संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 13 जनवरी : विरासत के आभामंडल से  बाहर निकलने का हौसला...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 13 जनवरी : विरासत के आभामंडल से बाहर निकलने का हौसला...
Date : 13-Jan-2020

ब्रिटिश राजघराने के एक राजकुमार, प्रिंस हैरी औरों से काफी अलग हैं। अभी उन्होंने यह घोषणा करके राजघराने को हक्का-बक्का कर दिया कि वे अपने शाही दर्जे को छोड़कर एक आम नागरिक की तरह किसी और देश जाकर बसने वाले हैं। वे इस मायने में भी अलग थे कि उन्होंने अमरीका की एक तलाकशुदा युवती से शादी की थी, और राजमहल में रहते हुए भी वे एक आम किस्म की जिंदगी जीने की कोशिश करते थे, और दुनिया भर मेें कई किस्म के समाजसेवा के कामों से जुड़े हुए भी थे। उनकी मॉडल-अभिनेत्री रह चुकी पत्नी भी आम रहने की कोशिश करती थी, और राजघराने का शाही दर्जा छोड़कर बाहर आम जिंदगी जीने जाना आसान बात नहीं है। 

जिन लोगों को ब्रिटेन की शाही परंपरा का अंदाज नहीं है, उनकी जानकारी के लिए यह लिखना ठीक और जरूरी है कि यह घराना ही ब्रिटेन का संवैधानिक मुखिया है, जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचित राष्ट्रपति होते हैं। भारत ने लोकतंत्र का मॉडल ब्रिटेन से लिया जरूर है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र अधिक लोकतांत्रिक और परिपक्व इस मायने में हैं कि कोई एक घराना इस देश का संवैधानिक प्रमुख नहीं रहता। बल्कि भारत में किसी एक घराने को कोई भी सरकारी या संवैधानिक दर्जा नहीं मिलता। ब्रिटेन का हाल यह है कि वहां राजघराने के भीतर सिंहासन के हकदार पहले से पीढिय़ों की एक व्यवस्था के तहत तय हो जाते हैं, और उनमें ऐसे प्रमुख के जिंदा रहते या सिंहासन पर काबिज रहते उनके नीचे के वारिस अपनी बारी का इंतजार करते जी सकते हैं, और मर सकते हैं। आज वहां की महारानी कई दशकों से राजगद्दी पर बनी हुई है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि पश्चिम के कुछ और देश ऐसे हैं जो कि ब्रिटिश राजघराने को ही अपना संवैधानिक मुखिया बनाकर चलते हैं, और ब्रिटिश महारानी दुनिया के कुछ और देशों में भी संसद को संबोधित करने जाती हैं, और वहां के नोट-सिक्कों पर उन्हीं का चेहरा चलता है। यह गुलामी की एक बड़ी अलग और अजीब सी सोच है जिसे मनोविज्ञान में गुलाम और मालिक के बीच रिश्तों की परिभाषा से बेहतर समझा जा सकता है। अच्छे-भले, पूरी तरह से विकसित देश जिस तरह दूसरे देश की महारानी को अपनी महारानी बनाकर चलते हैं, वह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता में बड़ी अटपटी बात लगती है। 

लेकिन हम आज के मुद्दे पर लौटें, तो जिस तरह प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी खुद होकर शाही दर्जा छोड़कर आम जिंदगी में जाने वाले हैं, उससे हिन्दुस्तान के बहुत से छोटे-छोटे से शाही लोगों को भी कोई प्रेरणा मिलनी चाहिए। लोग अपनी लोकसभा सीट, विधानसभा सीट, या महापौर से लेकर पार्षद तक की सीट नहीं छोड़ पाते, और तब तक उन पर काबिज रहना चाहते हैं, जब तक उनकी अगली पीढ़ी विरासत की दावेदार न बन जाए, और लोग उन सीटों पर पार्टी से अपनी औलादों या पत्नियों के लिए टिकट न जुटा दें। इसी तरह राजनीतिक दलों में संगठन के पदों पर लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक कुनबे के भीतर जिस तरह काबिज होते हैं, वे ब्रिटिश राजघराने से कम नहीं रहते। उनको भी सोचना चाहिए कि क्या उनके भीतर इतनी क्षमता और प्रतिभा है कि क्या वे सार्वजनिक जीवन के पदों को विरासत में पाने के बजाय अपने दम पर कहीं कुछ करके दिखाएं? ब्रिटेन में तो राजघराने के एक वारिस के सिंहासन छोडऩे को लेकर वह घराना भी विचलित है, और कई दूसरे लोग भी। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसे कुनबापरस्त लोगों के सामने इस मिसाल को बार-बार रखना चाहिए जहां पर कि एक मजबूत और परिपक्व निर्वाचित लोकतंत्र के भीतर भी देश के कुछ सौ परिवार आजादी से लेकर अब तक संसद, विधानसभा, और पार्टी संगठनों पर काबिज हैं, और अपने क्षेत्र, अपने संगठन के लोकतांत्रिक विकास की राह में रोड़े बने हुए हैं। ऐसे रोड़ों को यह भी समझना चाहिए कि वे विरासत से बाहर जाकर अपना दमखम बेहतर तरीके से साबित कर सकते हैं। लेकिन अगर ऐसा होता है तो हिन्दुस्तान में अधिकतर राजनीतिक दल एकदम से अनाथ और बेसहारा हो जाएंगे, और उन दलों के भीतर संभावनाओं की एक ऐसी सुनामी आएगी कि अगले कुछ बरस तक वहां लोगों के पांव नहीं टिक पाएंगे, लेकिन आगे जाकर वहां एक मजबूती भी आ सकती है। लोगों के बीच विरासत के आभामंडल से बाहर निकलकर एक इंसान के रूप में जिंदा रहने का हौसला भी रहना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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