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‘छपाक’ से किनारा करने के मायने
‘छपाक’ से किनारा करने के मायने
Date : 13-Jan-2020

रुचिर गर्ग

आज भी देश के अनेक हिस्से ऐसे ही युवा आंदोलन का गवाह बने हैं। स्वरा भास्कर जैसे कलाकार तो अपनी वैचारिक पृष्टभूमि के कारण भी ऐसे आंदोलनों के समर्थक माने जाते हैं, लेकिन दीपिका पादुकोण पूरी तरह से कमर्शियल और ऊंचे पैसों पर काम करने वाली लोकप्रिय फिल्म आर्टिस्ट हैं। 

छपाक फिल्म देखी। रविवार का दिन। गिने-चुने दर्शक। भीड़ किसी और फिल्म में जुटी थी। व्यवसाय का मामला है, सबकी अपनी-अपनी पसंद भी होती है; लेकिन दर्शकों का टोटा यदि सिर्फ इसलिए है कि दीपिका पादुकोण जेएनयू के आंदोलनरत विद्यार्थियों के समर्थन में गईं थीं और एक तबके ने इस फिल्म के बहिष्कार का ऐलान किया था तो यह हमारे समाज की तेजाबी तस्वीर है। 
निश्चित ही हमारे देश में फिल्म समाज को जागरूक करने, शिक्षित करने का एक बड़ा माध्यम है। ढेर सारी फिल्में हैं जो प्रतिरोध की आवाज़ भी बनीं। ढेर सारे फिल्मकार हैं जिन्होंने प्रतिरोध का सिनेमा बनाया। प्रतिरोध का सिनेमा,आंदोलन की शक्ल में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में उभरा लेकिन ऐसी फिल्में जो प्रतिरोध का स्वर थीं, प्रारंभ से ही अपनी जगह बनाती रही हैं। इनमें व्यावसायिक फिल्में भी हैं और कला फिल्में भी।
ये फिल्में कभी भी सुविधाजनक नहीं होतीं। समाज को झकझोरती हैं। जिन्हें कूपमंडूक समाज चाहिए उनके लिए ये फिल्में उनके इरादों में बाधा ही मानी जाती हैं। प्रतिरोध की फिल्म हो या फिल्म अथवा किसी भी कला के जरिये प्रतिरोध,ये किसी प्रगतिशील समाज के निर्माण में ज़रूरी होता है। लेकिन जब प्रगतिशीलता के मुकाबले समाज में प्रतिगामी ताकतें मजबूत होने लगती हैं तो वो चुन-चुन कर प्रगतिशीलता के प्रतीकों को नष्ट करती हैं। नालंदा विश्विद्यालय को नष्ट करने वाले खिलजी से लेकर बिना शर्म जामिया मिल्लिया विश्विद्यालय की लाइब्रेरी में घुस कर विद्यार्थियों पर लाठियां भांजने और तोडफ़ोड़ करने वाले पुलिस वालों तक!
छपाक बड़े बजट की फिल्म नहीं है। लागत निकाल रही है, कमा भी लेगी ही। लेकिन यह ना तो किसी तरह की कलात्मक, वैचारिक प्रतिबद्धता से तैयार फिल्म है,ना ही यह ऐसी कोई फि़ल्म है जिसके निर्माण के लिए क्राउड फंडिंग यानी जनता के बीच जा कर धन संग्रह किया गया हो। इसमें कॉर्पोरेट पूंजी ही लगी होगी। इस फिल्म में प्रतिबद्धता का अंश पूरी तरफ से कमर्शियल मकसद से ही है। लेकिन इस फिल्म में यथार्थ है। झकझोर देने वाला यथार्थ। ऐसा यथार्थ जिसका सामना करने से समाज घबराता भी है। ऐसा यथार्थ जिसे लेकर समाज से लेकर सत्ता तक संवेदनहीनता ही है। यह यथार्थ है-लड़कियों पर एसिड अटैक। पूंजीवादी समाज जिस तरह के हिंसक मनोविकारों का जन्मदाता है उन्हीं में एक है एसिड अटैक,और छपाक इसी यथार्थ पर बनी फिल्म है। दीपिका पादुकोण ने इसमें प्रभावशाली अभिनय किया है।  लेकिन बात किसी व्यावसायिक फिल्म का पक्ष लेने की नहीं है। बात केवल कला पक्ष की भी नहीं है। बात है रविवार जैसे दिन इस फिल्म को लेकर दर्शक की उदासीनता।
