संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 फरवरी : जनता पर असर रखना जनसुरक्षा पर खतरा?!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 फरवरी : जनता पर असर रखना जनसुरक्षा पर खतरा?!
Date : 10-Feb-2020

जनता पर असर रखना
जनसुरक्षा पर खतरा?!

कश्मीर में दो भूतपूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की छह महीने की हिरासत खत्म होने के कुछ घंटे पहले इन दोनों पर जनसुरक्षा कानून लगाकर उन्हें अगले छह महीने बंद रखने का इंतजाम कर दिया गया। इस बारे में सरकारी कागजात के हवाले से कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला का राज्य की जनता पर बड़ा असर है और वे अलगाववादियों द्वारा दिए गए चुनाव-बहिष्कार के फतवों के बीच भी वोटरों को मतदान केन्द्र तक लाने में कामयाब रहे। दूसरी तरफ महबूबा मुफ्ती को अलगाववादियों का समर्थक लिखा गया है। जिस कश्मीर में अपनी फौलादी पकड़ के बीच केन्द्र सरकार हालात सामान्य होने के दावे करती आ रही है, उस कश्मीर में कल की यह कार्रवाई सरकारी दावे को कमजोर या खोखला साबित करती है। उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्ला, दोनों भूतपूर्व मुख्यमंत्री, एक वक्त भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के साथ रह चुके हैं। 

दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती दोनों ही एनडीए के साथ रह चुके हैं। अभी राष्ट्रपति शासन के पहले तक भाजपा महबूबा के साथ राज्य की गठबंधन सरकार में थी। अब भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के राष्ट्रपति शासन को महबूबा की पार्टी का झंडा हरा होना भी उनके खिलाफ कार्रवाई की एक वजह बताई गई है। इस पर महबूबा की बेटी ने लिखा है कि 2014 में गठबंधन सरकार बनाते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महबूबा की तारीफ की थी। और हरा झंडा तो उस वक्त भी था। उन्होंने यह भी सवाल किया है कि एनडीए की भागीदार नीतीश कुमार की जेडीयू का झंडा भी हरा है। भारतीय फौज की पार्टी भी हरी है। 

कश्मीर प्रशासन की कार्रवाई बदनीयत भी है, अधकचरी भी है और सबसे ऊपर वह बुरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। जम्मू-कश्मीर के इस तरह टुकड़े कर दिए गए कि उसमें स्थानीय जनता की कोई राय ही नहीं ली गई, और उसके निर्वाचित नेताओं को ऐसे खोखले और मजाकिया आरोपों पर लगातार हिरासत में रखकर कश्मीर के सामान्य होने का दावा किया जा रहा है। एक निलंबित और स्थगित लोकतंत्र लोकतंत्र नहीं होता। केन्द्र सरकार कश्मीर में जनप्रतिक्रिया, जनभावना को कानून की ताकत से अंतहीन दबाते चल रही है, और इसी के लिए राज्य के लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले नेताओं को अंतहीन हिरासत में रखा जा रहा है। सरकारी कार्रवाई के लिए दिए गए तर्क और उसकी भाषा लोकतंत्र की भावना को खारिज करने वाले हैं। किसी नेता की लोकप्रियता को जनसुरक्षा के लिए खतरा कहा जा सकता है? कश्मीर प्रशासन के पास केस तैयार करने के लिए पूरे छह महीने थे लेकिन उसने एक अलोकतांत्रिक और मखौल सरीखा दस्तावेज तैयार किया है। आने वाले दिन अदालत में इस पर बहस के होंगे।
-सुनील कुमार

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