संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 फरवरी : कारों को सड़क चाहिए तो बस-मेट्रो को सस्ता करने के लिए टैक्स दें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 11 फरवरी : कारों को सड़क चाहिए तो बस-मेट्रो को सस्ता करने के लिए टैक्स दें
Date : 11-Feb-2020

कारों को सड़क चाहिए
तो बस-मेट्रो को सस्ता
करने के लिए टैक्स दें

देश की सबसे बड़ी पर्यावरण संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड एनवायरमेंट, सीएसई, के एक कार्यक्रम में अभी एक विशेषज्ञ ने आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह पेश किया कि आने वाले बरसों में हिंदुस्तान में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल घटने वाला है और अधिक से अधिक लोग निजी गाडिय़ों से चलेंगे। अब इसके लिए शहरों में सड़कें कहां से आएंगी? लेकिन इसके पीछे की वजह अधिक फिक्र की है। देश के महानगरों में मजदूर तबके के लोगों की कमाई का पन्द्रह फीसदी तक हिस्सा पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर खर्च हो जाता है। दिल्ली के एक अध्ययन का नतीजा यह है कि कम दूरी पर जाने वाले बहुत से मजदूरों और दूसरे लोगों को बस-मेट्रो के मुकाबले निजी वाहन सस्ते पड़ते हैं। यह दिल्ली आज सड़कों पर थमी हुई गाडिय़ों से भरी दिखती है, कब, कहां पता नहीं कितना जाम लग जाए? 

लेकिन महंगी टिकटों के साथ भी शहरों के पब्लिक ट्रांसपोर्ट फायदे में नहीं चलते। तो आखिर रास्ता क्या निकले? एक रास्ता यह सुझाया गया है कि सड़कों पर कारों को जगह लगती है, इसलिए कार वालों पर टैक्स लगातार निजी गाडिय़ों को बढऩे से रोका जाए और इस टैक्स से बस-मेट्रो को शुरू किया जाए। अधिक लोग बसों से चलेंगे तो कार वालों को सड़क पर जाम कम मिलेगा। यह राय तर्कसंगत है लेकिन इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों में एक हौसले की जरूरत पड़ेगी। कार वालों पर और टैक्स कैसे लगाया जाए? बस-मेट्रो को और घाटे में कैसे चलाया जाए? जहां मंत्रियों और अफसरों की समझ सालाना बजट को पार नहीं कर पाती वह शहर की पांच-दस बरस की कैसे सोच पाएगी? फिर यह भी है कि औसत राज्य सरकारों में पांच बरस के अपने कार्यकाल के बाद का कहां से सोचेंगी? शहरी विकास और पर्यावरण के दूर के फैसलों पर आज पूंजी निवेश क्यों किया जाए?

कुल मिलाकर तस्वीर भयानक है, हिंदुस्तान के सभी शहरों में बस-ट्रेन बहुत से लोगों को निजी गाडिय़ों से महंगे पड़ रहे हैं। अधिकतर शहरों में बस-मेट्रो का ढांचा अधूरा है और लोगों को आखिरी मील सफर का कोई दूसरी तरीका निकालना ही पड़ता है। ऐसे में भी लोग निजी दुपहियों, निजी चौपहियों पर निर्भर होने को मजबूर होते हैं। आज तो अधिकतर शहर बहुमंजिला पार्किंग बना-बनाकर अधिक से अधिक कारों की संभावना बढ़ाते चल रहे हैं। यह संभावना नहीं आशंका है। शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट के विशेषज्ञों का मानना है कि पार्किंग की फीस इतनी बढ़ानी चाहिए कि लोग निजी गाड़ी के बजाय बस-मेट्रो पर निर्भर करें। लेकिन ऐसा फैसला भी वोट-केन्द्रित सरकारों को अलोकप्रिय लगेंगे और उनका हौसला नहीं होगा। 

हिंदुस्तान जैसे देश के मौजूदा अव्यवस्थित शहरों के लिए शहरी विकास और विस्तार की नई सोच आसान नहीं है लेकिन रियायती पब्लिक ट्रांसपोर्ट किसी भी शहर के लिए दस-बीस बरस बाद के हिसाब से एक समझदारी का पूंजी निवेश होगा। अमीरों की गाडिय़ों के खाली सड़कें मिलेंगी, उनका वक्त और पेट्रोल बचेगा, और गरीबों को दूर तक जाकर भी मजदूरी, काम करने का मौका मिलेगा। इस चर्चा के बीच दिल्ली की केजरीवाल सरकार के इस फैसले को अनदेखा नहीं करना चाहिए जिसमें उसने महिलाओं के लिए सारा सफर मुफ्त कर दिया है। इससे भी निजी गाडिय़ां कम होंगी और साथ-साथ महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, बढ़ चुकी है। बाकी प्रदेशों को भी शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट बहुत अधिक सस्ता करना ही चाहिए, सुलभ भी। 
-सुनील कुमार

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