विशेष रिपोर्ट

मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस
मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस
Date : 11-Sep-2019

मदनवाड़ा नक्सल हमले की न्यायिक जांच के आदेश से प्रमोशन की कानूनी जंग लड़ते सिपाही को इंसाफ की आस 

प्रदीप मेश्राम
राजनांदगांव, 11 सितंबर(छत्तीसगढ़)।
मदनवाड़ा-कोरकोट्टी नक्सल हमले की नए सिरे से न्यायिक जांच के राज्य सरकार के आदेश ने नक्सल घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे एक सिपाही की आऊट-ऑफ टर्न (ओटी) प्रमोशन को लेकर चल रही कानूनी जंग को मानो पंख लगा दिया है। 

12 जुलाई 2009 को हुए इस वारदात में गोलियों की बौछार के बीच चालक प्रधान आरक्षक ओंकार देशमुख (बैच 494)ने तत्कालीन एसपी विनोद चौबे के वाहन को धड़धड़ाते हुए निकालते नक्सलियों के पहले हमले को अपनी सूझबूझ से असफल कर दिया। जबकि वाहन में एसपी के सुरक्षाकर्मी संजय यादव को लगभग 50 से अधिक गोलियां लगी। वहीं एसपी के फालोवाहन के ड्रायवर बी. सीतराम राजू कमर में गोली लगने से घायल हुए थे। बाद में पूरी लड़ाई के खात्मे तक एसपी चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए। 

बताया जाता है कि बहादुरी के साथ नक्सलियों से भिडऩे के एवज में राज्य सरकार ने जवानों को ओटी के तहत प्रमोशन देने का ऐलान किया था। शुरूआत में मौखिक रूप से चालक देशमुख को सूची में नाम होने की जानकारी दी गई। लड़ाई में शामिल होने के लिए तत्कालीन दुर्ग रेंज आईजी मुकेश गुप्ता और रक्षित निरीक्षक गुरजीत सिंह को जहां वीरता पदक से नवाजा गया, वहीं 18 जवानों को ओटी दिए जाने का ऐलान किया, लेकिन चालक देशमुख का नाम गायब हो गया। 

 वारदात स्थल पर जाने से पहले विभागीय रोजनामचे में देशमुख की रवानगी का उल्लेख है। सूची में नाम नहीं होने के बाद प्रधान आरक्षक सन्न रह गया। बताया जाता है कि ओटी दिए जाने से पहले हुए विभागीय कथन में पूरी लड़ाई को लेकर एक अफसर की गैरमौजूदगी पर सही जानकारी देना ओंकार देशमुख को भारी पड़ गया। सूची में नाम नहीं होने के बाद यह सुरक्षाकर्मी अफसरों की चौखट पर पहुंच कर वास्तविक स्थिति को बयां करते थक गया। आखिरकार 2015 में हाईकोर्ट में प्रमोशन के लिए ओंकार देशमुख ने अपील की। 

बताया जाता है कि एक शीर्ष अफसर की आंखों में खटकने के कारण ओंकार को उसके हक से वंचित कर दिया गया। जबकि लड़ाई के दौरान बख्तरबंद वाहन में सवार सीआरपीएफ के एक चालक को सरकार ने ओटी दिए जाने की सिफारिश की। ओंकार देशमुख ने अपने साथ हुए कथित हेरफेर को लेकर हाईकोर्ट में पुख्ता दस्तावेज पेश किए है। 

पूर्व एसपी प्रवीर दास ने भी देशमुख के नाम का उल्लेख नहीं होने पर हैरानी जताई थी। वहीं पूर्व एसपी बीएन मीणा ने दोबारा पत्र लिखकर राज्य सरकार से ओटी देने की सिफारिश की थी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लड़ाई के दौरान कंट्रोल रूम के जरिए परिजनों को देशमुख के शहीद होने की जानकारी भी दे दी थी। 

पूरी लड़ाई में देशमुख कोरकोट्टी गांव में हुए नक्सली हमले के गवाह है। बताया जाता है कि एक आला अधिकारी ने लड़ाई में अपनी भूमिका को दमदारी से दिखाने के लिए कई तरह का बदलाव कर दिया। नतीजतन देशमुख इसी कुच्रक में फंसकर ओटी से वंचित हो गए। उधर लड़ाई में बतौर साहसी होने देशमुख को राजधानी रायपुर में एक कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सम्मानित किया। लेकिन सरकार में बैठे एक अफसर के इशारे पर इस सुरक्षाकर्मी को ओटी देने से दूर कर दिया गया।

बताया जाता है कि प्रधान आरक्षक के अपील के जवाब में सरकार ने दुर्ग रेंज के आईजी रहे मुकेश गुप्ता के अभिमत के आधार पर ओटी नहीं देने की हाईकोर्ट में जानकारी दी है। प्रधान आरक्षक की ओर से नक्सल जंग में जाने से पहले के कई प्रामणिक दस्तावेज जमा किए गए है। महकमे के कई अफसरों ने प्रधानआरक्षक के साथ हुए बर्ताव पर अफसोस भी जाहिर किया। अब जबकि सरकार ने इस वारदात की न्यायिक जांच की घोषणा की है तो प्रधान आरक्षक हाईकोर्ट से न्याय मिलने की आस में है।

 

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