संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 सितंबर : दलित, शौचालय, और पानी की कमी के कई पहलू...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 सितंबर : दलित, शौचालय, और पानी की कमी के कई पहलू...
Date : 26-Sep-2019

मध्यप्रदेश के शिवपुरी इलाके में राजघरानों का असर आजादी की करीब पौन सदी बाद भी पूरी तरह गया नहीं है, और उस इलाके से दलितों पर जुल्म की खबरें कई बार आती हैं। लेकिन देश भर से जब भी ऐसी कुछ खबरें आती हैं तो वे हत्या या हिंसा की रहती हैं, बलात्कार की रहती हैं, आम जिंदगी में बड़े जुर्मों से नीचे की छोटी हिंसा तो खबरों में आ भी नहीं पाती। ऐसे में समाज में जो भेदभाव जारी है, वह महज बड़ी हिंसा के आंकड़ों तक सीमित मानना जायज नहीं होगा। अब कल की खबर यह है कि शिवपुरी जिले में दो दलित बच्चे सड़क किनारे पखाना कर रहे थे, और गांव के ही दो दबंग-जाति के नौजवानों ने लाठियों से पीट-पीटकर उन्हें मार डाला। गांव में इसी यादव जाति की आबादी अधिक है, और यहां पर गांव के सारे लोगों के पानी ले लेने के बाद ही दलितों को पानी लेने की इजाजत है। 

महिलाओं से बलात्कार और दलितों पर सभी किस्म के जुल्म के मामले में मध्यप्रदेश देश के सबसे ऊपर के राज्यों में हैं। मध्यप्रदेश के सीधी-सतना के इलाके, और ग्वालियर के आसपास के इलाके सैकड़ों बरस से एक सामंती सोच के शिकार हैं, और यहां पर सार्वजनिक जीवन की बोलचाल की भाषा में भी दबंग जातियों के नेताओं के लिए सामंती शिष्टाचार अनिवार्य रहता है। ऐसे में दलितों पर जुल्म इन इलाकों के लोगों के बीच एक ऐसा सामाजिक तनाव भी खड़ा कर रहा है जो कि इस सदी में शायद अधिक समय तक अहिंसक न रहे, हो सकता है कि हिंसा के जवाब में वंचित तबके के लोग भी हिंसा पर उतर आएं, और जिस तरह डकैत फूलन ने जुल्म के जवाब में जुल्म किए थे, हो सकता है कि संगठित दलित तबके भी कहीं-कहीं इसका जवाब देने को खड़े होने लगें। जब देश का कानून और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोगों को बचा नहीं पाती है, तो उनको अपने आपको बचाने का हक तो रहेगा ही। 

लेकिन इस जाति व्यवस्था से परे एक दूसरी बात को भी इससे जोड़कर देखने की जरूरत है। अभी कल ही अमरीका गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बिल गेट्स के बनाए हुए एक सामाजिक-समाजसेवी संगठन ने भारत में शौचालय बनाने के लिए सम्मानित किया है। हम पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को देखें तो यह समझ पड़ता है कि गांवों को, या जिलों को खुले में शौच से मुक्त घोषित करना सरकारी भ्रष्टाचार की एक बड़ी ढाल है, और हजारों करोड़ रूपए इस पर खर्च किए गए हैं जिनमें से पता नहीं कितना बड़ा हिस्सा फर्जी आंकड़ों को खड़े करने में खर्च कर दिया गया है, या अपनी जेब में रख लिया गया है। शौचालयों की दीवारें नहीं उठीं, सरकारी फाईलों पर आंकड़े उठ गए। लेकिन इन सबसे परे भी एक और बड़ी बुनियादी बात भारत के इस शौचालय अभियान को चुनौती देते हुए खड़ी है, वह है पानी की कमी। देश के एक बहुत बड़े हिस्से में साल के कई महीने पीने को भी पानी नसीब नहीं होता है, और इस बरस तो कुछ महानगरों में पानी पर कत्ल भी हो चुके हैं। कई-कई मील दूर अगर पानी मिलता भी है, तो भी उसे ढोकर लाने का जिम्मा अकेली महिला का रहता है, और शौचालय के लिए पानी ढोने का अतिरिक्त बोझ भी महिला पर ही पड़ता है। देश भर में कहीं पानी की कमी से, तो कहीं अधूरे निर्माण की वजह से शौचालय काम के नहीं हैं। ऐसे में जब बिल गेट्स फाऊंडेशन ने मोदी का सम्मान किया, तो राजनीतिक विचारधारा से परे के लोगों ने भी यह सवाल उठाए कि क्या शौचालयों की हालत देखते हुए, महिलाओं पर उनका अतिरिक्त बोझ देखते हुए यह सचमुच ही किसी सम्मान की बात है? 

शौचालयों को लेकर सत्ता की दीवानगी इस हद तक चली गई है कि देश में कई जगहों पर खुले में शौच करने वाले लोगों की तस्वीरें खींचने का काम वहां की म्युनिसिपल या पंचायत करने लगीं, बिना यह सोचे कि क्या लोगों की जिंदगी की निजता का भी कोई महत्व है? जगह-जगह लोगों पर सैकड़ों रूपयों का जुर्माना लगाया जाने लगा, और उन रसीदों की तस्वीरें हवा में तैरती रहीं। इसे एक सामाजिक उन्माद के रूप में इतना फैलाया गया कि जिस घर में शौचालय न हो, उस घर में अपनी बेटी न ब्याही जाए। लेकिन यह नहीं सोचा गया कि पानी की अधिक खपत वाले ऐसे फ्लश वाले शौचालयों के लिए पानी कहां से आएगा? सफाई को पेट भरने से भी बड़ा मुद्दा मान लिया गया, और जब दबंग जातियों या दबंग लोगों की बददिमागी बढ़ी तो सड़क किनारे शौच पर बैठे दलित बच्चों को लाठियों से पीटकर मार भी डाला गया। साफ-सफाई की सोच अच्छी है, लेकिन उसे ऐसे उन्मादी और हिंसक राष्ट्रवाद में तब्दील नहीं करना चाहिए कि वह देश की महिलाओं पर अंधाधुंध अतिरिक्त बोझ लाद दे, या जनता के पैसों को फर्जी आंकड़ों को गढऩे में खर्च करने लगे। जाति व्यवस्था, और शौचालय व्यवस्था, इन दोनों के बीच की एक कड़ी अभी सामने आना बाकी ही है, जब करोड़ों नए बन रहे शौचालयों की टंकियां साफ करने का समय आएगा, और उस समय उनकी सफाई के लिए एक बार फिर दलितों की तलाश होगी, जो कि सिर पर पखाना ढोकर ले जाकर खेतों में डालेंगे। यह सामाजिक दिक्कत आना अभी बाकी ही है। 
-सुनील कुमार

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