विचार / लेख

जब्बार भाई और हमारा अपराध
जब्बार भाई और हमारा अपराध
Date : 15-Nov-2019

सचिन कुमार जैन
जब्बार भाई बात माफी के लायक तो नहीं है, पर फिर भी कहना चाहता हूँ माफ कर दीजिएगा।  हमने बहुत देर कर दी। यह तो नहीं ही कहा जा सकता है कि आपने हमें वक्त नहीं दिया, खूब वक्त दिया समझने के लिए और कुछ कर पाने के लिए। हमने लापरवाही और उपेक्षा का बहुत बड़ा अपराध कर दिया। हमें पता भी था कि आप कौन हैं? आप अब्दुल जब्बार थे, वही अब्दुल जब्बार जिसने भोपाल गैस त्रासदी को देखा और उसका आक्रमण झेला था। वह आक्रमण कईयों ने झेला था। मैंने भी झेला था। मैंने भी उस जहर की जलन को महसूस किया था अपनी आंखों में, अपने सीने में किन्तु आपने उस जलन के दर्द को इतना महसूस किया कि समाज के दर्द को दूर करने में यह भूल ही गए कि आपकी खुद की स्थिति क्या है? पिछले चार दिन हमें यह बता रहे थे कि हम क्या क्या नहीं जान पाए? आप समाज का ध्यान रख रहे थे, हम आपका ध्यान नहीं रख रहे थे। कुछ दोस्तों ने ध्यान रखा, किन्तु हमने तो नहीं!
जब्बार भाई ने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी मां-पिता और भाई को खो दिया था। उनकी आंखों की 50 फीसदी रोशनी भी चली गई थी। उन्हें लंग फाइब्रोसिस भी हो गया था। खुद को भीतर से बीमार करते हुए आप आंदोलन को, जन संघर्ष को, संगठन को मजबूत करने में जुटे रहे। एक निर्माण मजदूर ने जहरीली गैस से ऐसी लड़ाई लड़ी कि वह अब्दुल जब्बार से भोपाल के लोगों के लिए जब्बार भाई बन गया। हजारों लोगों की जान लेने और लाखों लोगों को बीमार करने वाली इस औद्योगिक घटना को राजनीतिक और आर्थिक अपराध भी घोषित किया जाना चाहिए। जिसमें तत्कालीन सत्ताओं और न्यायपालिका ने भयंकर उपेक्षा और अमानवीयता का खुला प्रदर्शन किया। जब्बार भाई व्यवस्था से जूझ रहे थे। वे लगातार लड़ रहे थे, पर हमारा हिस्सा उनके संघर्ष में कम से कम होता जा रहा था।
जब्बार भाई, आपको बताऊं कि हम सहयोग का कार्यकाल भी तय कर देते हैं। सोचते हैं, चलो आप इतना काम कर रहे हैं, तो कुछ हाथ हम भी लगा दें पर कुछ महीनों या सालों में वह हाथ हट जाता है। हम विद्वान भी बन जाते हैं और विशेषज्ञ भी। फिर दुनिया में घूम-घूम के व्याख्यान देने लगते हैं। विज्ञान की व्याख्या भी करने लगते हैं और राजनीतिक अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद की भी। उस व्याख्या में जब्बार भाई धीरे-धीरे ओझल होते जाते हैं और फिर पूरी तरह से गुम हो जाते हैं। किताबें लिख ली गईं, प्रचार हो गए; लेकिन जब्बार भाई का क्या हुआ?
ऐसा नहीं है कि आप अचानक चले गए। कम से कम मुझे तो पता है कि पिछले 5 सालों से आप भीतर से खोखले होते जा रहे थे, हम समझ ही नहीं पाए कि आप खुद अपने ही प्रति निष्ठुर और लापरवाह हैं। दो साल पहले की जांच से आपको पता चल गया था कि दिल का मजऱ् बड़ा हो गया है, रक्त प्रवाह बाधित है, फिर भी आपने उसे छिपा लिया। मधुमेह ने नसों को ठोस बनाना शुरू कर दिया था पर आप दौड़-दौड़ कर यह जताते रहे कि आप बिलकुल ठीक हैं। आंखों से एक वक्त पर दिखना लगभग बंद हो गया था, लेकिन कईयों को पता ही नहीं चला कि आप देख नहीं पा रहे हैं।
