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ईरान ने अमरीका को चुनौती देने वाली फौजी ताकत कैसे हासिल की?
ईरान ने अमरीका को चुनौती देने वाली फौजी ताकत कैसे हासिल की?
Date : 14-Jan-2020

अभय शर्मा

इन दिनों अमरीका और ईरान के बीच तनाव अपने चरम पर है। पिछले दिनों अमरीकी सेना ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को बगदाद हवाई अड्डे के बाहर एक रॉकेट हमले में मार दिया। कासिम सुलेमानी ईरान की सेना ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ की ‘कुद्स’ इकाई के प्रमुख थे। रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की इस इकाई पर विदेशों में सैन्य अभियान चलाने की जिम्मेदारी रहती है। इसका बदला लेते हुए ईरान ने भी इराक में अमरीकी बलों की मौजूदगी वाले दो ठिकानों पर 20 से ज्यादा मिसाइलों से हमले किए। ईरान ने अमरीका को चेतावनी देते हुए यह भी कहा है कि अगर उसने आगे कोई कर्रवाई की तो ईरान इजरायल और दुबई को निशाना बनायेगा। ईरान ने बीते साल अगस्त में अमरीका को सीधी चुनौती देते हुए ‘होर्मुज जल संधि’ क्षेत्र में उसका अत्याधुनिक ड्रोन विमान मार गिराया था।

ईरान की इन सैन्य कार्रवाईयों और चेतावनियों के बीच पहला सवाल यह उठता है कि आखिर उसमें अमेरिका जैसी विश्व शक्ति को आंख दिखाने की हिम्मत कैसे आ गई।

ब्रिटिश एजेंसियों की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबंधों के दौरान ईरान ने सबसे ज्यादा प्रगति सैन्य क्षेत्र में ही की है जिसे अमरीका अपने प्रतिबंधों से निष्क्रिय करना चाहता था। रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सबसे ज्यादा जोर सैन्य मजबूती पर ही दिया है। उनकी गंभीरता का पता इस बात से चलता है कि बीते तीन सालों में उन्होंने अपनी सेना इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) को केवल साइबर सुरक्षा के लिए ही करीब 20 मिलियन अमरीकी डॉलर यानी करीब 140 करोड़ रुपए का बजट दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार ईरान हथियार बनाने के मामले में भी काफी आगे निकल चुका है। इराक, सीरिया, लेबनान जैसे देशों के साथ-साथ दुनिया भर के शिया आतंकियों में सबसे ज्यादा बिक्री उसके ही हथियारों की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान ने लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा घरेलू स्तर पर पनडुब्बियों, हमला करने वाली नौकाओं, बड़े युद्धक टैंकों और मानवरहित वायुयानों का सफलतापूर्वक निर्माण और परीक्षण किया है।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी सेना आईआरजीसी की सैन्य ताकत अब एक अलग स्तर की हो गई है जिसका मुकाबला करना मध्य-पूर्व में अब किसी देश के लिए आसान नहीं होगा। यहां तक कि पिछले सालों में उसके सैन्य सलाहकारों, विशेषज्ञों और प्रशिक्षण पेशेवरों ने सीमा पार जाकर इराक, सीरिया की सेनाओं और शिया लड़ाकों की भी काफी मदद की है।

ईरान की ताकत को देखते हुए अगला सवाल यह उठता है कि ऐसा कैसे हुआ कि दुनिया भर के प्रतिबंधों को लंबे समय से झेल रहे इस देश ने इस दौरान सैन्य शक्ति का इतना विस्तार कर लिया और वह मध्यपूर्व के शिया मुल्कों में अपना प्रभाव बढ़ाने में कामयाब हुआ।

वैसे तो अमरीका से बड़ा ईरान का कोई दूसरा दुश्मन नहीं माना जाता। लेकिन, ईरान की ताकत बढऩे में प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ही सबसे बड़ा मददगार साबित हुआ है। जानकारों के मुताबिक जब 2003 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने इराक में सद्दाम हुसैन को उखाड़ फेंकने का निर्णय लिया तो यह सबसे ज्यादा ईरान को ख़ुशी देने वाला था। अमेरिका ने सद्दाम को खत्म कर ईरान के सबसे बड़े खतरे को खत्म कर दिया था।

