संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  17 नवंबर : लगता है हिन्दुस्तानी लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 17 नवंबर : लगता है हिन्दुस्तानी लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है...
Date : 17-Nov-2019

चुनाव आयोग में राजनीतिक दलों को अपना खर्च बताना होता है। आन्ध्र की सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस ने अपने खर्च में साढ़े 37 करोड़ रूपए राजनीतिक और चुनावी सलाह देने के लिए मशहूर प्रशांत किशोर की कंपनी को दिए हैं। विधानसभा चुनाव के पहले इस पार्टी के अध्यक्ष और अब आन्ध्र के मुख्यमंत्री जगन मोहन ने प्रशांत किशोर की कंपनी की सेवाएं ली थीं। राजनीतिक दलों द्वारा किया गया खर्च चुनाव आयोग की प्रत्याशी खर्च सीमा में नहीं आता, और इसलिए 176 सीटों वाली इस विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर पर इस पार्टी ने हर सीट के लिए औसतन 21 लाख रूपए खर्च किए। चुनाव आयोग की एक सीट पर खर्च करने की सीमा उम्मीदवार के लिए तो इससे कम है लेकिन जाहिर तौर पर पार्टी में आयोग की छूट इस्तेमाल करते हुए प्रत्याशी से अधिक खर्च सलाहकार पर कर दिखाया है। लोगों को पिछले काफी समय से लगातार खबरों में आ रहे चुनावी चंदे की भी याद होगी कि किस तरह देश में आज अधिकतर चुनावी चंदा भाजपा को मिल रहा है, और बाकी पार्टियां उसके बहुत पीछे हैं। चुनाव आयोग में अगर चुनावी खर्च का एक छोटा सा हिस्सा ही पार्टियां घोषित करती हैं, ऐसा अंदाज है। अब एक पार्टी चुनाव सलाहकार कंपनी को कितना पैसा चेक से देती है, और कितना नगद कालाधन, इसका हिसाब न तो आयोग रख पा रहा है, और न ही केन्द्र और राज्य सरकारों की कोई एजेंसियां। लोगों का अंदाज यह है कि घोषित खर्च के मुकाबले अघोषित खर्च पांच से दस गुना तक अधिक रहता है। अब सवाल यह है कि एक पार्टी आयोग के नियमों के तहत ही अगर एक-एक विधानसभा सीट पर सलाह और रणनीति के लिए किसी कंपनी को 21-21 लाख रूपए का घोषित भुगतान कर रही है, तो किस तरह की पार्टियां विधानसभाओं में पहुंचेंगी, किस तरह की पार्टियों की सरकार बन सकेगी? और जब विधानसभाओं में ऐसा हाल है, तो यह सोचना एक नासमझी ही होगी कि लोकसभा में हाल कुछ और होगा। 

कुल मिलाकर हालत यह है कि घोषित और अघोषित वजहों से भारतीय राजनीति में चुनावी दल इतने बड़े चंदे के कारोबार में लग गए हैं, और सामान्य समझबूझ के मुताबिक घोषित चंदा अघोषित के मुकाबले बहुत थोड़ा सा होता है, ऐसे में क्या चुनाव जीतना महज पैसों का खेल नहीं रह गया है, जिन पैसों से जनधारणा प्रबंधन से लेकर चुनावी रणनीति तक, और वोटरों की खरीदी तक आम बात है। अब चुनाव हो जाने के बाद विधायकों की खरीदी, पार्टियों में विभाजन की खरीदी, और पूरी की पूरी पार्टी का गठबंधन बदल एक और बात है जो कि बहुत अनजानी नहीं है। ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी चुनाव क्या सचमुच ही लोकतांत्रिक रह गए हैं, और क्या वे सचमुच ही जनता की स्वतंत्र पसंद का जरिया रह गए हैं? अब आन्ध्र में जगन रेड्डी की पार्टी की उस वक्त से धनकुबेर होने की साख थी जब जगन के पिता वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री थे। उस वक्त से ही जगन की टकसाल जैसी कमाई की चर्चा रहती थी। कई किस्म की जांच भी चली, और शायद अब तक कार्रवाई जारी भी है। ऐसे अथाह पैसे से अगर कोई पार्टी ऐसे सलाहकार और रणनीतिकार की सेवा खरीद सकती है जिसने कभी मोदी को गुजरात जीतने में मदद की, तो कभी नीतीश कुमार को बिहार जीतने में, तो फिर ऐसे पैसे के मुकाबले अगर दूसरी कोई ईमानदार पार्टी है, दूसरे कोई ईमानदार उम्मीदवार हैं, तो उनके जीतने की कोई गुंजाइश बच भी जाती है? 

