संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 सितंबर : अनजानी चाह के पीछे दौडऩे वालों पर मंडराता खतरा...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 सितंबर : अनजानी चाह के पीछे दौडऩे वालों पर मंडराता खतरा...
Date : 05-Sep-2019

फेसबुक पर दूसरे देशों के लोगों से ताजा-ताजा दोस्ती और मोहब्बत के नाम पर हिन्दुस्तान में आदमी तो कम लुट रहे हैं, औरतें अधिक लुट रही हैं। अपने आसपास के प्रदेशों को देखें, तो अधेड़ उम्र की, शादीशुदा, पढ़ी-लिखी, सरकारी नौकरी वाली, या संपन्न परिवारों की महिलाएं दसियों लाख रूपए गंवा दे रही हैं, और उसके बाद जाने किस तरह की और कितनी झिझक के साथ पुलिस में जाकर यह पूरा बखान कर रही हैं। यह सिलसिला नाइजीरिया के या किसी और देश के ठगों के बारे में सोचने का नहीं है, हिन्दुस्तानी समाज में शादीशुदा-अधेड़ महिलाओं के इस हैरतअंगेज रूख का है जिसकी कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकते थे। आमतौर पर हिन्दुस्तानी शादीशुदा महिला को अधिक जिम्मेदार माना जाता है, और शादीशुदा मर्द तो फिर भी किसी सस्ते विदेशी सफर पर जाकर मालिश-पॉलिश करवाकर आ जाने की चर्चा में रहते हैं, लेकिन महिलाओं से समाज अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करता है। अभी जो हाल सामने आ रहा है वह गिनती में भले कम हो, लेकिन नौजवान बच्चों की माताएं भी जिस तरह से ऐसे प्रेमजाल में फंस रही हैं, और आर्थिक नुकसान के साथ-साथ शर्मिंदगी भी झेल रही हैं, पूरे का पूरा परिवार तनाव में पड़ रहा है, और शायद टूटने का खतरा भी झेल रहा है, उसे देखते हुए इस पर समाजशास्त्रीय नजरिए से गौर करना चाहिए। 

किसी अनदेखे मर्द के मोह में इस हद तक पड़ जाना इन महिलाओं की जिंदगी में एक बड़े से शून्य का सुबूत दिखता है कि वे अपनी पारिवारिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है, और उन्हें बाहर एक महत्व, एक मोहब्बत की तलाश की जरूरत लग रही है। जिन परिवारों में ऐसे हादसे हो गए हैं, उन परिवारों से परे भी बाकी लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि परिवार के भीतर एक-दूसरे का ऐसा ध्यान कैसे रखा जाए कि लोग ऐसे जाल में न फंसें। वैवाहिक जीवन में भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि से लेकर परस्पर सामाजिक सम्मान जैसी बहुत सी बातें हैं जो कि पति-पत्नी को एक-दूसरे के बारे में सोचनी चाहिए, और परिवार के बाकी लोगों को भी घर की छत के नीचे परस्पर सम्मान का एक वातावरण रखना चाहिए। भारतीय समाज के खासे बड़े हिस्से में शादीशुदा महिला को एक-दो बच्चों के बाद घर चलाने वाली मान लिया जाता है, जो कि सही नौबत नहीं है। आज फिल्म, टीवी, अखबार, और सोशल मीडिया के चलते हर किसी को दुनिया भर में बिखरे हुए सपनों को देखना तो नसीब है ही, और ऐसे में जब अपने जीवन-साथी से कोई निराशा हो, दाम्पत्य जीवन में कोई बड़ी कमी हो, और बाहर किसी अनजाने से बहुत सा महत्व मिल रहा हो, तो लोग राह से इस तरह भटक भी जाते हैं, और खतरों में पड़ जाते हैं, बड़ा नुकसान पा जाते हैं। 

परिवार के सभी पीढिय़ों के लोगों को मिलकर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि परिवार के हर सदस्य को भावनात्मक सहयोग और समर्थन मिलता रहे, आपसी सम्मान और महत्व मिलता रहे, और एक-दूसरे की उम्मीदों को जहां तक मुमकिन हो वहां तक पूरा करने की कोशिश की जाए, या कम से कम इस बात की चर्चा भी की जाए कि क्या-क्या मुमकिन नहीं है। जीवन में अगर शारीरिक या मानसिक प्यास बनी हुई है, तो उसे अनदेखा करके किसी को यह सलाह नहीं दी जा सकती कि वे ब्रम्हचारी साधु-साध्वियों की तरह अपने आप पर काबू रखें। लोगों को इस तरह के काबू की न तो आदत होती है, और न ही किताबों से परे ऐसी कोई काबू हो सकते हैं। हर कुछ महीनों में तो किसी न किसी धर्म के, किसी आध्यात्मिक सम्प्रदाय के ऐसे ब्रम्हचारी के किस्से सामने आते ही हैं जो बताते हैं कि सांसारिक जीवन को छोड़कर ईश्वर की राह पर बढ़ते हुए भी कैसे नजर हटी, दुर्घटना घटी जैसी नौबत आती ही रहती है। और सामने आने वाले हर किस्से से सौ-सौ गुना अधिक किस्से ऐसे रहते होंगे जो कि सामने नहीं आते हैं। ठीक इसी तरह फेसबुक पर अनजानी चाह के पीछे दौड़ पडऩे वाले लोगों के जो मामले सामने आते हैं उससे हजारों गुना अधिक मामले ऐसे रहते होंगे, और इन खतरों को टालने का तरीका परिवार के भीतर ही ढूंढा जा सकता है, बाहर नहीं। 
-सुनील कुमार

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