संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  18 नवंबर : ...चूंकि धरती पर फिट बैठने वाला कोई हेलमेट बना नहीं है इसलिए...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 नवंबर : ...चूंकि धरती पर फिट बैठने वाला कोई हेलमेट बना नहीं है इसलिए...
Date : 18-Nov-2019

सड़कों की जगह पानी की नहरों वाले इटली के वेनिस शहर के इलाके की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक चल रही थी, और वहां एक पार्टी के लोगों ने जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में विचार करने का प्रस्ताव रखा। इसे दूसरी बड़ी पार्टियों ने खारिज कर दिया। बैठक चल ही रही थी। कुदरत की चेतावनी का शायद दुनिया के इतिहास का इतना बड़ा दूसरा मामला दर्ज न हुआ हो, बैठक में प्रस्ताव खारिज हुआ, जलवायु परिवर्तन के खतरों पर विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई, और दो मिनटों के भीतर बैठक के कमरे में पानी भरना शुरू हो गया, देखते ही देखते पानी टेबिल तक पहुंच गया। और यह किसी साजिश के तहत किसी टंकी से लाकर भरा गया पानी नहीं था, यह समंदर से जुड़ी हुई वेनिस की नहरों से आया हुआ पानी था जिसने पूरे शहर को डुबाकर रख दिया। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए लोगों ने प्रस्ताव रखा था कि आसपास के इलाकों में डीजल इंजनों पर रोक लगाई जाए और कुछ दूसरे कदम भी उठाए जाएं, लेकिन जब बैठक में हिस्सेदार लोगों ने यह तय किया कि ऐसे कदम उठाने की जरूरत नहीं है, ऐसे कोई कदम नहीं उठाए जाएंगे, तो कुदरत ने ही एक कदम उठाया, और मीटिंग रूम के भीतर पहुंच गई। 

कुदरत की चेतावनी पहले भी कहीं सुनामी की शक्ल में, कहीं बाढ़ की शक्ल में, और कहीं फटी हुई धरती के सूखे की शक्ल में सामने आती रही है। लेकिन अगर इस मीटिंग के बीच दो मिनटों के भीतर पानी ऐसा नहीं पहुंचा होता तो शायद यह किसी विज्ञान कथा या किसी फिल्म की बात ही मानी जाती। लेकिन कुदरत ने बैठक के भीतर घुसकर लोगों को बतलाया कि यह उसकी खुद की जरूरत का मामला नहीं है, यह डूबने जा रहे शहरों में बसे लोगों की जरूरत का मामला है, उसने शहर को डुबाकर एक नमूना सामने रख दिया। आज पूरी हिन्दुस्तान में एक्स्ट्रीम वैदर, या वैदर एक्स्ट्रीम के मामले जिस रफ्तार से बढ़ते चल रहे हैं, शहरों को पाटने वाली बर्फ की ऊंचाई जितनी बढ़ती चल रही है, दिल्ली जैसा प्रदूषण जितना बढ़ते चल रहा है, महाराष्ट्र जैसा जलसंकट जितना बढ़ते चल रहा है, नए-नए इलाकों में बाढ़ जितनी तबाही बढ़ाते चल रही है, उन सबको देखें तो लगता है कि कुदरत के साथ खिलवाड़ के खतरे धीरे-धीरे दिखते हैं, या सुनामी की शक्ल में इस रफ्तार से आते हैं कि दौड़कर समंदर से दूर जाने का वक्त भी नहीं मिलता। लेकिन जब इस खतरे से बचने के बारे में सोचा जाए, तो दुनिया का अधिकतर हिस्सा अपनी आज की सुख-सुविधा को देखते हुए खतरे को कल की तरफ धकेल देता है, और रात में एसी शुरू करके सो जाता है। 

लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समझदार दुनिया किस तरह अपनी ऊर्जा की खपत को काबू करने के साथ-साथ ऊर्जा पैदा करने के तरीकों को बदल भी रही है ताकि धरती की तबाही धीमी हो सके। अभी पश्चिम के एक विकसित देश की खबर है कि किस तरह उसने यह तय किया है कि वह कोयले से चलने वाले अपने सारे बिजलीघरों को बंद कर रहा है। दुनिया में आज सौर ऊर्जा जितनी सस्ती होती जा रही है, अभी दो दिन पहले ही उसने पेट्रोलियम से चलने वाली गाडिय़ों के मुकाबले अधिक किफायती होना साबित कर दिया है। इंसान की कल्पना से भी अधिक रफ्तार से सौर ऊर्जा पेट्रोलियम और कोयले जैसे जीवाश्म से पैदा होने वाली बिजली से सस्ती होने जा रही है, या हो चुकी है। ऐसे में यह पता भी नहीं चलेगा कि कब कोयले का बिजलीघर अपने तमाम धुएं और प्रदूषण के साथ, या उसे अनदेखा करने पर भी, सौर ऊर्जा से महंगा पडऩे लगेगा, या शायद आज भी महंगा पड़ चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे उन प्रदेशों को अपनी चली आ रही सोचने की रफ्तार को कुछ थामकर नए किस्म से सोचना चाहिए क्योंकि इस राज्य में जंगलोंतले, आदिवासी इलाकोंतले दबी हुई कोयला खदानों को खोलने की एक बड़ी मशक्कत चल रही है जिसका सामाजिक कार्यकर्ता जमकर विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के एक सबसे बड़े उद्योगपति के हवाले होने जा रही छत्तीसगढ़ की कोयला खदानों को लेकर यह भी समझने की जरूरत है कि क्या दस-बीस बरस बाद सचमुच ही इतने कोयले की जरूरत बची रहेगी, या सस्ती सौर ऊर्जा कोयला-बिजलीघरों को कबाड़ बनाकर रख देगी? यह भी समझने की जरूरत है कि जब कोयले के खरीददार नहीं बचेंगे, तो बेदखल किए गए आदिवासियों को उनके हक की जमीन, और उनके हक के जंगल कहां से लाकर, और कैसे लौटाए जा सकेंगे? यह भी समझने की जरूरत है कि कोयले की बिजलीघरों के घाटे में चले जाने के बाद उन पर लगे हुए पूंजीनिवेश का क्या होगा, और क्या वे दीवालिया होकर बैंकों में आम जनता की जमा पूंजी को ही डुबाएंगे? लेकिन बैंकों के डूबने से परे, आम जनता की जमा पूंजी के डूबने से परे, धरती के डूबने के बारे में पहले सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के सामने, और हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों के सामने एक ऐसी बड़ी संभावना मौजूद है जो कि दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में नहीं है। यहां पर साल के कम से कम आठ महीने सूरज की इतनी रौशनी रहती है कि सौर बिजलीघर जरूरत की तकरीबन सारी बिजली पैदा कर सकते हैं। हर घर और हर इमारत की छत भी अपनी जरूरत का बिजलीघर बन सकती है, हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर नहरों पर ऐसे सोलर पैनल कामयाबी से लग चुके हैं जो वहां के पंप चलाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला खदान वाले राज्य को कुछ थमकर यह देखना चाहिए कि कोयला खदानों को बढ़ाए बिना भी, कोयला उत्पादन बढ़ाए बिना भी किस तरह देश-प्रदेश का काम चल सकता है? और भारत सरकार को चाहिए कि एक तरफ सौर ऊर्जा के कोयला-बिजली से सस्ते हो जाने के बाद, और दूसरी तरफ पेट्रोलियम की जगह बैटरियों से चलने वाली गाडिय़ों के किफायती हो जाने के बाद, इस देश की ऊर्जा की जरूरत और इसकी तकनीक के बारे में एक बार फिर से सोचे। और तब तक यह होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकारें थोड़ी सी दूरदर्शिता दिखाते हुए इतना काम करें कि कोयला खदानों के नाम पर जंगलों और आदिवासियों को बेदखल और खत्म करना रोक दें। पर्यावरण और कारोबार दोनों से जुड़ा हुआ यह इतना बड़ा मुद्दा है कि हिन्दुस्तान की सर्वोच्च अदालत, या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल खुद होकर भी ऐसी एक रोक लगा सकती हंै, या कम से कम केन्द्र और राज्य सरकारों को नोटिस भेजकर ऐसा अनुमान मांग सकती हैं कि आने वाले दिनों में ऊर्जा की जरूरत, ऊर्जा की तकनीक, और कोयले के बिजलीघरों का भविष्य, इन सब पर जवाब दे। छत्तीसगढ़ जैसे कोयला-राज्य को इस मामले में पहल करनी चाहिए, और जंगल-आदिवासियों की बेदखली को तो तुरंत ही स्थगित करना चाहिए। जो पानी इटली की एक क्षेत्रीय काऊंसिल की बैठक में पहुंचकर लोगों के दिमाग को खटखटा चुका है, वह खटखटाहट किसी और शक्ल में पूरे हिन्दुस्तान के सिर पर भी हो सकती है, छत्तीसगढ़ के सिर पर भी। अभी तक कुदरत की मार से धरती नाम के इस गोले को बचाने के लिए इतना बड़ा कोई हेलमेट बना नहीं है, इसलिए देश-प्रदेश की सरकारें धरती की जिंदगी को अपनी पांच बरस की जिंदगी से अधिक लंबा मानकर चलें, अपने कार्यकाल से अधिक महत्वपूर्ण मानकर चलें। 
-सुनील कुमार

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