विशेष रिपोर्ट

बैकुंठपुर, गांव ने जमीन छीनी तो दो साल जंगल में, झोपड़ी टूटी तो अब चार साल से गुफा में!
बैकुंठपुर, गांव ने जमीन छीनी तो दो साल जंगल में, झोपड़ी टूटी तो अब चार साल से गुफा में!
Date : 21-Nov-2019

गांव ने जमीन छीनी तो दो साल जंगल में, झोपड़ी टूटी तो अब चार साल से गुफा में!

चंद्रकांत पारगीर

बैकुंठपुर, 21 नवंबर। आज के डिजीटल युग में तमाम सुविधाओं के बीच में लोगों को रहने की आदत हो गयी है, थोड़ी देर के लिए भी असुविधा का सामना नहीं कर सकते, ऐसे में आज 21वीं सदी में कोई व्यक्ति अपने परिवार के साथ पहाड़ों की गुफा में निवास कर सकता है इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसा सोचकर ही हमें आदिमानव की याद आ जाती है जो जंगलों व गुफाओं में रहा करते थे ऐसा दृश्य आज भी दिख जाये तो इससे आश्चर्य और कुछ नहीं होगा।

वहीं इस संबंध में गणेशपुर के सामाजिक कार्यकर्ता नागेश्वर सिंह बताते हैं कि पहली बार 2015 में जब वो जंगल गए तो उन्होंने गुफा में निवास करते एक परिवार देखा, उन्होंने उसे गांव में चलने को कहा, पर वो नहीं माना, उसके बाद उन्होंने प्रयास करके उक्त परिवार का राशन कार्ड बनवाया, दो किमी अंदर जंगल में रहने के कारण उनका पुत्र पढऩे नहीं जा पाता है। आज भी उक्त परिवार गुफा में ही, अंधेरे में रह रहे हंै। मेरे लिए भी यह आश्चर्य की बात है।

आज हर परिवार के पास अपना घर है, गरीब परिवार भी किसी तरह गांव में अपने टूटे-फूटे घर में निवास कर रहा है ऐसे समय में एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसके पास एक इंच भी भूमि नहीं है गांव वालों के द्वारा बहिष्कार कर दिये जाने के बाद वह जंगल की गुफा में रहने को मजबूर है वह भी ऐसे समय में जब सरकार गरीबों का पक्का मकान बनाकर देने की योजना चला रही है। ऐसा ही एक दुर्लभ मामला कोरिया जिले में देखने को मिला। इसकी जानकारी मिलने के साथ ही ‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता जंगल में पहाड़ के बीच पहुंचा तो देखा कि एक परिवार पहाड़ की चट्टानों से बनी गुफा में समाज से दूर एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है। मजबूरी व हालात ने इस परिवार को जंगल की गुफा में रहने को मजबूर कर दिया। आज कई वर्षों से परिवार चट्टान की गुफा में निवास कर रहा है लेकिन प्रशासन को इसकी खबर तक नहीं लग पाई। तमाम असुविधाओं को झेलते हुए आदि मानव की तरह यह परिवार कई वर्षों से गुमनामी की जिंदगी जंगली जानवरों के बीच गुजार रहा है। पूर्व में जिस गांव पंचायत का निवासी था वहां के जनप्रतिनिधियों ने भी कभी इस परिवार को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया। जंगल की गुफा में निवास करने के कारण शासन की किसी योजना का लाभ इस परिवार को नहीं मिल रहा है। इस परिवार के पास अपने नाम की एक इंच की भी भूमि नहीं है जिसके चलते परिवार मेहनत मजदूरी के साथ जंगल के कंदमूल खाकर अपना जीवन गुजार रहा है।

परिवार की जिंदगी कट रही जंगल की गुफा में

कोरिया जिले के खडग़वां ब्लाक अंतर्गत ग्राम दुग्गी का एक परिवार के हालात ऐसे बने कि परिवार का मुखिया अपने परिवार के साथ आज पांच वर्षों से जंगल व पहाड़ की गुफा में रहने को मजबूर है, जहां जंगली जानवरों का चौबीस घंटे खतरा रहता है।