अमरीका ने ईरान को दूसरा बड़ा फायदा अफगानिस्तान में हमला करके पहुंचाया। उसने अफगानिस्तान में उस तालिबान के साम्राज्य का अंत किया जो ईरान के कट्टर विरोधी मुल्क सऊदी अरब का साथी था। यानी अमरीका के दो निर्णयों से शिया बहुल ईरान की दो परेशानियां उसके बिना कुछ किए ही खत्म हो गईं। अब उसकी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं से उठने वाला खतरा काफी हद तक समाप्त हो गया था।

जानकार कहते हैं कि इससे ईरान को एक फायदा यह भी हुआ कि उसे अहसास हो गया कि अमरीकी प्रशासन अफगानिस्तान और इराक की तरह कभी भी उसे भी निशाना बना सकता है। इनके मुताबिक इन घटनाओं ने ही उसे अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।

ईरान की नीतियों पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि ईरान ने अपनी शक्ति का विस्तार एक योजना के तहत किया जिसका एक प्रमुख उद्देश्य दुनिया भर के शिया समुदाय को एकजुट करना भी है। ये लोग इसके पीछे का एक प्रमुख कारण 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध को मानते हैं। इसमें ईरान एकदम अकेला पड़ गया था क्योंकि खाड़ी देशों और अमरीका ने इराक के सुन्नी शासक सद्दाम हुसैन की मदद की थी। ईरान को इस युद्ध में भारी नुकसान हुआ था।

जानकार कहते हैं कि इस युद्ध के बाद ईरान को समझ आया कि उसे शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ शियाओं को एकजुट करना भी जरूरी है। इसके बाद से वह ईरानी सीमा के बाहर शिया बहुल क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ाने में लग गया। सद्दाम हुसैन के जाने के बाद उसने इराकी शिया नेताओं के साथ मजबूत राजनीतिक, आर्थिक और सांप्रदायिक संबंध बनाए। ऐसा करके उसने न केवल इराक से उठने वाले खतरे को खत्म किया बल्कि इराक के शियाओं को अपने पक्ष में ले लिया।

इराक में 2010 और फिर 2018 में हुए चुनाव में ईरान समर्थित शिया राजनीतिक दलों की जीत हुई। इन चुनावी जीतों को ईरान की बड़ी सफलता माना गया क्योंकि उसने चुनाव के दौरान शिया राजनीतिक दलों की हर तरह से मदद की थी। और सुन्नियों को इराक की सत्ता से कोसों दूर कर दिया था।

जानकार कहते हैं कि जब सीरिया में गृहयुद्ध शुरू हुआ तो यह ईरान के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया। तेहरान ने इस युद्ध में अपने एकमात्र अरब रणनीतिक साझेदार शिया राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन किया। उसने इस दौरान लेबनान के अपने पारंपरिक सहयोगी हिजबुल्लाह को सैन्य मदद भी मोहैय्या करायी जो सीरिया में असद सरकार के समर्थन में लड़ रहा था। इसी समय सुन्नी आतंकी समूह आईएस का उदय हुआ जिसने मध्यपूर्व में ईरान को शियाओं के सबसे बड़े रक्षक के रूप में खड़ा कर दिया।

पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों की मानें तो ईरान को शिया बहुल देशों से करीबियां बढऩे का कई तरह से फायदा हुआ है। इनके मुताबिक ईरान ने सीरिया और लेबनान में बड़े स्तर पर बैलिस्टिक मिसाइल और हथियारों के निर्माण का कार्य शुरू कर रखा है जो उसकी सैन्य क्षमता में बढ़ोत्तरी का प्रमुख कारण है।

इसके अलावा सीरिया युद्ध से ईरान को एक और बड़ा फायदा यह मिला कि इस दौरान वह दुनिया की दूसरी विश्व शक्ति रूस के करीब पहुंच गया। इसका कारण दोनों का एक ही पाले में होना था। कहा जाता है कि रूस सीरिया में विद्रोहियों पर जो भी कार्रवाई करता था उसकी रणनीति तेहरान में बनती थी। इस दौरान नवंबर 2015 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने करीब एक दशक के बाद ईरान की यात्रा की। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई ऐतिहासिक समझौते भी हुए।

ईरान की सबसे बड़ी खूबी यह भी बताई जाती है कि वह किसी मौके को झट से लपकना जानता है। 2017-18 में कतर और सऊदी के बीच जारी तनाव में भी उसने ऐसा ही किया। सात देशों द्वारा कतर से संबंध तोड़े जाने के बाद से ईरान ने उसकी हरसंभव मदद की और उससे भी अपने संबंध और बेहतर बना लिए। (सत्याग्रह)

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