संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 सितंबर : बलात्कार की रिपोर्ट पर हिरासत मौतों की तरह अनिवार्य कार्रवाई तय हो
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 सितंबर : बलात्कार की रिपोर्ट पर हिरासत मौतों की तरह अनिवार्य कार्रवाई तय हो
Date : 11-Sep-2019

हिन्दुस्तान बड़े ही अजीब दौर से गुजर रहा है। उत्तरप्रदेश के उन्नाव में एक सत्तारूढ़-विधायक के बलात्कार की शिकार लड़की ने मुंह खोला, तो उसके पूरे परिवार को खत्म कर दिया गया, और वह मौत से लड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर दिल्ली के एम्स में भर्ती की गई है, और वहां पर उसका बयान दर्ज करने के लिए एक विशेष अदालत बनाकर आज वहीं पर काम किया जा रहा है। यह खबर महीनों से सुर्खियों में रही है, और एक सत्तारूढ़ विधायक किस हद तक, किस-किस तरीके से कानून के हाथों से बचाया जाता है, इस पर यूपी की योगी सरकार एक किताब लिख सकती है। एक दूसरा मामला लंबे समय से खबरों में है, और अब सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद यूपी की पुलिस उसे दर्ज करके उस पर कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार हुई है, इस मामले में एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद एक लड़की से लंबे समय तक बलात्कार की तोहमत के घेरे में हैं, और अब वह छात्रा वीडियो सुबूतों के साथ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी हुई है। यह सोचने की बात है कि इन दोनों ही मामलों में उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक और सांसद को बलात्कार के साफ-साफ मामले में बचाने के लिए सरकार किस हद तक जा सकती है, और देश की सबसे बड़ी अदालत को इसमें कैसे दखल देना पड़ रहा है। देश भर में हर दिन दर्जनों बलात्कार होते हैं, और उनमें सत्तारूढ़-ताकतवर बलात्कारियों को बचाने के लिए अगर राज्यों की सरकारें इसी तर्ज पर आमादा हो जाएंगी, तो बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के सामने खुदकुशी करने के अलावा और रास्ता क्या बचेगा? देश में औसतन हर महीने एक न एक खुदकुशी ऐसी भी हो रही है, और हो सकता है कि यह गिनती महीने में एक से अधिक भी हो। 

अब जब देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसे कुछ मामलों में दखल दे रही है, और कुछ बरस पहले के देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश में बनाए गए सैकड़ों करोड़ के एक फंड की रकम पड़ी हुई भी है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में सोच-समझकर साजिशन बलात्कारियों को बचाने की कोशिशों पर जिम्मेदार अफसरों को जेल भेजकर एक मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए? आज तकरीबन पूरे देश में पुलिस का रूख बलात्कार की शिकार लड़की या महिला के लिए हिकारत का रहता है, और पुलिस हर जगह परिवार को समझाने से लेकर धमकाने तक में लग जाती है कि रिपोर्ट लिखाने से बदनामी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा। ऐसी धमकियों से पुलिस यह तो साफ कर ही देती है कि कम से कम इंसाफ तो हासिल नहीं होगा। और ऐसे ही एक मामले में अभी पिछले हफ्ते ही छत्तीसगढ़ में एक नाबालिग लड़की ने बलात्कार के बाद उसे एक सरकारी कार्यक्रम में पेश करने के बाद हताशा में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 

हिन्दुस्तानी समाज बलात्कार को लेकर इस कदर संवेदनाशून्य हो गया है कि अभी पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ की नाबालिग बलात्कार-पीडि़त की इस खुदकुशी पर कोई चर्चा भी नहीं हुई, और एक सड़क हादसे की तरह यह खबर आई और चली गई। यह समाज बलात्कार को अपनी संस्कृति का एक हिस्सा मानकर चल रहा है, और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला बेइंसाफी को ही अपनी नियति मानकर जीते जी मर जाती है या मरकर एक और खबर में एक दिन और जिंदा रह जाती है। हैरानी की बात यह है कि देश भर में बिखरे हुए लाखों पुलिस थानों और दसियों हजार अदालतों के रहते हुए भी देश की सबसे बड़ी अदालत को ऐसे एक-एक मामले में मुंह खोलना पड़ रहा है जिसमें अगर एक थाना अपनी जिम्मेदारी पूरी करता तो बात वहीं से सीधे जेल और अदालत चली गई होती। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे प्रदेशों, ऐसी सरकारों, और ऐसे जिलों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करने की एक पहल करनी चाहिए, और ऐसी साजिश में भागीदारों की वर्दियां उतरनी चाहिए। आज देश का हाल इतना खराब है कि बहुत से लोग यह मनाते हैं कि उनकी बच्चियां न हों, और बहुत से गरीब-मजदूर मां-बाप यह सोचकर भी बाल विवाह कर देते हैं कि घर में बच्ची को कैसे अकेले छोड़कर काम पर जाएं। आज देश की सरकारें अपने पसंदीदा मुजरिमों को बचाने के लिए जिस तरह ओवरटाईम करते दिखती हैं, उसे देखते हुए कम से कम बलात्कार या महिला शोषण के दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट को उसी तरह एक जिम्मेदारी तय करनी चाहिए जिस तरह हर हिरासत मौत के बाद थाने के पुलिस वाले हटाए जाते हैं, और अनिवार्य रूप से दंडाधिकारीय जांच होती है। बलात्कार की हर रिपोर्ट के बाद ऐसी ही एक प्रक्रिया तय करनी होगी, वरना सत्ता और पुलिस मिलकर एक संगठित अपराधी गिरोह की तरह काम करते रहेंगे। 
-सुनील कुमार

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