संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 13 दिसंबर : बलात्कार से लेकर संसद, और आरक्षण तक जगह..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 13 दिसंबर : बलात्कार से लेकर संसद, और आरक्षण तक जगह..
Date : 13-Dec-2019

भारत सरकार द्वारा देश भर से इक_ा किए गए आंकड़ों को देखें, तो जो राज्य सबसे अधिक डरावने हैं उनमें पहला नंबर दिल्ली का है जहां प्रति लाख महिला आबादी पर 2015 से 2017 के बीच देश के सबसे ज्यादा बलात्कार हुए हैं। यह आंकड़ा 19.1 है। देश में जो सबसे भयानक पांच बलात्कारी राज्य हैं, उनमें दूसरा नंबर 13.1 के साथ मध्यप्रदेश का है, और उसके तुरंत बाद छत्तीसगढ़ है जो कि छोटा भाई है और जहां प्रति लाख महिला आबादी पर इस दौरान तेरह बलात्कार हुए हैं। कुछ अलग-अलग पैमानों पर अलग-अलग राज्यों के आंकड़े हैं जिनमें से राजस्थान और ओडिशा कम आबादी के ऐसे राज्य हैं जहां बलात्कार की कुल संख्या देश के पांच सबसे बलात्कारी राज्यों में से है। बाकी तीन राज्य आबादी में बड़े हैं, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, और महाराष्ट्र। लेकिन इन तमाम आंकड़ों के बीच अपराध और अराजकता के लिए देश में सबसे बदनाम राज्य बिहार बलात्कार में बहुत पीछे है, और मध्यप्रदेश के 2015-17 के 4976 बलात्कारों के मुकाबले बिहार में इस दौर में कुल 888 बलात्कार दर्ज हुए हैं, मध्यप्रदेश के मुकाबले सिर्फ 18 फीसदी। लेकिन आंकड़ों से बहुत अधिक नतीजे निकालने के पहले यह भी समझ लेने की जरूरत है कि कुछ राज्य ऐसे भी हो सकते हैं जहां की पुलिस रिपोर्ट ही लिखने से कतराती हो, ऐसे बहुत से मामले हाल ही में देश में जगह-जगह सामने आए हैं। 

इन आंकड़ों को लेकर किसी राज्य की इस दौर की सत्तारूढ़ पार्टी, जैसे छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में, राजस्थान और महाराष्ट्र में भाजपा, इस बात का दावा भी कर सकती है कि उसके शासनकाल में बलात्कार की किसी शिकायत को दर्ज करने से रोका नहीं गया है, इसलिए आंकड़े अधिक दिख सकते हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पास तो यह तर्क है ही कि वहां की पुलिस केन्द्र सरकार के काबू में रहती है, न कि राज्य सरकार की मातहत। इसलिए दिल्ली की कानून-व्यवस्था केन्द्र के हाथ में है, और देश में सबसे अधिक बलात्कार वाला 2015-17 का यह दौर केन्द्र में मोदी सरकार का रहा है। देश भर से आने वाली अनगिनत ऐसी खबरें हैं जिनमें बलात्कार की शिकार लड़की या महिला पुलिस थानों और अफसरों के महीनों तक चक्कर लगाती रहती है, न तो उसकी रिपोर्ट लिखी जाती, और न ही लिखी गई रिपोर्ट पर कोई गिरफ्तारी होती। ऐसे मामलों में रिपोर्ट दर्ज न करके राज्य अपना चेहरा सुधार सकते हैं, और बहुत से ऐसे अफसर होते हैं, या मंत्री-मुख्यमंत्री होते हैं जो इस तरह से चेहरा बेहतर दिखाने की कोशिश करते हैं। छत्तीसगढ़ में ही बीते कुछ बरसों में आत्महत्याओं के आंकड़ों में किसानों की आत्महत्या हजारों से घटकर शून्य पर आ गई थी क्योंकि सरकार ने तय किया था कि आत्महत्या करने वाले किसी के नाम के साथ पेशे में किसान का जिक्र नहीं करना है। इस तरह आंकड़ों को बढ़ाया, घटाया, या छुपाया जा सकता है, और झूठ या झांसा खड़ा किया जा सकता है। 

