विचार / लेख

 छत्तीसगढ़ में बाघों की घटती संख्या चिंतनीय
छत्तीसगढ़ में बाघों की घटती संख्या चिंतनीय
Date : 04-Oct-2019

संदीप पौराणिक

छत्तीसगढ़ में बाघों की निरंतर घटती संख्या के कारण पूरे देश केें वन्य प्राणी प्रेमियों एवं पर्यावरण प्रेमियों में चिंता व्याप्त हो गई है। छत्तीसगढ़ वह राज्य है जिसकी भौगोलिक सीमाएं मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र, ओडिशा तथा झारखंड से मिलती हैं। वन्यप्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि इन चारों राज्यों से बाघ हमारे प्रदेश में आते जाते रहते हैं। प्रदेश का कवर्धा जिला मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क से लगा हुआ है। इस जिले में स्थित भोरमदेव अभ्यारण्य को कान्हा नेशनल पार्क का एक भाग ही कह सकते हैं।
बाघ, कान्हा नेशनल पार्क से निकल कर छत्तीसगढ़ के अन्य भागों के अतिरिक्त महाराष्ट्र के नागझीरा, चंद्रपुर, मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ तथा आंध्रप्रदेश के शैलम अभ्यारण्य तक जाता है। यह बहुत रहस्यमय और हैरान करने वाली बात है कि कान्हा का बाघ लगभग 1500 किमी का सफर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के वनमार्र्गों से होते हुए अपनी यह यात्रा पूरी करता है। यह बाघ को लगाए गए सैटेलाइट कालर से पता चला। किन्तु दुर्भाग्य है कि बाघ जब कान्हा से निकल कर भोरमदेव पार्क आता है, सर्वाधिक असुरक्षित महसूस करता है। इसका कारण है कि  भोरमदेव पार्क में हम अभी तक उसकी सुरक्षा के लिए ऐसे प्रबंध नहीं कर सके हैं, जो कान्हा और अन्य पार्कों में किए गए हैं। कुछ समय से लगातार अवैध शिकार की घटनाओं ने भोरमदेव को कुुख्यात कर दिया है। 
एक तरफ   सरकारें, बाघ बचाने के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर रही है, किन्तु दूसरी ओर वन विभाग का खुफिया तंत्र जो अवैध शिकार की सूचना देता है, निष्क्रिय है,  इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। एक ओर हमारा पड़ोसी राज्य म.प्र., राष्ट्रीय स्तर पर बाघों की संख्या में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हेाने पर जश्न मना रहा है। दूसरी ओर हम यहां मातम मनाने की स्थिति में हैं। नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार यहां केवल 18 बाघ ही बचे जबकि वर्ष 2014 में 45 बाघ पाया जाना बताया गया था अर्थात 70 फीसदी बाघ गायब होना शर्मनाक और चौकाने वाला है।
भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ राज्य का 45 फीसदी भाग वनांच्छांदित है, जो पूरे देश में सर्वाधिक है वन हैं तथा पूर्व में यहां बड़ी संख्या में बाघों की उपस्थिति रही है। 90 के दशक तक आदिवासी बहुल क्षेत्र बस्तर व सरगुजा में बाघों की अच्छी संख्या थी। आज यहां बहुत कम बाघ बचे हैं, जो कि दुर्भाग्य की बात है। देश में बस्तर शायद एकमात्र ऐसा क्षेत्र होगा, जहां टाइगर परियोजना तो है, पर बाघ शायद ही हों जबकि करोड़ों का बजट यहां खर्च हो रहा है। एक कहावत है कि घास नही ंतो बाघ नहीं, अर्थात जहां घास नहीं होगी वहां बाघ नहीं होगा। बाघों के घटने का यह भी महत्वपूर्ण कारण है। परंपरागत बाघ कारीडोरों  पर अवैध कब्जे तथा जंगल काट कर कृषि करने एवं बेशुमार शाकाहारी जंगली पशुओं का शिकार होना जो बाघ का आहार है, बाघों के घटने का प्रमुख कारण है। देश के प्रमुख अभ्यारण्यों में जहां बाघ काफी संख्या में है, वहां हर वर्ष घास लगाई जाती है, किन्तु छत्तीसगढ़ में ही शायद ही कहीं ऐसा होता है।  