संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 अक्टूबर : जंगलमाफिया की तरह रातोंरात पेड़ काटने वाली सरकार मुजरिम ही है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 अक्टूबर : जंगलमाफिया की तरह रातोंरात पेड़ काटने वाली सरकार मुजरिम ही है...
Date : 05-Oct-2019

मुम्बई में शहर के किनारे लगी हुई आरे नाम की कॉलोनी से लगा हुआ एक बड़ा जंगल है जो कि एक किस्म से मुम्बई का फेंफड़ा भी है। लेकिन मेट्रो ट्रेन के लिए इस जंगल को काटने की योजना बनी, और मुम्बई के लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। कल मुम्बई हाईकोर्ट में विरोध करने वाली जनता के खिलाफ सरकार ने केस जीता, और रातों-रात हजारों पेड़ काट दिए। पेड़ों की यह कटाई चाहे अदालत के फैसले के मुताबिक क्यों न हो, महाराष्ट्र सरकार यह तरीका किसी जनकल्याणकारी सरकार का नहीं, मुजरिमों का है। किसी सरकार को रात के अंधेरे में पुलिस के घेरे में अपनी जनता को कुचलते हुए ऐसा काम करने की जरूरत नहीं पड़ती। और राज्य सरकार को इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए था कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, और जनता का इंसाफ के लिए आगे जाने का विकल्प सरकार ने पेड़ों की इस तरह कटाई करके खत्म कर दिया है जो कि गैरकानूनी चाहे न हो, वह इंसाफ का काम तो नहीं है। 

पूरे देश में पिछली आधी सदी का तजुर्बा यह है कि पेड़ कटते जरूर हैं, उनके नाम पर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से एडवांस में एक भरपाई रकम जमा जरूर करनी पड़ती है, लेकिन लोगों ने कहीं दुबारा जंगल बसते, कहीं दुबारा पेड़ खड़े होते देखे नहीं हैं। देश भर में राज्य सरकारों में पेड़ कटाई के मुआवजे से जो हजारों करोड़ रूपए मिलते हैं, उनको सरकारें अपना पॉकेटमनी मानकर मनमाना बेजा इस्तेमाल करती हैं, और सुप्रीम कोर्ट की नीयत धरी रह जाती है। आज देश भर में शहरीकरण और तरह-तरह की खदानों-कारखानों की योजनाओं, सड़कों और दूसरी बड़ी योजनाओं के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। यह तो वह है जो कि सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज होती है, इससे परे भी बहुत सी कटाई ऐसी होती है जिसे आज छत्तीसगढ़ झेल भी रहा है। ओडिशा की सरहद पर छत्तीसगढ़ के जंगलों को काटकर ओडिशा से आए हुए लोग वहां पर खेत बनाकर बस रहे हैं, अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, और जंगल हमेशा के लिए खत्म हुए जा रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि किसी राज्य में दूसरे राज्य से आए हुए लोग ही ऐसा करते हैं, राज्य के भीतर के लोग भी अपनी तरह-तरह की जरूरतों के लिए पेड़ काटते हैं। आदिवासी समुदाय आमतौर पर पेड़ों के बीच जिंदगी गुजारता है, लेकिन जब उसे यह दिखता है कि सरकारें तरह-तरह के बहाने लेकर, तरह-तरह के काम के लिए जंगल काट ही देगी, तो उस समुदाय का भरोसा भी भविष्य से उठ जाता है, और वह भी अपनी जरूरत के लिए पेड़ काटने लगता है। 

मुम्बई में राज्य सरकार ने जो किया है, वह अपराध से कम कुछ नहीं है, चाहे उसके पीछे हाईकोर्ट के एक फैसले की ताकत क्यों न हो। अपनी ही जनता के सुप्रीम कोर्ट जाने के हक को कुचलते हुए इस तरह रात के अंधेरे में, बंदूकों के साये में अगर राज्य सरकार जंगल को काटकर गिरा दे रही है, तो वह अवैध कटाई करने वाले मुजरिमों के गिरोह से कहीं भी बेहतर नहीं है। इस देश में अगर कोई अदालत अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी, तो राज्य सरकार को इस बात के लिए कटघरे में खड़ा करेगी कि अपनी ही जनता के सुप्रीम कोर्ट जाने के मौके को उसने क्यों छीना? जनता की ऐसी कोशिश न हो सके, इसलिए रातों-रात उसने पेड़ क्यों काटे? सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इन खबरों को एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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