संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 सितंबर : सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट  को लेकर सोचने की बातें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 27 सितंबर : सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को लेकर सोचने की बातें
Date : 27-Sep-2019

देश की बड़ी अदालतों की कुछ बातें समझ नहीं आती हैं। आजादी के पहले से चल रहा रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद का मामला अब निपटा देने के फेर में मौजूदा मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के आखिरी कुछ हफ्तों में सुनवाई और फैसला लिखवाना, इन दोनों पर आमादा हो गए हैं। इंसाफ रफ्तार से होना तो अच्छी बात है, लेकिन इस रफ्तार को किसी के रिटायरमेंट से जोड़कर इस तरह बढ़ाना किसी बेइंसाफी का सबब भी बन सकता है। कुछ वकीलों ने पहले भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की इस व्यवस्था का विरोध किया था कि सुनवाई पूरी होने तक हफ्ते में पांच दिन यही मामला चलेगा, और सभी पक्षों के वकील रोज सुनवाई में शामिल रहेंगे। यह रूख वकालत के पेशे के लिए भी दिक्कत का था क्योंकि वकीलों के पास कई मामले रहते हैं, और किसी एक मामले में महीनों तक लगे रहना उनके लिए परेशानी का सबब होता है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश अपने रिटायरमेंट के पहले यह फैसला लिखकर जाना चाहते हैं क्योंकि यह एक ऐतिहासिक मामला है, और कोई भी जज ऐसा इतिहास बनाए बिना रिटायर हो जाना नहीं चाहते। दूसरी बात यह भी है कि सुनवाई वाले जज अगर रिटायर हो जाएं, तो नए जज को शायद फिर सिरे से मेहनत करनी होगी, और मामला फिर बड़ा लंबा खिंचेगा। 

लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के हाईकोर्ट में एक दूसरे मामले में अदालत का एक दूसरा रूख सामने आ रहा है। जोगी परिवार से जुड़े एक मामले की सुनवाई करने से कल बिलासपुर हाईकोर्ट के एक और जज न इंकार कर दिया। जोगी की जाति को लेकर अनंतकाल से चल रहे इस मामले में कल एक जज ने इसलिए अपने को अलग कर दिया कि वे पहले सरकारी वकील थे और उन्होंने इस मामले में सरकार की तरफ से जवाब दिया था। हमको अदालत की कार्रवाई की तकनीकी बारीकियां नहीं मालूम हैं, लेकिन यह बात अटपटी लगती है कि किसी मामले को सुनने से एक जज मना करते हैं, तो फिर वह मामला कई दिनों या कई हफ्तों बाद के लिए किसी दूसरे जज की अदालत में तय होता है। उसके बाद सुनवाई के दिन वे मना करते हैं, तो फिर तीसरे जज के साथ यही सिलसिला चलता है। एक आम समझ यह कहती है कि जैसे ही किसी जज को कोई मामला दिया जाता है, अगर उन्हें उसकी सुनवाई करने में कोई दिक्कत है तो उसकी कोई सुनवाई तय होने के पहले ही उनसे पूछ लिया जाना चाहिए कि कोई दिक्कत तो नहीं है। जिन अदालतों पर काम का बोझ लदा हुआ है, और जिन मामलों में लोग इंसाफ के लिए टकटकी लगाए बैठे रहते हैं, वहां पर तो जज खुद होकर मना कर दें कि वे किन वजहों से कोई मामला नहीं सुन सकते, तो बचे हुए जजों के नाम वह मामला चढ़ जाए, और वक्त बचे।

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट आज अयोध्या को लेकर जो हड़बड़ी और रफ्तार दिखा रहा है, उसके बारे में भी देश को सोचने की जरूरत है कि क्या इस बेंच के जजों के रिटायरमेंट को कुछ हफ्तों के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है? अगर जरूरत हो तो संविधान में संशोधन करके भी ऐसा कोई इंतजाम करना चाहिए जिससे कि अदालत का लंबा वक्त खा चुके मामले आखिरी दौर में किसी जज के रिटायर होने से दम न तोड़ें। अभी तक भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, लेकिन असाधारण मामले, असाधारण परिस्थितियां कई असाधारण रास्ते सुझाते भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को अयोध्या के मामले में हड़बड़-सुनवाई करके ऐसा फैसला नहीं देना चाहिए जिसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दर्ज की जाए, या जिसे लेकर बाद में तोहमत लगे कि इंसाफ नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कभी-कभी असाधारण फैसले लिए हैं, और हम नहीं जानते कि यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में है, या नहीं कि सुनवाई या उसके बाद फैसला लिखने को कुछ हफ्तों के लिए आगे बढ़ाया जा सके। 

अदालतों से जुड़़े हुए ऐसे ही कुछ दूसरे पहलू भी हैं जिन पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में विचार करने की जरूरत है। एक बात तो यह भी हो सकती है कि हाईकोर्ट के जिन वकीलों ने जिस हाईकोर्ट में प्रैक्टिस की है, उन्हें वहां पर जज ही न बनाया जाए। उन्हें काबिलीयत के आधार पर जज बनाना ही है, तो दूसरे प्रदेश में बनाया जाए जहां उन्होंने कोई मुकदमे नहीं लड़े हैं। इससे मामलों को छोडऩे की मजबूरी भी खत्म हो जाएगी और अदालतों में भेदभाव या अपने मातहत रहे जूनियर वकीलों के साथ पक्षपात के आरोप भी नहीं लगेंगे। जाहिर तौर पर ऐसी कोई वजह नहीं दिखती है कि किसी राज्य में उसी राज्य के वकीलों या जूनियर जजों को हाईकोर्ट जज बनाया जाए क्योंकि हाईकोर्ट जजों का तो दूसरे राज्यों में तबादला होते ही रहता है। बेहतर यही होगा कि कोई भी जूनियर जज या सीनियर वकील अपने ही राज्य में जज न बनें।
-सुनील कुमार

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