जानकारी के अनुसार खडग़वां जनपद अंतर्गत ग्राम दुग्गी निवासी देवनारायण पठारी अपनी पत्नी राजकुमारी तथा एक 5-6  वर्षीय पुत्र के साथ जंगल की गुफा में रहने को मजबूर हैं। जहां किसी तरह की कोई सुविधा नहीं है। इस परिवार के मुखिया देवनारायण ने बताया कि मैं पहले ग्राम दुग्गी में रहता था लेकिन हालात ऐसे बने कि तीन साल तक जंगल में झोपड़ी बनाकर रहा इसके बाद बीते 4 साल साल से गढ़पहाड़ के नीचे बनी चट्टान की गुफा में निवास कर रहा हूं।

उसने बताया कि उसकी मजबूरी इस तरह की हुई कि वह आज परिवार समाज व गांव से दूर गुफा में रहने को मजबूर है। लगता है कि अब पूरी जिंदगी यहीं कटेगी। जिस जगह पर यह परिवार रहता है उसे क्षेत्रीय ग्रामीण छातापखना कहते हंै। विशाला चट्टान पर एक गुफा प्राकृतिक रूप से बनी हुई है। जिसमें सिर झुकाकर ही अंदर प्रवेश किया जा सकता है। जिसके भीतर प्रवेश करने पर कुछ लोगों के रहने भर के लिए तंग स्थान है जिसमें  यह परिवार निवास करता है। रात के दौरान परिवार गुफा के मुख्य द्वार को ढंक लेते है। इसी तरह हर दिन की जिंदगी खतरों व अभावों के बीच गुजर रही है। उसने गुफा को अंदर से सफेद मिट्टी से रंग दिया है। ताकि अंदर साफ नजर आ सके।

गांव में थी थोड़ी जमीन वह भी लुट गई

जंगल की गुफा में रह रहे परिवार के मुखिया देवनारायण ने ‘छत्तीसगढ़ ’ को बताया कि वह पहले ग्राम दुग्गी में रहता था, जहां उसकी थोड़ी भूमि थी लेकिन वह विवादित भूमि को लेकर गांव वालों द्वारा एकतरफा फैसला करके उसकी भूमि को लूट लिया गया। इसके बाद गांववालों द्वारा उसका बहिष्कार कर दिया गया । जिसके बाद उसे गांव छोडऩा पड़ा। वह गांव से दूर जंगल में झोपड़ी बनाकर करीब दो साल तक रहा, वह गिर गई, फिर गढ़पहाड़ के पास छातापखना गुफा में चार साल से लगातार निवास कर रहा है। उसने बताया कि उसे सरकारी योजना में सिर्फ राशन कार्ड का लाभ रहा है।

पास के गांव गणेशपुर के नागेश्वर सिंह की पहल पर कुछ माह पूर्व उसका राशन कार्ड बनवा दिया गया है इसके अलावा किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला। जंगल के कंदमूल खोजकर खाते हैं और मजदूरी करते हैं। इसी तरह दिन कट रहा है। वहीं उसकी पत्नी राजकुमारी ने बताया कि उसका पति जहां उसे रखेगा वहीं तो रहना होगा। इस तरह परिवार तीन वर्षों से गुफा में निवास कर रहा है।

बच्चे की पढ़ाई की सता रही चिंता

गुफा में रहने वाले देवनाराण पठारी को इस बात की ज्यादा चिंता नहीं है कि वह गुफा में जिंदगी काट रहा है बल्कि उसे इस बात की ज्यादा चिंता है कि उसका बच्चा पढ़ाई नहीं कर पा रहा है। उसने बताया कि उसकी जिंदगी तो कट जायेगी लेकिन बच्चे का भविष्य क्या होगा। उसके पास तो घर भी नहीं है और ना ही कमाने के लिए खेती की जमीन है। बच्चे की पढ़ाई के लिए स्कूल भी दूर है ऐसे में मैं क्या करू मुझे समझ नहीं आ रहा। बच्चे व मेरे परिवार का भविष्य मेरे ना रहने पर क्या होगा।

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