संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 नवंबर : भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तमाम तनाव के बावजूद सद्भावना की तलाश जरूरी
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 2 नवंबर : भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तमाम तनाव के बावजूद सद्भावना की तलाश जरूरी
Date : 02-Nov-2019

दिल्ली में इन दिनों जितना भयानक प्रदूषण फैला हुआ है उसकी वजह से स्कूलें बंद कर दी गई हैं, लोग इमारतों के भीतर भी नाक और मुंह पर मास्क लगाकर जी रहे हैं, और प्रदूषण की वजह दिल्ली के इर्द-गिर्द के राज्यों में खेतों में बच गए ठूंठ जलाने को भी बताया जा रहा है, और यह भी खबर है कि पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके से भी खेतों से ऐसा धुआं उठकर हिन्दुस्तान में प्रदूषण का बढ़ा रहा है। ऐसे मौके पर किसी ने सोशल मीडिया पर सुझाया है कि भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेद किनारे करके इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए। 

वैसे तो इन दोनों देशों के बीच अलग-अलग कुछ मुद्दों पर बात हो भी रही है। जब-जब हिन्दुस्तानी प्रधानमंत्री को पाकिस्तान से आगे कहीं विदेश जाना होता है, तो भारत सरकार पाकिस्तान की सरकार से मोदी का विमान गुजरने देने की इजाजत मांगती है जो कि मिली नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ इन दिनों खबरों में पाकिस्तान की जमीन पर आने वाले सिक्खों के एक सबसे बड़े तीर्थ, करतारपुर गुरुद्वारा को लेकर भी भारत और पाकिस्तान के बयान आ रहे हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी तरफ से यह घोषणा की है कि वहां भारत से जाने वाले सिक्ख तीर्थयात्रियों को पासपोर्ट नहीं ले जाना होगा, और कोई भी पहचानपत्र काम करेगा। दूसरी तरफ भारत के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पाक पीएम को लिखा है कि यह छूट सभी धर्मों के लोगों को दी जाए क्योंकि गुरुद्वारों में सभी धर्मों के लोग जाते हैं। अगले दो-चार दिनों में भारत का एक औपचारिक प्रतिनिधि मंडल नए बनाए गए गलियारे से होकर पाकिस्तान जाने भी वाला है क्योंकि गुरूनानक देव की 500वीं जन्म शताब्दी का समारोह शुरू हो रहा है, और अभी-अभी पाकिस्तान की सरकार ने उन पर एक स्मारक सिक्का भी जारी किया है। दूसरी तरफ दिल्ली से नए बने भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने हाल ही में ट्विटर पर भारतीय विदेश मंत्री से एक पाकिस्तानी मरीज बच्ची के परिवार को वीजा देने के लिए अपील की थी, और वह तुरंत ही हो भी गया। पाकिस्तानी मरीजों को भारत में इलाज के लिए लगातार वीजा मिल भी रहा है। 

कश्मीर को लेकर, और बहुत सी आतंकी घटनाओं को लेकर, सरहद पर गोलाबारी को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव, अनबन, और अनबोला जारी है। लेकिन कारोबार को लेकर दोनों देशों को बड़ा नुकसान होता है जब वे आपसी खरीद-बिक्री नहीं कर पाते तो दोनों ही देश किसी तीसरे-चौथे देश को फायदा देते हैं। ऐसे में प्रदूषण से लेकर नदियों के पानी तक, कारोबार से लेकर इलाज तक, बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनमें बातचीत की जरूरत है। तनाव अपनी जगह ठीक है, लेकिन इन दोनों देशों को यह बात भी समझना चाहिए कि लोग रिश्तेदारी दूर-दूर तक कर सकते हैं, दोस्त धरती के दूसरे सिरे पर भी बना सकते हैं, लेकिन पड़ोसी तो बगल के ही हो सकते हैं, उस मामले में कोई पसंद-नापसंद की गुंजाइश नहीं रहती। भारत और पाकिस्तान को बातचीत लंबे समय तक बंद रखने के बजाय किसी न किसी तरीके से एक-दूसरे से शिकायतें सुलझाने के रास्ते देखने चाहिए, चाहे इसके लिए अनौपचारिक चर्चा हो, या कोई मध्यस्थ यह काम कर सके। कुछ महीने पहले भी हमने इस मुद्दे को लेकर लिखा था कि तमाम आपसी मतभेदों को बिना किसी तीसरे पक्ष के सुलझाने के शिमला समझौते को किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ की तरह का मानना ठीक नहीं होगा जिसमें कि कोई बदलाव नहीं हो सकता। इन दोनों देशों को आज के हालात देखते हुए यह समझना होगा कि बातचीत शुरू करने के रास्ते जरूरी हैं, तनाव में जीते हुए, शिमला समझौते पर अड़े हुए कुछ हासिल नहीं हो सकता। फिर दोनों देशों पर राज कर रहे लोगों को यह भी समझना होगा कि इनमें से कोई इस तनाव की लागत उठाने की हालत में नहीं हैं, क्योंकि दोनों तरफ भारी भूख और कुपोषण है, गरीबी और बीमारी है, अस्पतालों और स्कूलों की जरूरत है। तनाव को खत्म करने का एक बड़ा ऐतिहासिक मौका इसी हफ्ते आ रहा है जब भारतीय प्रतिनिधि मंडल बिना पासपोर्ट और वीजा के पाकिस्तान के करतारपुर गुरुद्वारा जाएगा। गुरूनानक से लेकर भगत सिंह तक कुछेक ऐसे नाम हैं जो कि सरहद के दोनों तरफ लोगों के लिए बहुत ही बड़ी श्रद्धा का केन्द्र है। दोनों देशों को ऐसी साझी विरासत की ओर देखना चाहिए, बजाय भड़काऊ बयानों के, नफरत और धमकियों के, क्योंकि उनसे केवल जंग के सौदागरों का भला हो सकता है, इन दोनों देशों के भूखे, कुपोषित, बीमार, और अशिक्षित लोगों का नहीं। इन देशों की राजधानियों में बसे लोगों को अपनी तैश, और अपने अहंकार के चलते जंग के फतवे देना बंद करना चाहिए, क्योंकि जंग में राजधानियों के लोग नहीं मरते, सरहदों पर बसे, या वहां पर लडऩे वाले प्यादे मरते हैं। इसलिए सारे तनावों के चलते हुए भी आपसी सद्भाव के कुछ न कुछ मुद्दे और मोर्चे ढूंढना जारी रखना चाहिए। जंग के फतवों के पीछे एक बड़ी वजह रहती है कि सरकारें अपने भूखे, बेरोजगार, और फटेहाल लोगों को राष्ट्रवाद में उलझाना चाहती हैं ताकि वे बाकी तकलीफों को महत्वहीन मान लें। 
-सुनील कुमार

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