संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 नवम्बर : निजता से लेकर रकम तक साइबर घुसपैठ के खतरे में
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 1 नवम्बर : निजता से लेकर रकम तक साइबर घुसपैठ के खतरे में
Date : 01-Nov-2019

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों यह राय सामने रखी थी कि देश में सभी तरह के पहचान-पत्रों की जगह एक ही डिजिटल कार्ड जारी किया जाये  आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, सभी का काम करे। देश में आधार कार्ड के इस्तेमाल को जरूरी बनाने को लेकर  में पहले से संदेह बना हुआ है कि  सरकार लोगों पर नजर रख सकती है, उनकी हर बात सरकार की निगाह में है। एक अकेले कार्ड की सोच और भी संदेह करेगी। इस पर आज चर्चा की जरूरत इसलिए पैदा हो गई है कि कल की खबर है कि एक इजराइली छांट-छांटकर बहुत से हिंदुस्तानी सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के मोबाइल फोन पर व्हाट्सऐप वॉइसकॉल के रास्ते से जासूसी की। इजराइली कंपनियों जैसे बदमाश लोग पैसों के लिए, राजनीति के लिए दुनिया भर के हर तरह बुरे काम भी करतेे है, वहां की कुख्यात जासूसी कंपनी मोसाद को दुनिया भर में साजिश के साथ कत्ल करने के लिए भी जाना जाता है। यह जानना भी जरूरी है कि हिंदुस्तान अकेला इजराइल के पूरे निर्यात के आधे से अधिक का खरीददार है। और न सिर्फ हिंदुस्तानी कारोबारी, बल्कि यहां की फौज तक, बहुत से संवेदनशील संस्थान इस्राएली निगरानी कम्प्यूटर चीजों के खरीददार हैं। ऐसे में यह सोचना मुश्किल नहीं है कि इजराइल की यह कंपनी किसी हिन्दुस्तानी एजेंसी के लिए भी पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ऐसी निगरानी करती हो सकती है। ऐसे में हिंदुस्तान के सारे पहचान पत्रों को जोड़ देने का मतलब खुले में बिना कपड़ों के नहाने से भी अधिक खतरनाक होगा। फिर यह भी है कि साइबर जुर्म के ऐसे हथियार कितने दिन तक साइबर मुजरिमों की पहुँच से परे रहेंगे?

अब जब पूरे देश को डिजिटल तकनीक से जोड़ा जा रहा है, और ऐसा कोई दिन नहीं है कि बैंक खातों और एटीएम की जालसाजी न हो, तब देश की साइबर-सुरक्षा को तौलने की जरूरत है। और देश की साइबर-सुरक्षा से हमारा मतलब सरकार के कम्प्यूटरों की साइबर-सुरक्षा नहीं, आम जनता के बैंक और दूसरे सरकारी कामकाज की सुरक्षा से है। आज तो विकीलीक्स के संस्थापक का यह संदेह डरावना लगता है कि अमरीकी खुफिया एजेंसी की पहुंच भारत के आधार कार्ड से जुड़ी सारी जानकारियों तक है जिसमें लोगों के बायोमेट्रिक्स भी हैं, उनकी उंगलियों के निशान भी हैं। एक किस्म से यह डर भी लगता है कि आधार कार्ड से एक तरफ तो लोगों की निजता पूरी तरह खत्म हो चुकी है, और दूसरी तरफ लोगों के बैंक और सरकारी रिकॉर्ड खतरे में आ गए हैं। एक तरफ आधार कार्ड, और दूसरी तरफ लगभग अनिवार्य हो चुके बैंक खातों को लेकर लोगों की कमसमझी की वजह से साइबर-जालसाज तरह-तरह से लोगों को लूट रहे हैं। ऐसे में लोगों की जानकारी मुजरिमों के हाथ एक बड़ा हथियार बन गई है।

