संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 नवंबर : मीडिया को भी यह समझने  की जरूरत कि बलात्कार में इज्जत किसकी लुटती है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 14 नवंबर : मीडिया को भी यह समझने की जरूरत कि बलात्कार में इज्जत किसकी लुटती है...
Date : 14-Nov-2019

आए दिन हिन्दी के अखबारों में यह पढऩे मिलता है कि किसी एक आदमी ने, या कुछ लोगों ने मिलकर, किसी एक महिला या लड़की की इज्जत लूट ली। बड़े-बूढ़े समाज के भीतर यह नसीहत देते ही रहते हैं कि लड़की को अपनी इज्जत बचाने की खुद भी फिक्र करनी चाहिए। कुछ समय पहले झारखंड की एक खबर आई थी कि एक लड़की के साथ उसके चाचा ने बलात्कार किया, और पंचायत ने फैसला दिया कि उन दोनों को जिंदा जला दिया जाए। 

समाज का यह मर्दाना रूख न तो नया है, और न ही इक्कीसवीं सदी में पहुंची हुई दुनिया में भी यह कम हिंसक हुआ है। बलात्कार करने वाले लोग अपनी इज्जत नहीं खोते, और जिस लड़की के साथ बलात्कार होता है, उसकी इज्जत चली जाती है! यह हिंसक नजरिया मर्दों को यह बलात्कारी मर्दानगी जारी रखने का हौसला देता है क्योंकि इससे मर्द की इज्जत तो जाती नहीं। लोग लड़कियों और महिलाओं को ही अकेले न निकलने, कपड़े सावधानी से पहनने, और मर्दों के बीच न उठने-बैठने की दर्जनों नसीहत देते दिख जाते हैं, लेकिन लड़कों को कैसा रहना चाहिए, उन्हें क्या-क्या नहीं करना चाहिए, ऐसी नसीहत देते कोई परिवार शायद ही दिखते हों। नतीजा यह होता है कि जब बलात्कारी अपने पूरे परिवार की इज्जत को मिट्टी में मिला देता है, तब भी इज्जत लुट जाने की बात लड़की के लिए ही लिखी जाती है। बोलचाल में कहा जाता है कि वह अब कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी, मानो बलात्कारी का चेहरा दमक रहा हो, और वह अखबार के पहले पन्ने के लायक हो। 

जब से भारत में कुछ प्रमुख महिलाओं ने उनके साथ हुए यौन शोषण, या यौन प्रताडऩा की शिकायतें की हैं, तब से सोशल मीडिया पर महिलाओं के पूरे तबके के खिलाफ तरह-तरह के लतीफे बन रहे हैं, तरह-तरह के कार्टून बन रहे हैं, और मर्दों की सारी रचनात्मक कल्पनाशीलता जोरों से इस्तेमाल हो रही है। बलात्कार को लेकर मजाक के इस हद तक आम हो जाने का यह शायद पहला ही मौका है, और कुछ प्रमुख मर्दों पर लगी तोहमतों को लेकर मानो जवाब में बाकी तमाम मर्द-बिरादरी जवाबी हमले के तेवरों में आ गई है। दरअसल मर्दों के पूरे तबके को यह मालूम है कि यह सिलसिला महानगरों और प्रमुख महिलाओं से आगे बढ़कर छोटे शहरों और आम महिलाओं तक अगर आगे बढ़ेगा तो तकरीबन तमाम मर्द किसी न किसी किस्म की दिक्कत में आ जाएंगे। 

लेकिन जैसा कि हमने इस मुद्दे पर लिखते हुए पहले भी लिखा है कि ऐसे मौके समाज को आत्ममंथन का एक मौका भी देते हैं कि उसकी भाषा, उसके मुहावरे, उसकी कहावतें, और उसके शब्द किस तरह बेइंसाफी की बात करते हैं, किस तरह वे महिलाओं के खिलाफ हिंसक रहते हैं। यह सिलसिला लगातार जागरूकता पैदा करने के लिए भी इस्तेमाल होना चाहिए, न सिर्फ महज भांडाफोड़ के लिए, बल्कि महिलाओं के लिए काम की जगहों पर, समाज में एक सुरक्षित माहौल बनाने के लिए, बल्कि समाज की भाषा को भी सुधारने के लिए। मीडिया जो कि आमतौर पर पढ़ा-लिखा माना जाता है, उसे भी यह समझने की जरूरत है कि इज्जत बलात्कारी की लुटती है, न कि बलात्कार की शिकार महिला की। अखबारी भाषा का यह मर्दाना रुझान बदलना चाहिए, और आज लोगों की जिंदगी में खासे हावी हो चुके मीडिया को अपने राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी करनी चाहिए।
-सुनील कुमार

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