संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 अक्टूबर : लंबे अर्से बाद गांधी चर्चा में
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 अक्टूबर : लंबे अर्से बाद गांधी चर्चा में
Date : 02-Oct-2019

गांधी के जन्म के डेढ़ सौ बरस पूरे होने के मौके पर देश भर में सरकारें अलग-अलग जलसे कर रही हैं, छत्तीसगढ़ में सरकार के साथ-साथ विधानसभा ने भी दो दिनों का एक विशेष सत्र बुलाया है जिसके लिए हर सदस्य के लिए कोसे की पोशाक सिलवाई गई है। मौका गांधी का है इसलिए खादी के कपड़ों की बात हुई थी, लेकिन चूंकि विधानसभा ताकतवर लोगों की जगह है, इसलिए गांधी की काती हुई सूती खादी के बजाय महंगे कोसे में चमकते हुए तमाम पक्ष-विपक्ष के लोग सुबह से दिख रहे हैं। खैर, कोसा भी हाथ से काते हुए धागे से हाथकरघे पर बुना हुआ कपड़ा है, इसलिए गांधी की बात भी पूरी हो जा रही है, और विधायकों की चमक भी कायम है। इससे परे राज्य भर में गांधी पिछले कुछ दिनों से लगातार चर्चा में हैं क्योंकि राज्य सरकार ने अलग-अलग कई मंचों पर गांधी को याद किया है, और गांधी को चर्चा के केन्द्र में फिर से लाने का काम किया है। 

राज्य में किस सोच वाली पार्टी की सरकार है इससे यह फर्क तो पड़ता ही है कि उसके आयोजन किन मुद्दों पर होते हैं। भाजपा के पन्द्रह बरस में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय से लेकर दूसरे विश्वविद्यालयों तक के आयोजन हिन्दू, हिन्दुत्व, और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूमते रहे, और इन्हीं मुद्दों पर जीने वाले देश के उन चुनिंदा अखबारनवीसों को बार-बार बुलाया जाता रहा जो कि पत्रकारिता के लिए नहीं हिन्दुत्व और उस पर खड़ी एक राष्ट्रवादिता के लिए जाने जाते थे। गांधी और गांधी की पूरी सोच को हाशिए पर धकेल दिया गया था, और अब राज्य की भूपेश बघेल सरकार पूरी ताकत से सरकारी-गैरसरकारी आयोजनों में गांधी और गोडसे के फर्क को चर्चा में लाने का काम कर रही है। आज देश में कांग्रेस पार्टी के भीतर भी गांधी के नाम को लेकर इतने तीखे तेवरों के साथ कम ही नेता काम कर रहे हैं जिस तीखेपन के साथ भूपेश बघेल गोडसे का नाम लेकर भाजपा पर हल्ला बोल रहे हैं, और गोडसे मुर्दाबाद कहने की चुनौती भाजपा-आरएसएस को दे रहे हैं। 

किसी राज्य की सरकार की विचारधारा उस राज्य में जनमत को मोडऩे का काम कुछ हद तक तो कर ही सकती है क्योंकि सरकार के अपने आयोजन, सरकारी खर्च से होने वाले दूसरे सार्वजनिक आयोजन, और विश्वविद्यालयों जैसी सरकार-नियंत्रित कथित स्वायत्त संस्थाओं में सरकार का रूख हावी रहता ही है। और गांधी आज अगर किसी पार्टी या उसकी सरकार की ही प्राथमिकता रह गए हैं, तो यह पूरे देश के लिए फिक्र की बात है। आज इस मौके पर यह भी सोचने की जरूरत है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमरीका में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मौजूदगी के दौरान जब ट्रंप ने मोदी को भारत का पिता कहा, तो मोदी मुस्कुराते हुए बैठे रहे, उन्होंने ट्रंप की इस लापरवाह और गैरजिम्मेदार बेवकूफी की बात का कोई विरोध नहीं किया। और यह बात गांधी जयंती के हफ्ते भर पहले ही हुई जबकि मोदी सरकार ने देश भर में 150वीं जयंती के जलसे की मुनादी की हुई थी। पूरे देश के कार्टूनिस्टों को एक नए राष्ट्रपिता पर व्यंग्य करते हुए कुछ न कुछ बनाने का एक अप्रिय मौका मिला, और मोदी की इस चुप्पी के पीछे की सोच लोगों को हक्का-बक्का कर गई। अमरीका को एक बहुत ही बेवकूफ राष्ट्रपति मिला हुआ है, लेकिन मोदी से तो किसी भी जिम्मेदार हिन्दुस्तानी को ट्रंप की बात का तुरंत विरोध करने, उसे सुधारने, ट्रंप को भारत के राष्ट्रपिता के बारे में बताने की उम्मीद थी ही, जो कि टूट गई। 

यह अच्छा है कि छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार खुलकर गांधी को एक मुद्दा बना रही है, और गोडसे का भी नाम लेकर एक खुली राजनीतिक बहस कर रही है। गांधी और गोडसे दोनों की प्रतिमाओं पर माला चढ़ाना एक साथ नहीं चल सकता। जो लोग चुनाव के वक्त या वोटों के लिए सालाना जलसों में गांधी के बस नामलेवा हैं, उनको गांधी के जानलेवा गोडसे के बारे में अपनी सोच साफ करनी होगी, और गांधी को एक इंसान के रूप में ही नहीं, एक सोच के रूप में भी सामने रखकर अपनी खुद की सोच बतानी होगी। जो लोग गांधी का नाम लेना आज अपनी मजबूरी समझते हैं, उन लोगों को यह भी साफ करना होगा कि गांधी की कथनी के मुकाबले आज उनकी अपनी करनी किस किस्म की है। गांधी को लेकर गोलमाल और मिलावट इसलिए ठीक नहीं है कि लोग आज या तो गांधी के साथ हो सकते हैं, या गोडसे के साथ हो सकते हैं, इन दोनों के बीच होने की कोई सहूलियत किसी को हासिल नहीं हो सकती। राजनीतिक और चुनावी मौकापरस्ती के चलते समय-समय पर गांधी को याद करना और खादी को बढ़ावा देना लोगों के गोडसे के प्रति सम्मान भाव को छुपा नहीं सकता है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार का सरकारी पैसों से, और प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का अपनी राजनीतिक ताकत से गांधी पर कार्यक्रम करना ठीक है। इस देश में गांधी की सोच को जारी रखना, और मजबूत बनाना किसी भी सरकार, और हर सरकार के लिए एक सबसे सस्ती और सबसे अधिक असरदार सरकारी योजना हो सकती है, और छत्तीसगढ़ को इसमें पहल करनी चाहिए, एक मिसाल कायम करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार

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