आपने खूब वक्त दिया। मुझे याद है जब दो हफ्ते पहले एक अखबारनवीस दोस्त ने फोन किया था कि जब्बार भाई की तबियत खराब है और वे कमला नेहरु से भोपाल मेमोरियल अस्पताल के बीच ठेले जा रहे हैं। वे राज्य के बड़े राजनेता को यह सन्देश जा चुका था कि वे बहुत बीमार हैं, किन्तु राजनेता जी व्यस्त थे। जिन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आपने 34 साल लड़ाई लड़ी, उन स्वास्थ्य सेवाओं ने आपके खिलाफ पूरा पुख्ता षड्यंत्र रच दिया और कामयाब हो गए आपका जीवन छीन लेने में। कितना अजीब है न कि आदमी बीमारी से नहीं, इलाज़ के अभाव से ही मरता है। उपेक्षा से मरता है।
जब्बार भाई को जानते मुझे तो 18 साल हो गए हैं। इन 18 सालों में मैंने आपके बारे में इतना जान लिया था कि आप संस्था प्रबंधन में वक्त खराब नहीं करना चाहते हैं। आपके बहाने से पत्रकारों, आम लोगों, राजनेताओं और अधिकारियों के बताना चाहता हूँ कि जब्बार भाई ने कोई पूंजी नहीं जुटाई। वे लोगों से, दोस्तों से संगठन के लिए कुछ सहायता मांगते थे। हर 6 महीने में फोन करते कि भाई, बिल जमा नहीं होने से फोन कट गया है, बिल जमा करवा सकते हैं क्या? भाई, बिल जमा न होने से बिजली कट गयी है, बिजली का बिल जमा करवा सकते हैं क्या? भोपाल में गैर त्रासदी की बरसी होने पर पिछले 32-33 सालों से सारी नाउम्मीदी और उदासी को धकेल कर किनारे रखते और 2 और 3 दिसम्बर को त्रासदी की बरसी मनाते ताकि वह घटना लोगों के, सरकार के, विधायकों के जहन से उतर न जाए। आप बस यही कहते थे कि टेंट और माइक सिस्टम का बिल दे सकते हैं क्या? इन 18 सालों में जब्बार भाई ने यह नहीं कहा कि मेरे घर के, मेरे परिवार के हालात ऐसे हैं कि बच्चों के स्कूल की फीस भी दो-तीन महीनों से भरी नहीं गयी है। मुझे पता है कि मेरी आंखें जा रही हैं, मेरा हृदय अब शरीर को रक्त प्रवाहित नहीं कर रहा है, लेकिन यदि मैं इनके उपचार में लग जाऊँगा तो पैसा कहां से आएगा, संगठन का क्या होगा, निचली और सबसे ऊंची अदालत में चल रहे केसों का क्या होगा? सामाजिक काम करते हुए, उनके परिवार का भी बिखराव हुआ।
भारत में आजकल एक सामान्य समझ बनायी जा रही है कि सभी सामाजिक कार्यकर्ता या तो भ्रष्ट होते हैं, खूब धन इकठ्ठा करते हैं या फिर हिंसा को बढ़ाते हैं और लोगों को सरकार के खिलाफ भडक़ाते हैं। जब्बार भाई ने भोपाल के 1992 के साम्प्रदायिक दंगों के दौरान घर-घर जा कर, रात-रात भर सडक़ों-गलियों में पहरा देकर क्या बताया था? जब्बार भाई का चेहरा मासूम प्रेम और मोहब्बत की आभा बिखेरता था। जो लोग उनसे मिले, उनमें से कितनों ने उन्हें एक बार भी किसी का अपमान करते हुए देखा? उनका मध्यप्रदेश सरकार से टकराव रहा क्योंकि सरकार लगातार गैस पीडि़तों के मुआवज़े, उनके स्वास्थ्य, आवास और पानी के हकों को नजऱंदाज़ कर रही थी, उन पर समझौते कर रही थी; लेकिन उन्होंने कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया।

 

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