आंकड़ों से परे होकर सोचें तो देश में सबसे अधिक बलात्कार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में होते इसलिए दिख रहे हैं कि दिल्ली को एक अपवाद मानना बेहतर है क्योंकि वहां रोजाना दसियों लाख लोग बाहर से आते हैं, और किसी भी वक्त वहां बेघर महिलाओं की गिनती दसियों लाख में रहती है। दूसरे प्रदेशों से मेहनत-मजदूरी करने के लिए आई हुई महिलाओं की इतनी बड़ी मौजूदगी, और उनकी इतनी नाजुक और कमजोर हालत से भी बहुत से बलात्कार होते हैं, और प्रवासी आबादी के देश के इस सबसे बड़े केन्द्र के आंकड़े इस वजह से भी हैं। लेकिन इसके तुरंत बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ हैं जो कि बिना प्रवासियों के बोझ वाले सामान्य राज्य हैं, और एक-दूसरे से अलग होने के बीस बरस बाद भी दोनों में बलात्कार के आंकड़े हैरतअंगेज हद तक एक सरीखे हैं, 13.1 और 13.0 ! 

जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं उसी वक्त टीवी पर लोकसभा के जीवंत प्रसारण में राहुल गांधी से इस बात के लिए माफी मांगने की मांग की जा रही है कि उन्होंने देश को दुनिया का रेप कैपिटल कहा था। शायद अगले कुछ मिनटों में ही कांग्रेस के कुछ लोग यह बात गिनाएंगे कि एक वक्त मंच और माईक पर से नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली को देश का रेप कैपिटल कहा था। इसके बाद लोकसभा के ये दो पेशेवर परस्पर विरोधी इस बात पर उलझते रहेंगे कि दुनिया में हिन्दुस्तान का अधिक बड़ा अपमान नरेन्द्र मोदी ने किया था, या अब राहुल गांधी ने किया है। लेकिन यह संसद इस बात पर कोई विचार नहीं करेगी कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के रिकॉर्ड वाले कितने सांसद इस सदन में हैं, और उन्हें वहां क्यों नहीं होना चाहिए था? पार्टियों का हाल यह है कि वे इस बात पर अंतहीन बहस और झगड़ा कर सकती हैं कि उनका बलात्कारी विरोधी पार्टी के बलात्कारी से छोटा मुजरिम कैसे है, और मुजरिम है ही नहीं। 

यह देखना तकलीफदेह है कि किस तरह हिन्दुस्तान में बलात्कार अब महज सबसे अधिक क्रूरता और हिंसा वाले दूसरे पहलुओं की वजह से लोगों की फिक्र बन पाते हैं, और सिर्फ बलात्कार अब लोगों के माथों पर शिकन भी नहीं डालते। जो संसद आज, इस पल, उत्तर-पूर्व में करोड़ों लोगों की जिंदगी की सबसे बड़ी फिक्र पर बहस के खतरे को मोडऩा चाहती है, उसे कई दिन पुराना राहुल गांधी का बयान आज बड़ी सहूलियत से मिला है, और उस पर तेज हमले हो रहे हैं। यह बहस जारी रहेगी, और इसी संसद के सदस्य जाकर बलात्कारियों को जेल में जन्मदिन की बधाई देते रहेंगे, और उनकी पार्टियों को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगेगा। यह देश महज मुस्लिमों, दलितों, और आदिवासियों के अस्तित्व को अनदेखा करने वाला देश नहीं रह गया है, यह देश, देश की आधी आबादी को अनदेखा करने वाला लोकतंत्र भी हो गया है जो उस आधी आबादी को एक तिहाई आरक्षण देना भी नहीं चाहता, और उस आधी आबादी से बलात्कार पर संसद के किसी हिस्से का मन तब विचलित होता है, जब बलात्कारी उसका खुद का नहीं होता। आज महज उत्तर-पूर्व, या महज कश्मीर, या महज मुस्लिम, दलित-आदिवासी खतरे में नहीं हैं, बाकी तबकों के भीतर की भी आधी आबादी एक अभूतपूर्व खतरे में है, और यह संसद बड़ी चतुराई से एक होकर, एकमुश्त महिला आरक्षण को अनदेखा कर रही है, क्योंकि उसके आने से संसद की मर्दानगी घट जाएगी, औरतें आज संसद में महज आरोपों और बहसों में जगह पा रही हैं, वहां की कुर्सियों पर नहीं। 
-सुनील कुमार

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