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बेगम अख़्तर जिसने गज़़ल को कोठे से निकालकर लोगों तक पहुंचाया
बेगम अख़्तर जिसने गज़़ल को कोठे से निकालकर लोगों तक पहुंचाया
Date : 07-Oct-2019

 अनुराग भारद्वाज

उनका पहला कॉन्सर्ट 1949 में नहीं होना था। पर तकदीर को कुछ और ही मंज़ूर था। बिहार में आये भूकंप पीडि़तों की सहायता के लिए एक शो किया गया था। मशहूर शहनाई वादक अमान अली खान साहब और उनके नौजवान शागिर्द (उस्ताद) बिस्मिल्लाह खान ने भी इसमें शिरकत की। शो के दूसरे हिस्से में अफऱा तफऱी मच गई क्योंकि एक मशहूर शास्त्रीय गायक आने का वादा करके ऐन वक्त पर दगा दे गए थे। आयोजकों की भद्द न पिटे, इसके लिए पटियाला घराने के उस्ताद मोहम्मद अत्ता खान साहब ने कहा कि उनकी एक शागिर्द को आगे कर दिया जाए, फिर जो होगा अल्लाह मालिक है।

लोगों का हुजूम शोर मचा रहा था। कांपती टांगों से 20 साला अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी मंच पर आईं। दर्शकों का रेला देखने के बाद उन्होंने आंखें बंद कर ख़ुदा को याद किया और जानी-मानी गज़़ल गायिका मुमताज़ बेग़म का कलाम उनके मुंह से निकल पड़ा।

‘तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई

तकता है तेरी ओर हर एक तमाशाई’

गज़़ल पूरी हुई। लोग आवाज़ की कशिश से हैरत में पड़ गए। तालियों की गडग़ड़ाहट ख़त्म होने तक वे चार गज़़ल गा गईं। शो तो ख़त्म हो चुका था, दास्तां अभी बाकी थी। एक महिला कार्यक्रम पूरा होने के बाद उन तक आई और कहा, ‘मैं ये तय करके आई थी कि मुझे कुछ देर ही इस कार्यक्रम में रुकना है, तुम्हें सुना तो ठहर गई।’ उस महिला ने आगे कहा, ‘अब कल तुम मुझे सुनने आना।’ ये कहकर उसने अख़्तरी बाई को खादी की साड़ी भेंट की। वह महिला कोई और नहीं, बल्कि भारत की स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू थीं!

अख्तरी और उनकी जुड़वां बहन अनवरी का जन्म फैज़ाबाद में हुआ था। उनकी वालिदा मुश्तरीबाई लखनऊ के नवाबों की दरबारी गायिका थीं। उनके शौहर को गाना-बजाना पसंद नहीं था। मियां-बीवी की अनबन के चलते मुश्तरीबाई बेटियों को लेकर फ़ैज़ाबाद चली आईं और संघर्ष शुरू हो गया। शौहर लखनऊ में सिविल जज थे पर फ़ैज़ाबाद में मां-बेटियों पर तंज कसे जाते। जैसे-तैसे दिन गुजऱ रहे थे कि अनवरी का इंतेकाल हो गया। मां-बेटी अकेले रह गए और सामने बेदर्द ज़माना। मां अक्सर कहतीं, ‘हाय अल्लाह अब क्या होगा?’

फिर एक दिन, एंजेलिना योवर्ड, जिनकी पूरे हिंदुस्तान में धूम थी, फ़ैज़ाबाद आईं। इत्तेफाक से वे उस कक्षा में गई जहां ‘बिब्बी’ उर्फ अख्तरी पढ़ती थीं। किस्सा है कि बिब्बी ने योवर्ड का दामन थाम लिया और कहा, ‘आप गौहर जान हैं न?’ आप ठुमरी गातीं हैं। गौहर जान बोलीं, ‘क्या तुम भी गाती हो?’ बिब्बी ने उन्हें ख़ुसरो का कलाम ‘अम्मा मोरे भैया को भेजो सवान आया’ सुनाया। कहते हैं कि गौहर जान इसे सुनकर अवाक रह गईं। बोलीं, ‘अगर इस बच्ची को तालीम मिल गई तो ये मल्लिका-ए-गज़़ल बनेगी!

लंबी दास्तान कम लफ्ज़़ों में यूं है कि अख्तरीबाई को संगीत विरसे में मिला था। उधर, मां की ख्वाहिश बेटी को पढ़ा-लिखाकर किसी अच्छे घराने में ब्याहने की थी। न चाहते हुए भी उन्होंने उसे उस्तादों की शागिर्दी में रख छोड़ा। बेटी जिद्दी और तिस पर गुरु उससे भी बड़े जिद्दी। अख्तरी को सुगम संगीत का चाव, उस्ताद मोहम्मद अत्ता खान को उन्हें शास्त्रीय गायक बनाने की जि़द। दोनों में ठन गई। बिब्बी ने उस्ताद की शागिर्दी छोड़ दी। पर गुरु ने तब तक वह सिखा दिया था जो उनके जि़ंदगी भर काम आने वाला था। उन्होंने ख्याल, ठुमरी, दादरा और गज़़ल का फन सीख लिया था। अब उडऩे का वक्त आ गया था।