यह उदासीनता यदि फिल्म के विषय को लेकर है तो वो एक अलग तरह की चिंता है। क्या यह माना जाए कि हिंदुस्तानी दर्शक महिलाओं पर होने वाली हिंसा को लेकर उदासीन है? एक दिन हॉल में दर्शक ना होने से ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना बेमानी है।  बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि फिल्म, दर्शक को सिनेमा हॉल तक लाने में नाकाम रही। तो फिर दीपिका यह खतरा क्यों मोल लेती हैं कि वो आज के भारत में दक्षिण पंथी ताकत को जानते बूझते जेएनयू के साथ एकजुटता दिखाने जा पहुंचीं? इसे दीपिका की इस ताज़ा फिल्म में उनके किरदार से शायद समझा जा सकता है। फिल्म में वो लड़ती हैं और शायद उसी प्रभाव ने उन्हें असल में भी लड़ाई के साथ खड़े होने को प्रेरित किया हो। और ये लड़ाई है विद्यार्थियों की। आज़ादी के संघर्ष से लेकर आज़ाद भारत तक में विद्यार्थी आंदोलनों ने इतिहास रचा है। 
आज भी देश के अनेक हिस्से ऐसे ही युवा आंदोलन का गवाह बने हैं। स्वरा भास्कर जैसे कलाकार तो अपनी वैचारिक पृष्टभूमि के कारण भी ऐसे आंदोलनों के समर्थक माने जाते हैं , लेकिन दीपिका पादुकोण पूरी तरह से कमर्शियल और ऊंचे पैसों पर काम करने वाली लोकप्रिय फिल्म आर्टिस्ट हैं। 
उनका जेएनयू के साथ खड़ा होना दरअसल जेएनयू या जामिया जैसे आंदोलनों की लोकप्रियता और ताकत को बताता है । जब कोई एक दीपिका ऐसे आंदोलन के साथ खड़ी होती हैं तो एक तरफ उनकी ऐसी प्रतिबद्धता तारीफ पाती है,वैधता पाती है तो दूसरी तरफ उन्हें हमलों का भी सामना करना पड़ता है। जिस दिन दीपिका पादुकोण जेएनयू गईं उस दिन से सोशल मीडिया उन पर स्तरहीन हमलों से भरा हुआ है।
सवाल बस इतना ही है कि एक ज़रूरी मुद्दे पर बनी छपाक कहीं ट्रोल सेना का शिकार तो नहीं बनने जा रही है?
जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक सिंगल स्क्रीन सिनेमा घर में इस फिल्म को देखने जाते हैं तो ट्रोल सेना की करतूत के मुकाबले फिल्म और उसकी नायिका को ताकत ही मिलती है। पर ये सवाल उस आम दर्शक से है जो सिनेमाघर से गायब नजर आया।
यदि आप जेएनयू विरोधियों के अभियान की वजह से इस फिल्म से किनारा कर रहे हैं तो जानिए कि वो आंदोलन इस देश में सस्ती शिक्षा की लड़ाई है। हर तरह के दुष्प्रचार के बावजूद ये आन्दोलन देश के आम इंसान की आवाज़ है। और ऐसे में छपाक देखना उन युवाओं के साथ भी खड़ा होना होगा जो लड़ रहे हैं। ये लड़ाई इंस्टीट्यूशन्स को बचाने की है। चाहे वो जेएनयू हो,चाहे एएमयू, जामिया या हैदरबाद की यूनिवर्सिटी या फिर फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीटूट ऑफ इंडिया से गजेंद्र चौहान जैसे औसत दर्जा के खिलाफ पूर्व में हुई लड़ाई। लेकिन यदि आप इस देश के युवाओं के आक्रोश के साथ हैं तो फिर इस फि़ल्म से किनारा कर आप एक गंभीर मुद्दे के प्रति उदासीन भी कैसे हो सकते हैं?
छत्तीसगढ़ में तो यह फिल्म टैक्स फ्री की गई है। इस फिल्म को देखिए और अपने बेटों को भी दिखाइए और समझाइए कि किसी लडक़ी पर एसिड अटैक या किसी भी तरह की हिंसा पूरे समाज को जख्मी करती है। ये संवेदना का मामला है।
(लेखक पूर्व पत्रकार और वर्तमान में छ.ग. सरकार के मीडिया सलाहकार हैं। कांग्रेस पार्टी के सदस्य भी हैं।)

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