संपादकीय

 दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 सितंबर : सारे बड़े नेता-अफसर नार्को टेस्ट करवाएं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 सितंबर : सारे बड़े नेता-अफसर नार्को टेस्ट करवाएं...
Date : 14-Sep-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों अलग-अलग अफसरों और नेताओं के एक-दूसरे के खिलाफ बयान ज्वालामुखी से निकलकर आसमान तक पहुंचने वाले लावे की तरह चारों तरफ बिखर रहे हैं। हलफनामे, अदालतों में बयान, जेल, अस्पताल, ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग, स्टिंग ऑपरेशन, और पुलिस या दूसरी सरकारी जांच। जिस तरह किसी ज्वालामुखी से निकली हुई राख चारों तरफ धरती और आसमान को ढांक लेती है, उसी तरह छत्तीसगढ़ में सारी खबरें राजनीतिक और आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार और सत्ता के बेजा इस्तेमाल की जानकारी और आरोप से प्रदेश को ढांक चुकी हैं। हर दिन के अखबार कई नई सनसनीखेज बातें लेकर आते हैं, और नेताओं पर से लोगों का भरोसा कुछ और हद तक खत्म हो जाता है, अफसरों को लेकर यह सोच और पुख्ता हो जाती है कि वे ताकत और नेताओं के सामने बिछे रहते हैं। 

ऐसे में कुछ बरस पहले कांग्रेस प्रत्याशी घोषित हो जाने के बाद रहस्यमय तरीके से नाम वापिसी वाले मंतूराम पवार ने उनकी खुद की खरीद-बिक्री को लेकर उस वक्त के भाजपा मंत्री-मुख्यमंत्री, और जोगी पिता-पुत्र पर अदालती बयान देकर आरोप लगाए हैं, और कहा है कि स्टिंग ऑपरेशन की आवाज से मिलाने के लिए वे अपनी आवाज का नमूना देने के लिए तैयार हैं, और अब भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपने दामाद की आवाज का नमूना दिलवाएं जिसे कि स्टिंग ऑपरेशन में एक आवाज माना जा रहा है। हमने मंतूराम पवार की इस मांग के पहले ही इसी जगह लिखा था कि सार्वजनिक जीवन के प्रमुख लोगों को जरूरत पडऩे पर अपनी आवाज का नमूना देने से बचना नहीं चाहिए, और सबको खुलकर जांच और अदालती कार्रवाई का सामना करना चाहिए। लुकाछिपी का खेल पेशेवर मुजरिमों के लिए छोड़ देना चाहिए जो कि अदालत से बचने के लिए आवाज का नमूना देने से कतराते हैं। अब छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद से अब तक के इतने सारे बड़े-बड़े स्कैंडल हो चुके हैं, और उनमें प्रदेश के दर्जनों बड़े नेता और उनके परिवार, उनके कार्यकाल के बड़े अफसर शामिल दिखते हैं कि आज सार्वजनिक रूप से यह मांग होनी चाहिए कि सारे नेता झूठ को पकडऩे वाली जांच के लिए तैयार हों, और नार्को टेस्ट जैसी जांच के लिए भी सहमति दें ताकि उनसे उनके कार्यकाल के तमाम आरोपों पर बात की जा सके। 

जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, जनता के सामने वोट मांगने जाते हैं, संविधान की शपथ लेकर सत्ता पर आते हैं, और लोकतंत्र को हांकते हैं, उन लोगों को ऐसा छोटा सा त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए जिससे कि उन पर लगे सारे आरोपों को धोने का एक मौका भी मिलता हो। राजनीति के लोग जनता की अदालत में घिर जाने पर कानून की अदालत जाने का रास्ता पकड़ते हैं, और कानून की अदालत में माहौल जब उनके खिलाफ दिखता है तो वे जनता की अदालत की बात करते हैं। ऐसे सारे नेताओं को एक साथ, एकमुश्त ऐसी चुनौती मिलनी चाहिए कि वे आरोपों के जवाब में सच का सामना करने को तैयार हों, और उससे सार्वजनिक जीवन की गंदगी खत्म भी हो। मंतूराम पवार कांग्रेस के प्रत्याशी घोषित हुए थे, और फिर उनकी खरीद-बिक्री की टेलीफोन रिकॉर्डिंग सामने आई थी। दूसरे भी बहुत सारे मामले हैं जिनमें लोगों ने एक-दूसरे के खिलाफ हलफनामे दिए हैं, जांच एजेंसियों ने सुबूत हासिल किए हैं, और जनता को भी बहुत से नेताओं और अफसरों पर शक है। ऐसे में संविधान की शपथ को पूरा करने के लिए, जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने के लिए, और इस देश की अदालतों पर से पुलिस और जांच एजेंसियों पर से गैरजरूरी और नाजायज बोझ घटाने के लिए इस प्रदेश के तमाम आरोपग्रस्त नेताओं को नार्को टेस्ट के लिए तैयार होना चाहिए, ताकि जो साफ-सुथरे हों, वे चमकदार सफेदी के साथ जनजीवन में लौटें, और जो दागदार हैं, वे जनता के सामने से हट भी जाएं। हमारा ख्याल है कि सत्ता के लिए, या लोकतंत्र में दूसरे संवैधानिक पदों के लिए लोग संविधान की जो शपथ लेते हैं, उसके पालन की जो शपथ लेते हैं, वही शपथ उन्हें ऐसी जांच के लिए मजबूर भी करती है, किसी जनसंगठन को बड़ी अदालत जाकर सारे नेताओं और बड़े अफसरों को उन पर लगे आरोपों को लेकर नार्को टेस्ट का सामना करने का आदेश मांगना चाहिए, और तमाम बड़े लोगों को खुद होकर भी इसके लिए सामने आना चाहिए। यह राज्य बनने के बाद से अब तक जितनी गंदगी हो चुकी है, उस पर पूर्णविराम लगाने का यही एक तरीका हो सकता है। 
-सुनील कुमार

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