आज जो लोग चुनाव के तौर-तरीकों को जानते हैं, वे एक मामूली सा केलकुलेटर लेकर अपने प्रदेश की विधानसभा की एक औसत सीट पर किया गया पूंजीनिवेश आसानी से हिसाब कर सकते हैं। इसी तरह अपने प्रदेश की लोकसभा सीटों पर किया गया पूंजीनिवेश भी लोग निकाल सकते हैं। मतलब यह कि कोई विधानसभा, या लोकसभा काम शुरू करने के पहले ही इतने बड़े पूंजीनिवेश की बुनियाद पर बनी होती है कि उसकी भरपाई, और अगले ऐसे कुछ चुनावों की तैयारी प्रतिनिधियों और पार्टियों का एक बड़ा मकसद रहता है। जाहिर है कि ऐसे सदन किसी भी तरह से गरीब के हिमायती नहीं रह सकते, उन्हें गरीबों की फिक्र नहीं रह सकती क्योंकि चुनाव जीतने के लिए गरीबों के जो वोट लगते हैं, वे मतदान के पहले के ताजा-ताजा नोटों से पाए जा सकते हैं, पाए जा रहे हैं। तकनीकी रूप से हिन्दुस्तान के हर वोटर के हाथ में बराबर का हक है, लेकिन हकीकत यह है कि इन वोटों में से एक बड़ा हिस्सा नोटर के हाथ बिकने वाला रहता है, और जीतने वाले उम्मीदवार की कामयाबी का एक बड़ा हिस्सा रहता है। यह भी सोचने की जरूरत है कि जहां पर सबसे ताकतवर खरीददार जीत को खरीद सकते हैं, वहां पर अपने मन को झांसा देने के लिए भी क्या यह सोचना ठीक है कि यह जनता का लोकतांत्रिक फैसला है? क्या हिन्दुस्तान में अब चुनावों का फैसला वोटों के साथ-साथ, या वोटों से अधिक, नोटों से तय नहीं होने लगा है? क्या जनता भी ऐसे ताकतवर और संपन्न उम्मीदवार को पसंद नहीं करने लगी है जो अगले पांच बरस उसकी जायज और नाजायज जरूरतों को पूरा कर सके? क्या जनता के वोट प्रदेश और देश का भविष्य तय करने के बजाय, उसके खुद के आज और आने वाले कल की सहूलियतों को तय करने के हिसाब से नहीं डाला जा रहा है? क्या जिंदगी के, देश और प्रदेश के असल मुद्दों से परे निहायत ही खोखले लेकिन भड़काऊ-भावनात्मक मुद्दे चुनावी नतीजे तय करने के लिए नोटों पर सवार होकर वोटों तक जा रहे हैं? इन तमाम पहलुओं को देखें तो लगता है कि हिन्दुस्तान का लोकतंत्र एक बड़ा पाखंड रह गया है। यह लिखा हुआ छपने जा ही रहा था कि एक खबर सामने आई, कर्नाटक में कांग्रेस छोड़ भाजपा जाने वाले विधायक-मंत्री एमटीबी नागराज ने 5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए भरे पर्चे में अपनी संपत्ति 1223 करोड़ घोषित की है, जो कि 18 महीने पहले की घोषणा से 160 करोड़ अधिक है। दौलत की ऐसे तेज रफ्तार और ताकतवर सुनामी के सामने किस पार्टी के कौन से उम्मीदवार टिक सकते हैं?
-सुनील कुमार

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