संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 अक्टूबर : कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट का यह रूख हक्काबक्का करने वाला
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 अक्टूबर : कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट का यह रूख हक्काबक्का करने वाला
Date : 01-Oct-2019

दो बातों का अलग-अलग कई बार कोई महत्व नहीं होता, लेकिन जब उन्हें जोड़कर देखा जाता है, तो उनका विरोधाभास एक बड़ी तीखी तस्वीर बना देता है। सुप्रीम कोर्ट में कुछ वैसा ही हो रहा है। लाखों बरस पुराने, या सैकड़ों बरस से चले आ रहे विवाद की रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट वक्त की रफ्तार के खिलाफ तेजी से कर रहा है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश रिटायर होने के पहले यह ऐतिहासिक फैसला लिख जाना चाहते हैं। किसी भी मामले में वक्त पर आया इंसाफ बुरा नहीं होता, और हिंदुस्तानी अदालतों की लेट-लतीफी को लेकर हमेशा ही आलोचना होती आई है। ऐसे में यह बात अच्छी है कि सुप्रीम कोर्ट एक तय समय के भीतर इस पर फैसला दे, लेकिन यह बात भी बड़ी अजीब है कि वकीलों को बहस के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा है, और उसे लेकर इसी जगह हमने दो दिन पहले लिखा भी है। लेकिन एक दूसरी बात कल हुई। कश्मीर में नेताओं को नजरबंद करने के खिलाफ लगी एक याचिका सुनने से मना करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के पास इसके लिए वक्त नहीं है क्योंकि अभी वह अयोध्या का मामला निपटाने में व्यस्त है।

अब जिस कश्मीर में जिंदगी को डेढ़-दो महीने से थाम दिया गया है, आम जिंदगी की धड़कन थमी हुई है, वहां के लोगों की आजादी की अपील सुनने का वक्त अगर अदालत को नहीं है, तो यह बात बड़ी अजीब लगती है। अदालत की अपनी वजहें हो सकती हैं कि वहां संविधान पीठ के पास समय नहीं है, और दूसरे अकेले-दुकेले जज आजादी के बुनियादी मुद्दे को सुन नहीं सकते, लेकिन सवाल यह है कि लोगों की आवाजाही, उनकी कमाई, उनकी पढ़ाई, बाकी दुनिया से उनका संपर्क यह सब खत्म हुए लंबा वक्त हो गया है, और जिस सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इस नौबत पर सुनवाई करनी चाहिए थी, वह आज भी इसके लिए अगर याचिकाओं पर भी वक्त नहीं निकाल पा रहा है, तो इस लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक, न्यायपालिका के कामकाज में खासी खामी नजर आ रही है। अदालत को ऐसी असाधारण नौबत को देखते हुए और कश्मीर के दसियों लाख लोगों के बुनियादी हक को देखते हुए एक फौरी राहत देने के बारे में सोचना था, लेकिन यह गजब का सुप्रीम कोर्ट है जो कहता है कि इस पर सुनवाई का भी वक्त उसके पास नहीं है। जो अयोध्या सौ-डेढ़ सौ बरस से अदालतों में खड़ी है उसे निपटाने में सुप्रीम कोर्ट इस तरह डूब गया है कि बाकी देश के जिंदा इंसानों के बुनियादी हकों के जलते-सुलगते लोकतांत्रिक मुद्दों को भी सुनने का भी उसके पास वक्त नहीं है, तो उसे अपने कामकाज को सुधारना चाहिए, अपनी सोच को भी सुधारना चाहिए, और कश्मीरियों को इसी देश का नागरिक मानते हुए उनके बुनियादी इंसानी हक को भी देखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का ऐसा असंतुलित रूख लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है, और हाल के बरसों में उसने अपनी साख बहुत से मामलों में खोते हुए सरकार के एक विभाग की तरह काम करने की साख हासिल की है, जिससे छुटकारा पाना किसी भी इज्जतदार अदालत के लिए जरूरी बात है। जज इस बारे में सोचें कि क्या वे कश्मीर को हिंदुस्तान मानते हैं या नहीं, और वहां के नागरिकों को इंसान मानते हैं या नहीं।
-सुनील कुमार

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