संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 सितंबर : सड़कों पर गैरजिम्मेदार बनाना बहुत गलत बात
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 सितंबर : सड़कों पर गैरजिम्मेदार बनाना बहुत गलत बात
Date : 06-Sep-2019

देश में लागू हो चुके नए ट्रैफिक कानून का असर अभी अदालतों में देखने मिल रहा है जहां पहुंचने वाले मामलों पर नए जुर्माने के हिसाब से लंबा-चौड़ा भुगतान करना पड़ रहा है। देश के कई राज्यों में सड़कों पर भी इसी को लागू कर लिया है, और जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि किसी दुपहिया पर 23 हजार, और किसी ट्रैक्टर पर पौन लाख का जुर्माना लगाया गया है। छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं जहां राज्य सरकारें सड़कों पर जुर्माने के नए रेट लागू करने के बजाय समझौता शुल्क किस्म की पुराने रेट की वसूली कर रही है, और लोग अभी तक सस्ते में छूट रहे हैं। नए कानून के हिसाब से भारी-भरकम हजारों का जुर्माना तो दूर रहा, छत्तीसगढ़ में पुलिस पुराने कानून के हिसाब से भी पूरा जुर्माना नहीं कर रही है, और मामूली सौ-दो सौ का समझौता शुल्क लेकर छोड़ रही है। सरकार का यह रूख लोगों को अच्छा लग सकता है क्योंकि नया जुर्माना चुकाना सबके बस का नहीं है। 

लेकिन यहां पर एक बात को समझने की जरूरत है कि कागजात लेकर चलने, नंबर प्लेट सही रखने, बीमा करवाकर चलने, हेलमेट या सीट बेल्ट लगाकर चलने, और गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात न करने की बंदिशों में क्या गलत है? सरकारें अगर अपनी जनता को लुभाने के लिए ऐसी मामूली बातों पर अमल से भी लोगों को छूट देना चाहती हैं, तो वह निहायत ही गलत बात है। ये जुर्माने ऐसे नहीं हैं कि जो सावधान लोगों पर भी कभी लगें। ये ऐसे ही हैं जो कि अपनी मर्जी से कानून तोडऩे वाले लोगों पर ही लग सकते हैं। अब अगर पूरे देश का मिजाज यही बनाकर रखना है कि वे कानून तोड़ें, खुद लापरवाही बरतें, और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालें, तो हमारा ख्याल है कि ऐसी छूट देने का कोई हक किसी सरकार को भी नहीं मिलना चाहिए कि सोच-समझकर अपनी मर्जी से नियम तोडऩे वालों पर भी जुर्माना न लगे। यह सिलसिला लोगों को न सिर्फ सड़क पर ट्रैफिक के मामले में, बल्कि बहुत से दूसरे मामलों में भी नियमों को तोडऩे के लिए हौसला देता है जिससे देश में एक अराजकता की नौबत आती है। 

हम आम लोगों के बीच नियमों की हिकारत के बहुत से खतरे देख रहे हैं। अब लोग इलाज करने वाले उस डॉक्टर को ही मार डाल रहे हैं जिसने कि उस बीमार के लिए अपना खून भी दिया था। भीड़ जगह-जगह लोगों को किसी भी शक में, कोई भी आरोप लगाकर मार रही है, और ऐसी हत्याएं बढ़ती जा रही हैं। ऐसे देश में लोगों के मिजाज को रियायतें देकर अराजक बनाने के खतरे दूर तक जाएंगे, और आने वाली पीढ़ी को भी खतरे में डालेंगे। इसलिए जुर्माने की रकम कम या अधिक हो, इतने पर ही बहस होनी चाहिए, जुर्माना न हो, या महज प्रतीकात्मक जुर्माना हो, यह नहीं होना चाहिए। नियम-कायदे को मानकर चलने वाले लोगों को एक सुरक्षित सड़क का पूरा हक है, और नियम तोडऩे वाले लोग अपने साथ-साथ दूसरों की मौत की नौबत भी लाते हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार में या ऐसे दूसरे प्रदेशों की सरकारों में बैठे हुए लोगों को अधिक रियायत के बारे में नहीं सोचना चाहिए। दुनिया के जिन देशों में बड़ा जुर्माना और कड़ी सजा लागू है, वहां पर लोग ट्रैफिक नियम तोडऩे के पहले कई बार सोचते भी हैं। हो सकता है कि नए कानून में लगाए गए जुर्माने के हिसाब से लोग जिम्मेदार नहीं हो पाए हैं, लेकिन इन्हें कुछ हफ्ते का समय देकर राज्य सरकारों को कानून लागू होने देना चाहिए जो कि आज अदालतों तक सीमित रखा गया है। सड़क पर खतरे खड़े करना सोशल मीडिया पर ही मजाक की बात हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में इससे बेकसूर मौतें होती हैं। बड़ी-बड़ी महफूज गाडिय़ों में चलने वाली सत्ता को सड़क के गरीबों की मौतों का सामान जुटाने का कोई हक नहीं हो सकता, और राज्य सरकारों को जनता को लुभाने के बजाय जनता को जिम्मेदार बनाना चाहिए। शुरुआती जुर्माने से कुछ लोगों का दीवाला भी निकल सकता है, लेकिन एक बात तय है कि लोग मामूली बातों पर अमल करके चलेंगे, तो उन्हें कभी बड़ा जुर्माना नहीं होगा। छत्तीसगढ़ की अदालत में दस-दस हजार रूपए जुर्माना लगा दिया है, और ऐसे कुछ शुरुआती लोगों की बलि के बाद हो सकता है कि आगे बाकी लोगों को ज्ञान प्राप्त हो।
-सुनील कुमार

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