संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 अक्टूबर : प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ  टीवी से अलग गिनाना चाहिए
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 31 अक्टूबर : प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ टीवी से अलग गिनाना चाहिए
Date : 31-Oct-2019

पाकिस्तान में अभी एक दिलचस्प बहस छिड़ी है जिस पर हिन्दुस्तान के लोग भी सोच सकते हैं। पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी, पेमरा, ने अभी दो दिन पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक निर्देश जारी किया था कि जिसमें उन्होंने अदालतों में चल रहे मामलों को लेकर टीवी पर चलने वाली बहस पर अपनी राय दी थी। इसके मुताबिक उसने टीवी शो होस्ट करने वाले एंकर कहे जाने वाले लोगों से कहा था कि उन्हें केवल एक तटस्थ संचालक की तरह बहस में शामिल लोगों को बोलने का मौका देना चाहिए, न कि खुद किसी विषय विशेषज्ञ की तरह खुद अपने विचार रखने चाहिए। निर्देशों में यह भी सुझाया गया है कि चैनलों को बहस में आने वाले लोगों को छांटने में भी सावधानी बरतनी चाहिए कि विषयों के विशेषज्ञ लोग ही बुलाए जाएं जो कि उस विषय के जानकार लोग हों। पेमरा ने यह निर्देश पाकिस्तान की एक बड़ी अदालत के एक आदेश को दुहराते हुए जारी किए थे जिसमें अदालत ने यह पाया था कि हाल ही में भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जमानत मिलने को लेकर कुछ चैनलों की बहसों पर लोग अदालती आदेश को लेकर अटकलें भी लगा रहे थे। 

यह मामला तो पाकिस्तान का है, लेकिन इसमें से पाकिस्तान शब्द को हटा दें, और वहां हिन्दुस्तान लिख दें, तो यह इस देश पर भी पूरी तरह लागू होता है। इधर अदालतों में किसी मामले की सुनवाई चलती है, उधर टीवी चैनलों में किसी फिल्म या टीवी सीरियल की तरह के सेट तैयार करके एंकर कहीं वकील तो कहीं फौजी बनकर अदालती मामलों पर घटिया से घटिया बहस छिड़वाने के लिए अधिक से अधिक बकवासी लोगों को छांटकर लाते हैं, और फिर उनके बीच मुर्गा लड़ाई करवाते हुए उकड़ू बैठकर चैनल को दर्शकों के बीच बेचते हैं। बहुत से लोग अब हिन्दुस्तान में यह लिखने और बोलने लगे हैं कि टीवी चैनलों ने मानो दंगा करवाने को, नफरत और हिंसा फैलाने को, झूठ कहने और लावा उगलवाने को अपना धंधा बना लिया है। हमारा ख्याल है कि एक ऐसा वक्त आ गया है जब प्रिंट मीडिया को अपने और टीवी चैनलों के लिए इन दिनों इस्तेमाल होने वाले मीडिया नाम के एक अकेले शब्द का विकल्प ढूंढना चाहिए, और अखबारों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की संदिग्ध साख के साथ एक बोट पर सवार नहीं होना चाहिए। आज देश में अखबारों का काम और चैनलों का काम बिल्कुल अलग-अलग किस्म का हो गया है, दोनों की नीयत और जरूरत अलग-अलग हो गई हैं, और दोनों के पत्रकारों-कामगारों का मिजाज भी अलग-अलग हो गया है। अब मीडिया नाम का एक शब्द इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को साख दिला रहा है, और उसी के साथ गिने जाने की वजह से प्रिंट की साख गिरा रहा है। एक वक्त था जब पत्रकारिता या अखबारनवीसी के मायने सीधे-सीधे प्रिंट मीडिया ही होते थे। उसके बाद धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दाखिल हुआ, और हावी हुआ, उसने पेशे को इस हद तक बिगाड़ दिया कि पेशा खत्म होकर महज कारोबार रह गया। ऐसे में आज प्रिंट को अपने लिए एक अलग शब्द छांटना चाहिए, और अपने आपको मीडिया में गिनने से लोगों को रोकना चाहिए। 

आज इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों के जो तौर-तरीके रह गए हैं, जिन्हें लेकर पाकिस्तान में ब्रॉडकास्टिंग की संवैधानिक संस्था ने फिक्र जाहिर की है, जिसे लेकर वहां एक हाईकोर्ट ने एक आदेश जारी किया है, उससे हिन्दुस्तान को भी एक सबक लेना चाहिए, एक नसीहत लेनी चाहिए। यहां अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की साख के साथ प्रिंट को नहीं खड़े होना चाहिए, और मीडिया नाम की एक बड़ी छतरी से बाहर आकर अपने को सिर्फ प्रिंट कहने का काम करना चाहिए। वैसे भी अगर कानूनी रूप से देखा जाए तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नाम के रजिस्ट्रेशन से लेकर उसके मालिकाना हक तक बहुत सी बातें अलग किस्म की हैं, और प्रिंट मीडिया के लिए कानून बिल्कुल अलग हैं। इन दोनों का साथ में इज्जत के साथ गुजारा नहीं है, और गरीब अखबारों को महंगे चैनलों से परे अपनी दुनिया अलग रखनी चाहिए। पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत का ख्याल रखने वाले श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के खात्मे के पीछे भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कामगारों का एक अलग मिजाज रहा है, और अब प्रिंट को अपनी सीमित पहुंच, और असीमित साख के साथ अलग गिनाना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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