कुछ समय पहले देश में एक बहुत बड़ी साइबर-ठगी पकड़ाई, और एक मामूली से आदमी ने बताया जाता है कि लोगों से 37 सौ करोड़ रूपए ठग लिए। उसने लोगों को यह झांसा देकर कुछ-कुछ हजार रूपए जमा कराए कि उन्हें घर बैठे ऑनलाईन सोशल मीडिया पोस्ट लाईक करने के लिए पांच-पांच रूपए मिलेंगे, और लाखों लोग उसके झांसे में आ गए। अब सरकारी टीवी दूरदर्शन पर चर्चा में देश के सबसे बड़े साइबर-कानून जानकार यह कहते दिखते हैं कि अभी यह कानून बड़ा कच्चा है, और इस किस्म के जुर्म की रोकथाम के लिए, इसे पकडऩे के लिए, और इसे सजा दिलाने के लिए इस कानून में पुख्ता इंतजाम नहीं है। मतलब यह कि साइबर और डिजिटल जुर्म तो खरगोश की रफ्तार से छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, और ऐसे जुर्म रोकने के लिए सरकारी कानून और इंतजाम कछुए की रफ्तार से चल रहे हैं। इन दोनों का मेल शायद ही कभी हो पाएगा, और इस बीच ठगी, जालसाजी, धोखाधड़ी, और बैंक खातों में सेंधमारी करके मुजरिम उन गरीबों और को लूटते चले जाएंगे जिनके हाथों से सरकार नगदी छीनकर उन्हें डिजिटल भुगतान की ओर धकेल रही है।

भारत के लिए यह एक भयानक नौबत है जिसमें आर्थिक अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, साइबर अपराधी बढ़ते चल रहे हैं, बैंक खातों के घुसपैठिये दुनिया में कहीं भी बैठे हुए किसी भी जगह के खातों को लूट रहे हैं, और भारत अभी तक न तो हिफाजत के इंतजाम कर पाया है, न ही वह साइबर-कानून बना पाया है जो कि ऐसे जुर्म की सजा दिला सके। वैसे भी यह बात समझ से परे है कि जो भारत अपनी सरहद से कुछ सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तान में बैठे हुए मुम्बई बमकांड के आरोपी दाऊद इब्राहिम तक इन दशकों में नहीं पहुंच पाया है, वह दुनिया के अदृश्य साइबर-मुजरिमों तक क्या पहुंच पाएगा। सरकार की डिजिटल-हड़बड़ी और देश की डिजिटल-सुरक्षा-तैयारी के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं दिख रहा है। जब बहुत कम पढ़े-लिखे लोगों के हाथ फोन पर बैंक खाते थमा दिए जा रहे हैं, भुगतान की ताकत थमा दी जा रही है, तो झारखंड के एक गांव में बैठे हजारों लोग केवल पूरे देश में साइबर-ठगी के काम में लगे हुए हैं, और उसे कोई रोक नहीं पा रहे हैं।

लेकिन अभी ठगी का जो मामला सामने आया है, वह नेटवर्क मार्केटिंग जैसी बहुत पुरानी एक अंतरराष्ट्रीय धोखाधड़ी की परंपरा की ताजा मिसाल है, और अगर केन्द्र या राज्य सरकारों की कोई निगरानी मशीनरी होती, तो वह कब का इस धोखाधड़ी को पकड़ चुकी होती। दरअसल भारत में जुर्म हो जाने के बाद उसे पकडऩे और सजा दिलवाने पर ही सारी ताकत लगाई जाती है, जबकि ऐसे जुर्म से इकट्ठा मोटी रकम कई खातों से होते हुए खत्म हो चुकी रहती है, और सरकार के हाथ अधिक से अधिक यही रह जाता है कि किसी मुजरिम को सजा दिलवाई जाए, जिससे कि डूबी हुई रकम तो लोगों को वापिस मिलती नहीं। आज भारत में ऐसे आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए एक बहुत ही मजबूत साइबर-सुरक्षा ढांचे की जरूरत है, और साइबर से परे भी खुले बाजार में पूंजी निवेश, या रकम दुगुना करके देने की योजना पर नजर रखने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, ठगे हुए लोग ठगे से खड़े रह जाएंगे, और ठगों का खजाना सरकारी पहुंच से परे किसी और देश पहुंच चुका रहेगा। आज हम जगह-जगह ऐसे पूंजीनिवेशकों की भीड़ देख रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी भर की छोटी-मोटी कमाई और बचत को दुगुना होने की उम्मीद में कहीं लगा दिया था, और ऐसी कंपनियां रातों-रात गायब हो गई हैं। सरकारों को जुर्म होने के पहले की बहुत बारीक खुफिया-निगरानी बढ़ानी होगी, उसके बिना अपराधियों के पीछे भागते रहना एक फिजूल की कोशिश ही रहेगी। साइबर-मुजरिमों की बाकी कोशिशों के साथ-साथ अब आधार कार्ड से एक बड़ा खतरा देश की पूरी जनता पर ही आ गया है, और सरकार बिना इससे बचाव की तैयारी के इसे अधिक से अधिक अनिवार्य करते चल रही है।
-सुनील कुमार

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