प्रदेश के अभ्यारण्यों के प्रबंधन में वैज्ञानिक प्रवृत्ति का अभाव देखा जा रहा है। यहां अभ्यारण्यों की सीमा में ही हजारों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण निवासरत हैं और इन ग्रामीणों के साथ वन विभाग का सामंजस्य ज्यादा नही है। बाघ सहित अन्य संकटग्रस्त प्राणियों को बचाने के लिए यह आवश्यक है कि इन ग्रामीणों का समुचित व्यवस्थापन अभ्यारण्य की सीमा सेे बाहर किया जाए।
लगभग तीन वर्ष पहले नारायणपुर में बाघ का पता चला था, वह कहां गायब हो गया यह पता नहीं चला। पिछले पखवाड़े मैं वह स्थान देखने गया था, जहां 90 के दशक में तत्कालीन वनाधिकारी श्री बर्मन ने लगभग 1/2 दर्जन बाघों को आदमखोर होने के शक में मार डाला था। यह स्थान माचकोट, नारायणपुर जिले से 40 किमी. दूर है। घटना इस प्रकार है माचकोट में एक बाघ द्वारा  लगभग 1/2 दर्जन आदिवासियों के मारे जाने की खबर से भारी हंगामा हुआ, जिसका जिक्र उस वक्त तत्कालीन मध्यप्रदेश की  विस में भी हुआ था। तब मप्र सरकार ने उस बाघिन को जब गोली मारने के आदेश दिए थे, किन्तु तत्कालीन अधिकारी ने उसकी आड़ में 1/2 दर्जन बाघ मार दिए थे और जब इसके बाद भी बाघ का आतंक जारी रहा तब बाहर से आए वन्य प्राणी विशेषज्ञों द्वारा बाघिन को मारा गया, जिसकी ट्रॉफी आज भी जगदलपुर वन संरक्षक कार्यालय में मौजूद है।  
मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में भी एक समय ऐसी स्थिति आ गई थी, जब एक भी बाघ नहीं बचा था, लेकिन वहां के कर्मठ आईएफ.एस श्री कृष्णमूर्ति के नेतृत्व में टीम बनाकर समर्पण की भावना से कार्य किया गया और आज वहां 40 से भी अधिक बाघ हैं। यह राष्ट्रीय स्तर पर एक मिसाल बन गया है।  यदि हम छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या बढ़ाना चाहते है तो हमें मप्र के पन्ना टाइगर रिजर्व की तरह यहां भी योग्य प्रबंध करने होंगे, जिसमें वन्य प्राणी संरक्षण में रूचि रखने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों की टीम बनाकर कार्य करने की जरूरत है।
हाल की बाघों की गणना की इस रिपोर्ट के बाद छत्तीसगढ़ के उदंती वनमंडल में फिर एक नर बाघ को शिकारियों द्वारा जान से मार डालना बड़ा ही गंभीर सवाल पैदा करता है। वर्ष 2018 में भी एक नर बाघ पूर्व में वहां मारा जा चुका है। गरियाबंद ,मैनपुर तथा कांकेर के जंगलों में बड़ी संख्या में तेन्दुओं को मारा जा रहा है। शिकारी, स्थानीय लोगों की सहायता से तेन्दुओं को मार कर उनकी खाल व हड्डी का व्यापार कर रहे हैं। कुछ शिकारी तो वहां स्थायी रूप से रहने लगे हैं। वे तेन्दुओं के बच्चों को जिन्दा पकडक़र उनकी तस्करी कर रहे हैं। साथ ही बड़ी संख्या में  प्रदेश में भालू भी मारे जाने से यह शक पैदा होता है कि शिकारी व तस्कर, तेन्दुओं व भालू के नाखूनों व दांतों को शेर का नाखून बताकर अवैध व्यापार भी कर रहे हैं। 
सरकार को बाघों सहित अन्य जंगली जानवरों की हत्या तथा तस्करी में लगे शिकारियों पर फंदा कसने की जरूरत हैै । सरकार को चाहिए कि पुन: बाघ, तेन्दुओं एवं भालूओं की गणना करें तथा प्रदेश को वन सम्पदा के साथ ही वन्य प्राणी समृद्ध बनाने हेतु भी समुचित कदम उठाए जाएं।
 (लेखक वन्यप्राणी विशेषज्ञ हैैं।)

Related Post

Comments