कथित तौर पर उस डॉक्टर की जान ले ली जिन्होंने 30 साल तक इसी चाय बागान में लोगों का इलाज किया।
73 साल के डॉ. देबेन दत्ता को भीड़ ने इसलिए पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि वे आधी-अधूरी व्यवस्था के तहत चल रहे इस अस्पताल में एक मजदूर की जान नहीं बचा सके।
टियोक से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 37 से बाईं ओर मुड़ी सिंगल लेन सडक़ पर महज पांच सौ मीटर आगे चलते ही चाय बागान का यह अस्पताल आ जाता है। मॉब लिंचिंग की घटना के बाद से अस्पताल को बंद कर दिया गया है।
बागान प्रबंधन ने दो कमरों में महिला और पुरुष के लिए दो अलग-अलग वार्ड बना रखे हैं। कुल 12 बिस्तर वाले दोनों वार्डों के बीच एक कमरे में डॉक्टर का चेंबर है जिसे घटना के बाद से ही सील कर दिया गया है।
चेंबर की टूटी खिडक़ी से देखने पर वो मेज साफ नजर आती है जिस पर बैठकर कभी डॉ. दत्ता मरीजों के लिए दवाइयों के पर्चे लिखा करते थे। आज उसी मेज पर खून से सना एक नीला कपड़ा पड़ा है। वहां टंगे पर्दों पर पड़े खून के छींटों से हमला करने वाली भीड़ की बेरहमी को समझा जा सकता है।
अस्पताल में डॉक्टर के चैंबर में घुसने से पहले दरवाजे के ठीक ऊपर मानवता की सेवा के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा की तस्वीर लगी है। शनिवार को इसी तस्वीर के सामने भीड़ ने मानवता को खूंटी पर टांगकर किसी की जान ले ली।
डॉ. दत्ता की पत्नी पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं, मेरे पति ने नौकरी की शुरुआत इसी चाय बागान से की थी। वो यहीं से रिटायर हुए। उनके समर्पण को देखते हुए कंपनी ने रिटायर होने के बाद उन्हें फिर से बुलाया। इस चाय बागान में उन्होंने न जाने कितने ही मजदूरों की जान बचाई थी। लेकिन उन्हीं लोगों ने उन्हें मार डाला। 
अपने पिता को बेस्ट फ्रेंड बताने वाली डॉ. दत्ता की बेटी सुमी कहती हैं डॉक्टर लोगों की जिंदगी बचाते हैं अगर उन्हें ही मार दिया जाएगा तो फिर क्या बचेगा। हम चाहते हैं इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। मैं अपने पिता के हत्यारों को फांसी पर लटकते देखना चाहती हूं।
मॉब लिंचिंग की इस घटना के चश्मदीद 27 साल के मनोज माझी ने बीबीसी को बताया, यह घटना शनिवार शाम करीब तीन बजे की है। चाय बागान के माज लाइन में रहने वाले 33 साल के सामरा मांझी की तबियत खराब होने के बाद उसके परिवार वाले उसे अस्पताल लेकर आए थे। उस समय डॉक्टर लंच टाईम पर घर गए हुए थे। खबर मिलने के बाद मैं भी वहां पहुंच गया था। मरीज की हालत काफी खराब थी इसलिए उनके रिश्तेदार थोड़े गुस्से में थे क्योंकि फोन करने के बावजूद बागान की एम्बुलेंस नहीं गई थी। थोड़ी देर बाद डॉ. दत्ता अस्पताल पहुंचे। नर्स भी आ गई थीं। इसके बाद मरीज को सलाइन चढ़ाया गया। एक इंजेक्शन भी लगाया। लेकिन इस बीच उसकी मौत हो गई।
वो कहते हैं इतनी देर में काफी भीड़ जमा हो गई थी। डॉक्टर ने अपनी ओर से हर कोशिश की थी लेकिन लोग इस बात पर गुस्सा थे कि डॉक्टर की ड्यूटी 3 बजे से थी फिर वे लेट क्यों आए।
मनोज का मानना है कि अगर उस दिन डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ टाईम पर अस्पताल में होता तो शायद यह घटना इतनी बड़ी नहीं होती।
इस बीच असम टी ट्राइब स्टूडेंट एसोसिएशन के जोरहाट इकाई के नेता टंकेश्वर राजपूत ने बताया कि पुलिस ने मॉब लिंचिंग की इस घटना में मंगलवार की रात को मनोज माझी को भी गिरफ़्तार कर लिया है।
बात कैसे बढ़ी और डॉक्टर पर हमला किसने किया?
