संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 जनवरी : महान हस्तियों को हाशिए पर छोडऩे के नुकसान...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 जनवरी : महान हस्तियों को हाशिए पर छोडऩे के नुकसान...
Date : 12-Jan-2020

आज हिन्दुस्तान भर में स्वामी विवेकानंद की जयंती मनाई जा रही है, और इस दिन को युवा उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि विवेकानंद कुल 38 बरस रहकर चले गए थे, और एक नौजवान के रूप में ही उन्हें अपने एक अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान से शोहरत मिली थी। अब पिछले खासे अरसे से विवेकानंद हिन्दुस्तान के हिन्दूवादी लोगों के पसंदीदा व्यक्तित्व बने हुए हैं। एक किस्म से उनके नाम पर चलने वाले आश्रम और संगठन हिन्दूवादी संघ परिवार के संगठन के रूप में भी देखे जाते हैं।  आज जब चारों तरफ विवेकानंद के नाम पर कार्यक्रम हो रहे हैं, तब कुछ लोगों को यह बात भी सालती है कि धर्म और आध्यात्म के भगवा कपड़ों में जीने वाले स्वामी विवेकानंद ने कट्टरता के खिलाफ जितना कुछ कहा, और सर्वधर्म उदारता को लेकर जितना कुछ कहा वह मानो खो ही गया। उनकी बातों में से कुछ बातों को संदर्भ के बाहर कट्टर बताने की कोशिशें होती रहीं, और विवेकानंद पर एक ऐसी सोच का कब्जा हो गया जो सोच उनकी खुद की कभी थी नहीं। 

लेकिन इस मौके पर ऐसी कुछ और बातों को भी याद करना चाहिए कि देश के महान व्यक्तित्वों को अगर कोई पार्टी या विचारधारा भुला देती हैं, तो किस तरह उसका अपहरण करके दूसरे लोग उन पर काबिज हो सकते हैं। अब जैसे सरदार वल्लभ पटेल का ही मामला लें, वे कट्टर गांधीवादी थे, कट्टर कांग्रेसी थे, नेहरू को अपने से महान नेता और प्रधानमंत्री पद के लिए अधिक काबिल मानने वाले थे, और  उनके फैसले, उनका लिखा हुआ बताते हैं कि वे किस तरह गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार मानते थे, और आरएसएस पर उन्होंने प्रतिबंध भी लगाया था। अब इसके बाद आज इस देश में आरएसएस की राजनीतिक शाखा, भाजपा ने सरदार पटेल का अनुयायी होने का एक हक सा हासिल कर लिया, उनकी विशाल प्रतिमा बनवाई, और गांधी-नेहरू के मुकाबले सरदार को खड़ा करके उन्हें एक बड़ी लकीर की तरह पेश किया। उसे लेकर भी देश के कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि कांग्रेस अपने इंदिरा-राजीव प्रेम में अगर इतनी मगन नहीं होती कि वह सरदार को पूरी तरह भुला ही न बैठती, तो भाजपा को सरदार-प्रेमी बनने का मौका नहीं मिला होता। चाहे भगत सिंह हों, चाहें सुभाषचंद्र बोस हों, चाहे विवेकानंद और सरदार हों, लोकतंत्र हर पार्टी, आंदोलन, और विचारधारा को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके प्रतीक चिन्हों को हाशिए पर पड़ा देखकर कोई और उन्हें इस तरह न अपना ले कि वही उसका सामाजिक-राजनीतिक फायदा उठा सके। भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में आदर्शों और प्रतीक चिन्हों को इस तरह लावारिस छोड़ देना ठीक नहीं होता है क्योंकि वे इस तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं। 

आज एक तरफ भाजपा और हिन्दूवादी विचारधारा और संगठन गाय को लेकर एक धार्मिक, साम्प्रदायिक, और भावनात्मक संघर्ष चलाए हुए हैं, और दूसरी तरफ विनायक दामोदर सावरकर की विरासत पर एकाधिकार भी जमाए हुए हैं। लेकिन देश की दूसरी प्रगतिशील और उदार विचारधारा ने सावरकर को अंग्रेजपरस्त-साम्प्रदायिक करार देते हुए सावरकर की लिखी उन वैज्ञानिक बातों को पूरी तरह अनदेखा ही कर दिया जो उन्होंने गाय की पूजा के खिलाफ लिखी थीं, गाय को खाने के पक्ष में लिखी थीं, और जमकर लिखी थीं। अब हिन्दूवादी विचारधारा के एक सबसे बड़े आदर्श की इस वैज्ञानिक सोच को भी बाकी लोगों ने जनता के सामने रखा नहीं, वरना इस हिन्दूवादी आदर्श के साथ आज के आक्रामक हिन्दुत्व के एक सबसे बड़े एजेंडा का विरोधाभास खुलकर सामने आ गया होता। लोकतंत्र इस किस्म की ऐतिहासिक अनदेखी और ऐसी चूकों का नुकसान बहुत अच्छी तरह दर्ज करता है। जो विवेकानंद धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बहुत सी बातें कहते आए थे, जिन्होंने दुनिया भर के शरणार्थियों को भारत में जगह देने की वकालत की थी, जिनकी बातें आज देश में नागरिकता की लड़ाई में आंदोलन के काम आ सकती थीं, उनसे महज धर्म और आध्यात्म की वजह से, महज भगवे रंग की वजह से परहेज उन्हें अलग कर गया। जिस तरह गांधी ने अपनी लोकतांत्रिक लड़ाई में सबको जोडऩे के बाद भी आंदोलन को धर्म से तोड़ा नहीं था, और धर्म के प्रति उदार विचारधारा जारी रखी थी, वैसी दूरदर्शिता न रहने से पिछली आधी सदी में देश की बहुत सी महान हस्तियां लोकतंत्र के हाथ से निकलकर महज एक विचारधारा की होकर रह गई हैं। लोकतंत्र में जनभावनाओं की बहुत अनदेखी ठीक नहीं होती है, यह याद करने का दिन भी आज है, विवेकानंद जयंती पर। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments