संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 अक्टूबर : बैंकों पर लोगों का थोड़ाबहुत भरोसा बचा रहने दिया जाए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 अक्टूबर : बैंकों पर लोगों का थोड़ाबहुत भरोसा बचा रहने दिया जाए
Date : 06-Oct-2019

देश में एक वक्त बहुत से निजी बैंक चलते थे जो एक कारोबार की तरह थे। बाद में इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, और सारे निजी बैंक बंद हो गए। लेकिन इंदिरा की ही पार्टी के मनमोहन सिंह ने वित्तमंत्री रहते हुए और प्रधानमंत्री रहते हुए लगातार निजी बैंकों का रास्ता साफ किया, और देश के बैंकिंग कारोबार का एक बड़ा हिस्सा निजी बैंकों में चला गया। इससे परे महाराष्ट्र जैसे सहकारी आंदोलन में मजबूत और आर्थिक रूप से संपन्न प्रदेश में सहकारी बैंकों का ढांचा विकसित हुआ जो कि देश के दूसरे राज्यों में भी कम या अधिक बना। अब हर किस्म के बैंक बाजार में हैं, और हर किस्म के बैंक धोखाधड़ी और जालसाजी में गले-गले तक डूबे हुए पकड़ाए जा चुके हैं। देश के एक सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक पीएनबी ने जिस बड़े पैमाने पर धांधली और जालसाजी करके नीरव मोदी जैसे लोगों पर हजारों करोड़ लुटाए, और डुबाए, वह उस बैंक की साख के साथ-साथ बैंकिंग को नियंत्रित करने वाले रिजर्व बैंक की साख को भी चौपट करने के लिए काफी था। इसके बाद निजी क्षेत्र के बैंकों में एक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई, और अब सबसे ताजा मामला यस बैंक का है, जिसके मुखिया भ्रष्टाचार और गड़बड़ी में शामिल पकड़ाए, और एक-एक को आरबीआई ने हटाया। इसके भी बाद का मामला महाराष्ट्र का है जहां पर पंजाब-महाराष्ट्र बैंक में हजारों करोड़ की संगठित लूट सामने आई है, और उसके सारे बड़े पदाधिकारी गिरफ्तार हो रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने ही कारोबार को कर्ज दिए, और उन्हें कागजात में जालसाजी करके आरबीआई से छुपा भी लिया। इस बैंक की हालत यह थी कि इसने अपने एक पदाधिकारी से जुड़ी हुई एक कंपनी को ही पूरे बैंक के कर्ज का 70 फीसदी दे दिया था, और यह कंपनी डूबी, और बैंक डूब गया। 

देश के आर्थिक मामलों की समझ रखने वाले एक स्तंभकार ने कल ही लिखा है कि निजी बैंकों के साथ एक खतरा यह जुड़ा हुआ है कि वे अगर कारोबारियों से जुड़े हुए हैं, और उन्हीं कारोबारियों को कर्ज भी दे रहे हैं, तो खतरों को कम आंककर, खूबियों को अधिक आंककर, झूठे कागजातों के आधार पर वे रकम डुबा रहे हैं, और कुछ बरस तक छुपाने के बाद जब जालसाजी का बुलबुला फूटता है, तो बैंक की रकम पूरी तरह डूब चुकी होती है। इस सिलसिले को रोकने के लिए रिजर्व बैंक की निगरानी बिल्कुल ही कमजोर और नाकामयाब साबित हुई है, और जालसाज बैंक बरस-दर-बरस अपनी धोखाधड़ी छुपाने में कामयाब रहते हैं। अब सवाल यह है कि सरकारी नियंत्रण वाले बैंक सत्तारूढ़ नेताओं की सिफारिशों पर डूबने वाले लोन देते हैं, निजी क्षेत्र के बैंक कारोबारियों के हाथों में चले जाते हैं, और कारोबारियों को डुबाने के लिए कर्ज देते हैं, और सहकारी बैंक स्थानीय ताकतवर नेताओं, और कारोबारियों दोनों के असर में रकम डुबाते हैं। 

आज जब पंजाब-महाराष्ट्र बैंक के खातेदारों को अपनी जमा कितनी भी रकम में से महज 25 हजार निकालने की इजाजत रिजर्व बैंक से मुश्किल से मिली है, तो यह स्वाभाविक ही है कि वहां के मध्यम वर्ग के खातेदार आत्महत्या की सोच रहे हैं, और प्रधानमंत्री के नाम ऐसी ट्वीट भी कर रहे हैं। बैंकों की कुर्सियों पर बैठे हुए जो लोग सोच-समझकर जालसाजी करते हैं उनके लिए बड़ी लंबी कैद का इंतजाम भी होना चाहिए, और उनकी सारी संपत्ति को तेजी से जब्त करने का कानून भी बनना चाहिए। मोदी सरकार पिछले पांच से अधिक बरसों से लगातार विदेशों से भारत से गया कालाधन वापिस लाने की बात तो कर रही है, लेकिन अभी तक ऐसा एक रूपया भी लौटा हो वह नहीं दिख रहा है, बल्कि इन्हीं पांच बरसों में बैंकों से धोखाधड़ी करके ही कारोबारियों ने दसियों हजार करोड़ रूपए विदेशों में भेज दिए हैं, और खुद भी भागकर दूसरे देशों में बस गए हैं। यह पूरा का पूरा सिलसिला सरकार और आरबीआईकी जानकारी में हुआ है, और इसलिए हुआ है कि सरकार ने खबर मिलने पर भी समय रहते ऐसे जालसाजों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। सरकार और आरबीआई सूचना के अधिकार में मांगी गई जानकारी को छुपाने में लुका-छिपी खेलने के बजाय अपनी जिम्मेदारी पूरी करें ताकि देश के आम लोगों का जो पैसा बैंकों में है वह गायब न हो, और बैंकों पर लोगों का थोड़ाबहुत भरोसा बचा रहने दिया जाए। 
-सुनील कुमार

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