इस सवाल का जवाब देते हुए मनोज कहते है, दरअसल मरीज के मरने की ख़बर जैसे ही बागान में फैली, अस्पताल में भीड़ जमा होने लगी। अस्पताल परिसर में खड़े कुछ लोग डॉक्टर को गंदी गालियां दे रहे थे। देखते ही देखते अस्पताल में सैकड़ों की भीड़ जमा हो गई थी। इस बीच कुछ लोग डॉक्टर के कमरे में घुस गए। उन्हें रोकने की कोशिश की गई, पुलिस भी मौके पर पहुंच गई थी लेकिन वो भी कुछ नहीं कर सकी। पुलिस की मौजूदगी में लोग डॉक्टर को पीट रहे थे। कुछ लडक़ों ने खिडक़ी और दरवाजे के शीशे तोड़ दिए। जिससे डॉक्टर के पैर की नश कट गई और काफी खून बहने लगा।उन लोगों ने घायल डॉक्टर को लेने आई एम्बुलेंस को भी वापस भेज दिया।
वो कहते हैं एक साल पहले भी ऐसी ही एक घटना अस्पताल में हुई थी। कुछ मरीजों ने डॉक्टर दत्ता पर बुरा बर्ताव करने के आरोप लगाए थे। बागान प्रबंधन से शिकायत भी की थी लेकिन उस समय किसी तरह की हिंसा नहीं हुई।
टियोक अस्पताल के पास रहने वाले एक शख़्स का कहना है कि डॉ. दत्ता को कभी भी बुरा व्यवहार करते नहीं देखा गया।
असम के चाय बागानों में इस तरह के हमले का यह पहला मामला नहीं है।
साल 2012 में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था। तिनसुकिया जिले के बोरदुमसा चाय बागान के मालिक मृदुल कुमार भट्टाचार्य और उनकी पत्नी को चाय मजदूरों ने उनके ही बंगले में जिंदा जला दिया था।
इसके अलावा बीते मई महीने में डिब्रूगढ़ जिले के डिकम चाय बागान में मजदूरों की भीड़ ने डॉ. प्रवीण ठाकुर को भी इसी तरह पीटा था।
उन्होंने बीबीसी से कहा, मुझे भी चाय बागान में लोगों ने इतनी ही बेरहमी से पीटा था। भगवान का शुक्रगुजार हूं मैं बच गया। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। कुछ लोग एक महिला मरीज को लेकर अस्पताल आए थे। तूफान की वजह से महिला पर एक पेड़ गिर गया था। वो अस्पताल लाने से पहले ही मर चुकी थी। लेकिन वो लोग समझने को तैयार ही नहीं थे। और उन लोगों ने मुझे पीटना शुरू कर दिया। मेरी हड्डी टूट गई थी। उन लोगों ने सोचा मैं मर गया। वहां अस्पताल के दो लोग थे जो मुझे एक कमरे में ले गए और बाहर से बंद कर दिया। तब जाकर मेरी जान बची।
आखिर चाय बागान के मजदूरों में इस तरह की कुंठा क्यों है?
 इस सवाल का जवाब देते हुए डॉ. ठाकुर कहते है, मैं पिछले 40 साल से चाय बागानों में काम कर रहा हूं। पहले इस तरह की घटना कम होती थी। उन लोगों में सहनशीलता का स्तर बहुत कम हो रहा है। वो परिवार में छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े के बाद नशे की दवाई खाकर जान दे देते है। कुछ ऐसे हैं जो अपनी पत्नी बच्चे को काट देते है।
असम में 1860 से 1890 के दशक के दौरान कई चरणों में चाय बागानों में मजदूरों के रूप में काम करने के लिए झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ से आदिवासी लोगों को यहां लाकर बसाया गया था। लेकिन इतने सालों में भी इनकी जिंदगी में कोई बदलाव देखने को नहीं मिलता।
असम के चाय बागानों में मजदूरों को ख़तरनाक और भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। कई चाय बागानों में मजदूरों के घर जर्जर हालत में हैं, टॉयल या तो टूट गए हैं या गंदगी से भरे हुए हैं। पीने का पर्याप्त पानी तक नहीं है। चाय बागानों में जो अस्पताल हैं उनमें किसी तरह की सुविधाएं नहीं दिखतीं।
टाटा समूह की उभरती इकाई
टियोक चाय बागान के स्वामित्व वाली कंपनी अमलगमटेड प्लांटेशन प्राइवेट लिमिटेड टाटा समूह की एक उभरती हुई इकाई है। इस कंपनी ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट में लिख रखा है कि 19वीं शताब्दी में चाय के अग्रणी दिनों में जेम्स फिनले के समय कंपनी की उत्पत्ति हुई थी जिसकी भारत के चाय उद्योग में एक प्रमुख भूमिका रही है। एक सदी बाद 1976 में, टाटा और फिनले एक साथ मिल गए और टाटा-फिनले नामक एक संयुक्त कंपनी का गठन हुआ। हालांकि कुछ वर्षों बाद फिनले ने अपने शेयर टाटा टी कंपनी को दे दिए।
