संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 नवंबर : फसल के दाम पर भूपेश के दिल्ली-कूच के मायने इस राज्य से बाहर भी...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 7 नवंबर : फसल के दाम पर भूपेश के दिल्ली-कूच के मायने इस राज्य से बाहर भी...
Date : 07-Nov-2019

आज जब देश भर में कांग्रेस की हालत को लेकर लतीफे और कार्टून बनना भी तकरीबन बंद हो गया है, क्योंकि वह चर्चा से ही बाहर हो गई है, तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में बनाए रखने का एक काम किया है। लेकिन यह काम महज खबरों में बने रहने के लिए नहीं हैं, बल्कि पार्टी को सत्ता में लाने वाले धान के समर्थन मूल्य का मामला है जिसके लिए भूपेश केन्द्र सरकार से टकराव मोल लेने के लिए सैकड़ों गाडिय़ों के काफिले में दस-बीस हजार लोगों को लेकर दिल्ली जाने का ऐलान कर चुके हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीतने के बाद छत्तीसगढ़ में अपने चुनावी वायदे के मुताबिक ढाई हजार रूपए के दाम से धान खरीदा था। बाजार की व्यवस्था के बीच यह एक बड़े घाटे का काम था, लेकिन नई-नई सरकार ने बड़ा कर्ज लेकर भी इसे पूरा किया। इसके साथ-साथ भूपेश सरकार ने अपने पहले कुछ दिनों में ही किसानी-कर्जमाफी का भी वायदा पूरा किया। इन दो फैसलों से राज्य के ग्रामीण इलाकों में सरकार को भारी वाहवाही मिली, यह एक अलग बात है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी का मुकाबला इस वाहवाही की मदद से भी नहीं हो पाया। दूसरी तरफ यह भी याद रखने की जरूरत है कि धान के समर्थन मूल्य और कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर विधानसभा चुनाव के काफी पहले से छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा ने नरेन्द्र मोदी-अमित शाह से अपील की थी, लेकिन वहां से बड़ी साफ मनाही हो गई थी कि अर्थव्यवस्था इसकी इजाजत नहीं देती, और पार्टी चुनाव हार जाए तो हार जाए। ऐसे में कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र और वायदे पर छत्तीसगढ़ की जनता ने विश्वास किया, और कांग्रेस भवन का छत फाड़ते हुए सीटें बरसा दी थीं। 

अब आज जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर न कोई मुद्दा है, न कोई माहौल है, और न ही देश में विपक्ष वजनदार रह गया है, तो ऐसे में भूपेश बघेल केन्द्र सरकार से धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए, और छत्तीसगढ़ से अधिक धान लेने के लिए केन्द्र सरकार के सामने प्रदर्शन करने जा रहे हैं। उन्होंने जिस तरह के दिल्ली कूच की घोषणा की है, वह अपने आपमें अभूतपूर्व है, और देश के किसी भी राज्य में कांग्रेस पार्टी के लिए अकल्पनीय भी है। भूपेश बघेल विधानसभा चुनाव के पहले से नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ जिस तरह के हमलावर तेवरों के साथ एक जनमोर्चा चला रहे हैं, वह कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों या किसी भी प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्षों के बीच भी कुछ अनोखी बात रही। इसलिए अब जब दिल्ली से सवा हजार किलोमीटर दूर बसे एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इतना बड़ा कारवां लेकर मोदी के सामने जाने की घोषणा कर चुका है, तो यह प्रदेश के भीतर किसानों से वायदा निभाने के साथ-साथ, देश की राजनीति में किसानों के हमदर्द की तरह खड़े होने का काम भी है। लोगों को याद रखना होगा कि जब मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई थी, तो भाजपा ने किसानों के समर्थन मूल्य पर स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों को मानने का वायदा किया था। लेकिन सरकार बनाने के बाद भाजपा को यह समझ आया कि यह वायदा वह पूरा नहीं कर सकती। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह ने मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान ही बंद कमरों की बैठकों में यह साफ कर दिया था कि भाजपा स्वामिनाथन कमेटी की सिफोरिशों के मुताबिक समर्थन मूल्य नहीं देगी क्योंकि उससे देश का दीवाला निकल जाएगा। अब ऐसे हाल में भूपेश बघेल न सिर्फ छत्तीसगढ़ में पिछले बरस से अधिक धान खरीदी की घोषणा कर चुके हैं, बल्कि 25 सौ रूपए का दाम देने के लिए उन्होंने कर्ज लेने की तैयारी भी की है। अब वे केन्द्र सरकार से मांग करने जा रहे हैं कि वह छत्तीसगढ़ से अधिक धान ले ताकि राज्य में क्षमता से अधिक धान जमा न हो जाए। 

भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के किसानों से किए गए अपने वायदे को तो खुद पूरा कर रहे हैं, लेकिन आगे के इंतजाम के लिए वे दिल्ली जाकर एक मोर्चा खोल रहे हैं। इससे छत्तीसगढ़ के किसानों से परे भी एक बात होने जा रही है, कि फसलों का समर्थन मूल्य एक बार फिर चर्चा में आएगा, देश भर के किसानों के सामने छत्तीसगढ़ की मिसाल खड़ी रहेगी जो कि कांग्रेस पार्टी को बाकी प्रदेशों से परे की एक अलग साख दिलवाएगी। इसके साथ-साथ जब एक राज्य केन्द्र सरकार से अधिक अनाज लेने की मांग कर रहा है तो यह बात भी बहस में आएगी कि अगर देश में अनाज की इतनी पैदावार है जिसे रखने की दिक्कत है, तो फिर यह देश भूख और कुपोषण की लिस्ट में इतना ऊपर क्यों है? यह बात भी चर्चा में आएगी कि क्या अधिक पैदावार को लोगों के बीच, खासकर सबसे गरीब और कुपोषण के शिकार लोगों के बीच बांट देना कोई बुरी बात रहेगी? आज तो हालत यह है कि देश में सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है लेकिन लोगों को बांटा नहीं जा रहा है। इस तस्वीर को कैसे बदला जा सकता है, उस पर भी देश को सोचना चाहिए, और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के इस दिल्ली-कूच से देश की सरकारें, देश की पार्टियां, अर्थशास्त्री इस बारे में सोचने के लिए मजबूर होंगे। कुल मिलाकर अपने वायदे को पूरा करने के साथ-साथ, उससे आगे बढऩे के साथ-साथ भूपेश बघेल मोदी-शाह के सामने एक चुनौती भी खड़ी कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की अपनी ही भाजपा की बात तो इन्होंने अनसुनी कर दी थी, लेकिन अब एक सार्वजनिक विपक्षी चुनौती को उसी तरह अनसुना करना एक राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ का बढ़ा हुआ समर्थन मूल्य भी स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों से बहुत कम है, और उस तरफ आगे बढऩे के लिए जिस बहस की जरूरत है, अब कम से कम वह तो दिल्ली-कूच से शुरू होगी।
-सुनील कुमार

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