संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 सितंबर : आने वाला वक्त पता नहीं  कैसे खतरे लेकर आएगा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 19 सितंबर : आने वाला वक्त पता नहीं कैसे खतरे लेकर आएगा
Date : 19-Sep-2019

सऊदी अरब में सबसे बड़ी तेल कंपनी पर एक ड्रोन हमले से उसके पेट्रोलियम कारखाने को बड़ा नुकसान पहुंचा है, और पूरी दुनिया में तेल के भाव एकदम से बढऩे का बड़ा खतरा खड़ा हो गया है। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यह हमला सऊदी अरब के खिलाफ काम कर रहे यमन के विद्रोहियों ने किया है जो कि किसी देश की फौज जितनी ताकतवर नहीं हैं, महज हथियारबंद बागी लोग हैं जो कि दुनिया के अलग-अलग देशों में कई जगह रहते हैं, हिन्दुस्तान में भी कहीं नक्सली हैं, तो कहीं कोई और समूह काम कर रहा है। अब अगर ड्रोन से ऐसे हमले करके किसी कारखाने पर एक हमले से दुनिया की अर्थव्यवस्था में तहलका लाया जा सकता है, तो यह भी सोचना चाहिए कि ड्रोन जैसी अब मामूली हो चुकी तकनीक से और क्या-क्या हो सकता है? 

मोटे तौर पर फोटोग्राफी के लिए इस्तेमाल होने वाले ड्रोन का फौजी निगरानी के लिए भी इस्तेमाल होता है, और सामानों को घर पहुंचाने वाली कंपनियां लगातार प्रयोग कर रही हैं कि वे किस तरह ड्रोन से सामान पहुंचाएं। कुल मिलाकर हवा में उड़कर जाने वाला यह छोटा सा उपकरण अधिकतर जगहों पर कानूनी दर्जा प्राप्त है, और ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि वह गैरकानूनी इस्तेमाल से आखिर कितनी दूर है? दुनिया के कई देश अपनी फौज में ड्रोन का इस्तेमाल न सिर्फ निगरानी के लिए बल्कि हथियार गिराने के लिए भी कर रहे हैं, या उसकी क्षमता हासिल कर चुके हैं। ऐसे में बागियों तक, या आतंकियों तक ऐसी तकनीक के पहुंच जाने में कोई शक तो है नहीं। अब दुनिया को साइबर हमले जैसे एक नए खतरे के अलावा ड्रोन हमले की अलग-अलग किस्मों की आशंकाओं को भी देखना होगा। ड्रोन हमलों से अगर पानी की टंकियों में कोई रसायन डाला जा सके, या बिजली के बड़े खंभों को नुकसान पहुंचाया जा सके, किसी इलाके में मोबाइल फोन के टॉवर पर हमला किया जा सके, तो क्या होगा? क्या आज हम सचमुच ऐसे किसी खतरे से कुछ दूर हैं, या फिर वह खतरा आ चुका है, और बस ऐसे हमले की देर है? 

जैसा कि दुनिया में हर वक्त होता है, टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जब तक सरकार या सुरक्षा एजेंसियां करती हैं, तब तक बड़े मुजरिम उसका इस्तेमाल कर चुके होते हैं, और उसकी तोड़ भी निकाल चुके होते हैं। बैंक जितने किस्म की तकनीक से जालसाजी रोकने की कोशिश करती हैं, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलते हैं। ठीक ऐसा ही दूसरी तकनीक के बारे में भी रहता है और ड्रोन की हमलावर-संभावनाओं को आतंकियों ने अब तक नजरअंदाज तो किया नहीं होगा। लोगों को याद होगा कि अमरीकी राष्ट्रपति भवन के बारे में कई बार खबरें आती हैं कि खतरनाक-जानलेवा रसायन लगी हुई चि_ियां अमरीकी राष्ट्रपति के नाम भेजी जाती हैं, और वहां सुरक्षा कर्मचारी उनकी रासायनिक जांच करके उन्हें पहले ही रोक देते हैं। अब पल भर के लिए यह सोचें कि ऐसे फैलने वाले रसायनों को ड्रोन से किसी घर पर, किसी बगीचे में, किसी स्वीमिंग पूल के पानी में अगर डाल दिया जाए, तो कौन सी सुरक्षा तकनीक ऐसे हमलों को रोक सकेगी? दरअसल तकनीक और हथियारों के बेजा इस्तेमाल के खतरे को समय रहते आंक पाना हिन्दुस्तान जैसी सरकार की न तो प्राथमिकता में दिखता, और न ही उसकी कोई ऐसी तैयारी दिखती। इस देश में बैंकिंग को आम लोगों के लिए भी बुलडोजर से धकेलकर तेजी से डिजिटल की ओर किया गया है, लेकिन न तो गरीब आम जनता की डिजिटल समझ इतनी है, और न ही डिजिटल तकनीक सुरक्षित ही है। नतीजा यह हो रहा है कि बड़ी संख्या में रोजाना ठगी हो रही है, लोगों को ऑनलाईन लूटा जा रहा है, और तरह-तरह के दूसरे जुर्म हो रहे हैं। डिजिटल तकनीक को एक तिलस्म की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और सांस लेने पर भी हिन्दुस्तान में आधार कार्ड जैसी डिजिटल शिनाख्त को अनिवार्य करने की सोच लोगों की जिंदगी की निजता को पूरी तरह खत्म कर चुकी है। आने वाला वक्त ऐसे अनदेखे, अनसोचे खतरों का रहने वाला है जिसमें हर डिजिटल जानकारी पर साइबर हमला कामयाब हो सकेगा। 

ड्रोन तकनीक से अगर दुनिया के सबसे बड़े कारखानों पर ऐसा हमला हो सकता है, सऊदी अरब जैसी बड़ी फौज के रहते हुए हो सकता है, तो दुनिया में कहीं भी ड्रोन कैमरे आम जगहों पर जाने किस तरह के रसायन छिड़क सकते हैं, या रेडियोधर्मिता फैला सकते हैं। ऐसी तकनीक से रोकथाम और बचाव की कोई तैयारी आज नहीं दिख रही है, और आने वाला वक्त पता नहीं कैसे खतरे लेकर आएगा। 
-सुनील कुमार

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