इसके अलावा भी कंपनी ने चाय उद्योग में अपनी कई बड़ी उपलब्धियों का जिक्र कर रखा है। लेकिन टियोक चाय बागान में मजदूरों की कालोनियों में घूमने पर कंपनी की ये सारी उपलब्धियां धुंधली नजर आती हैं।
बागान के 1 नंबर माज लाइन में रहने वाली 42 साल की संगीता राजवार पिछले 24 साल से टियोक चाय बागान में काम कर रही है। संगीता एक स्थाई मजदूर है और उन्हें महीने मे 4 हजार रुपये वेतन मिलता है।
संगीता अपने काम के बारे में कहती हैं, बागान में मजदूरों को सुबह साढ़े सात बजे आना होता है और शाम 5 बजे छुट्टी होती है। मैं पहले पत्ते तोडऩे का काम करती थी लेकिन अभी सरदार हूं। मैं पत्ते तोडऩे वाली महीला मजदूरों को काम पर लगाती हूं। एक दिन में मजदूर को 24 किलो पत्ते तोडऩे होते है तब जाकर 167 रुपए की दिहाड़ी मिलती है। अगर कोई मजदूर 23 किलो से कम पत्ते तोड़ता है तो उसकी आधी मजदूरी काट ली जाती है। 
संगीता अपनी तकलीफों के बारे में कहती हैं, पत्ते तोडऩे के काम में सबसे ज्यादा तकलीफ गर्मियों में होती है। गर्मी में कई मजदूर बीमार पड़ जाते हैं। दस्त और उल्टी की शिकायत हो जाती है। इन बागानों में पीने के पानी की सुविधा भी नहीं होती। इसलिए कई बार बीमार पड़ जाते है। इसके बाद भी अगर अस्पताल में दवाई नहीं होगी और डॉक्टर जांच नहीं करेंगे तो क्या होगा? पिछले एक महीने में हमारी कॉलोनी में करीब 15 लोग मरे हैं और उनके परिवार को पता ही नहीं है कि वो मरे किस बीमारी से हैं।
सामरा माझी के छोटे भाई पुटुकोन कहते है, भइया बाथरूम में गिर गए थे। उनकों सिर में चोट आई थी। फोन करके बागान की एम्बुलेंस को बुलाया था लेकिन एम्बुलेंस नहीं आई। इसके बाद लोग ही उन्हें उठाकर अस्पताल ले गए। उस समय तीन बजे थे। लेकिन अस्पताल में डॉक्टर करीब 4 बजे आए थे। 
इस पूरी घटना में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हंै। क्योंकि जिस अस्पताल में मजदूरों की भीड़ ने डॉक्टर पर हमला किया था वहां से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ही पुलिस थाना है। पुलिस घटना स्थल पर समय पर पहुंच गई थी लेकिन वो डॉक्टर को भीड़ से बचा नहीं सकी।
जोरहाट जिले के पुलिस अधीक्षक एनवी चंद्रकांत मानते हैं कि भारी संख्या में जमा हुई भीड़ से निपटने में पुलिस को भी परेशानी हुई थी।
वो कहते है, अस्पताल के बाहर करीब तीन सौ लोगों की भीड़ थी। उस दिन एनआरसी की फाइनल लिस्ट भी पब्लिश हुई थी इसलिए पुलिस की कई जगह ड्यूटी लगी थी। लेकिन घटना की खबर मिलते ही पुलिस की एक टीम तुरंत मौक पर पहुंच गई थी। उन लोगों ने डॉक्टर को कमरे में बंद कर रखा था और वहां किसी को भी जाने नहीं दे रहे थे। बाद में पुलिस के अतिरक्त जवानों को भेजा गया और बहुत मुश्किल से उनकों निकाल कर अस्पताल ले जाया गया। 
फिलहाल पुलिस ने इस मामले में 36 लोगों को पकड़ा है जिनमें 22 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। अन्य लोगों से पूछताछ की जा रही है। उधर बागान प्रबंधन ने फैक्ट्री के गेट पर लॉक-आउट नोटिस चिपका कर ताला जड़ दिया है। चाय बागान बंद करने और घटना के संदर्भ में प्रतिक्रिया लेने के लिए बीबीसी ने मैनेजर मनोज गोगोई से फोन पर कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंन फोन नहीं उठाया और न ही मैसेज का जवाब दिया।

 

 

 

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