बिब्बी को अब तक गुरु का मतलब समझ आ गया था। फिर गुरु को उन्होंने ऐसा पकड़ा कि नहीं छोड़ा। फ़ैज़ाबाद से परिवार कोलकाता चला आया। साथ में उस्ताद भी आए। एक तरफ़ गायकी की शिक्षा का ख़र्च, दूसरी तरफ शहरी जि़ंदगी का बोझ। मुश्तरीबाई जैसे-तैसे काम चला रही थीं। बिब्बी की गायकी अब तक मशहूर हो गई थी। ग्रामोफ़ोन कंपनी वाले उनसे गवाने के लिए इसरार करने लगे। उन दिनों म्यूजिक कंपनी या फि़ल्मों के लिए गाना कमतर समझा जाता, सो उस्ताद ने मना कर दिया। बिब्बी से घर की तंगहाली देखी न गयी और एक दिन वे एचएमवी के दफ़्तर चली गयीं। लपककर, कंपनी ने दादरा और गज़़लें रिकॉर्ड कर लीं। इसके बाद तो उन्हें पीछे मुडक़र देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यह उनका ही जादू था कि गज़़ल कोठों से निकलकर आम लोगों की जि़ंदगी आने को बेकऱार हो गई। बिब्बी अब बेगम अख्तर हो गई थीं।

ग़ालिब, मोमिन, फैज़ अहमद फैज़, कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी जैसे कमाल के शायरों के कलामों को उनकी आवाज़ ने नए मुक़ाम दिलवाए। लखनऊ घरानों की शान कही जाने वाली ठुमरी को गौहर जान के बाद नईऊंचाइयों पर अगर कोई ले गया तो वे बेगम अख्तर ही थीं। वाजिद अली शाह की बनाई हुई ‘हमरी अटरिया पे आजा रे सांवरिया’ तो उनके जैसे शायद कोई गा ही नहीं पाया।

बेगम अख्तर की एक गज़़ल है, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे’। इसका जादू कुछ यूं हुआ कि एचएमवी के रिकार्ड्स कम पड़ गए। जब मांग के हिसाब से सप्लाई करना मुश्किल हो गया तो कंपनी ने इंग्लैंड से नया रिकॉर्ड प्रेसिंग प्लांट ही मंगा डाला।

बेगम अख्तर की आवाज़ का जादू लोगों के सिर पर चढक़र बोल रहा था। उनकी शक्लो-सूरत भी भली थी। फि़ल्म निर्माता उनसे अभिनय की भी मांग करने लगे। इसके बाद उन्होंने ‘नल और दमयंती’, ‘एक दिन की बादशाहत’, ‘मुमताज़ बेगम’, ‘अमीना’, ‘जवानी का नशा’ और कई फि़ल्मों में काम किया। कहा जाता है कि ईस्ट इंडिया फि़ल्म कंपनी ने उनकी तनख्वाह 700 रुपये मासिक से बढ़ाकर 2000 कर दी थी। लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था। सो इस सब को छोडक़र वे 1942 में लखनऊ चली आईं। लेकिन महान फि़ल्म निर्माता महबूब उनके उनके पीछे वहां तक आ गए और फि़ल्म ‘रोटी’ में रोल और गाने की हां करवाकर ही माने।

कुछ इसी तरह सत्यजीत रे की फि़ल्म ‘जलसाघर’(1958) का कि़स्सा है। उस फि़ल्म में उन्होंने विलायत खान साहब की राग पीलू की बंदिश में ‘भर आई मोरी अखियां पिया बिना, घिर घिर आईं कारी बदरिया, जरत मोरी छतियां’ गाई। इसने तहलका मचा दिया था।

रीता गांगुली ने बेगम अख़्तर की जीवनी ‘ए मोहब्बत’ में एक बड़े दिलफऱेब कि़स्से का जि़क्र किया है। एक बार बेगम अख्तर कोलकाता के किसी होटल की बालकनी में खड़ी थीं और नीचे एक ख़ूबसूरत सा पानवाला पूरबी दादरा गाते हुए पान बेच रहा था। उन्होंने उसे ऊपर बुला लिया और आगे कि़स्सा यूं है।

बेगम- ‘तुम कौन सा पान लगाते हो?’

पानवाला- ‘कलकत्ता, देसी, बनारसी। तम्बाकू खड़ी या हल्की’।

बेगम- ये पान की पूरी तश्तरी कितने की है?’

पानवाला- ‘आपको कितने चाहिए?’

बेगम- ‘मैं पूरे खऱीद लूंगी बस तुम गाते रहना। क्या तुम बनारस के हो?’

पानवाल- ‘हां, पर धंधा यहीं है। शाम तक काफ़ी कमा लेता हूं। साल में एक बार घर जाता हूं।’

बेगम: ‘क्या तुम शादी-शुदा हो?’

पानवाल- ‘बच्चे भी हैं। आप तो अख़्तरी बाई फ़ैज़ाबादी हैं न? कौन सी नई फिल्म में काम कर रही हैं?’ उसने आगे बोला, ‘मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि मैं आपके सामने बैठा हूं।’

अख़्तरी बाई को वह शख्स बेहद ख़ूबसूरत लगा। उन्होंने उसे नहाकर रात को साथ वाले कमरे में रुकने के लिए कहा, तो उसने मना कर दिया। वह बोला, यहां रात भर रूककर यहां क्या करुना। मैं जहां रहता हूं, कोठेवालियां रात भर ठुमरी गाती हैं और मुझे मुफ़्त में अच्छा संगीत सुनने को मिल जाता है। बेगम अख्तर ने ने लाख चिरौरी की, पर वह चला गया। उन्होंने कहा, ‘मुझे तब महसूस हुआ कि मेरे संगीत में क्या कमी है।’

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