संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 फरवरी :  शानदार केजरीवाल, लेकिन यह कोई राष्ट्रीय विकल्प नहीं...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 फरवरी : शानदार केजरीवाल, लेकिन यह कोई राष्ट्रीय विकल्प नहीं...
Date : 12-Feb-2020

शानदार केजरीवाल,
लेकिन यह कोई
राष्ट्रीय विकल्प नहीं...

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस बार मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का मुकाबला छठवें बरस के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और भाजपा के इतिहास के सबसे ताकतवर नेता अमित शाह से था। मैदान में कहीं भी कांग्रेस पार्टी नहीं थी, और न ही भाजपा थी। एक तरफ केजरीवाल और उनके मुद्दे, और दूसरी तरफ मोदी-शाह, और उनके मुद्दे। नतीजा लोगों के सामने है और सिर चढ़कर बोलता हुआ सा नतीजा है। अब यह कैसे हुआ, क्यों हुआ, जितने मुंह उतनी बातें। पर यह समझना भी जरूरी है कि शानदार स्कूल, शानदार इलाज, बेहतर सरकार, मुफ्त और रियायती बिजली-पानी को भयानक आक्रामक राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण, देश से गद्दारी की तोहमतें, नफरत, और मोदी को एक बार और जिताने के नारे मिलकर भी क्यों नहीं हरा पाए?

यह समझना आसान भी है और मुश्किल भी। केजरीवाल ने भाजपा के तमाम धारदार हथियारों का सामना करने से भी इंकार कर दिया था। वे दिल्ली में रहते हुए भी न जेएनयू के साथ थे, न जामिया के साथ थे, न शाहीन बाग के साथ थे। जब देश भर के भाजपा विरोधी दिल्ली पहुंचकर इन मुद्दों का साथ दे रहे थे, तब केजरीवाल इनसे परे बैठे हुए थे। नतीजा यह हुआ कि अरबन नक्सल, आतंकवादी, देश के गद्दार, बिरयानी परोसने वाले, जैसे कोई भी लेबल उन पर चिपक नहीं पाए। देश की सामाजिक बेचैनी से करवट बदल रहे माहौल से केजरीवाल अछूते रहे और वे दिल्ली के महज म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह काम करते रहे, ईमानदार, काबिल, मेहनतकश, और कल्पनाशील म्युनिसिपल कमिश्नर की तरह। इसलिए यह एक राजनीतिक पार्टी की दूसरी राजनीतिक पार्टी पर जीत नहीं रही, यह जनकल्याणकारी सुशासन की नफरत पर जीत रही। इस जीत में आसान बात यह रही कि केन्द्र सरकार की अगुवाई में भाजपा ने नफरत के अपने निशाने एक-एक करके इतने बढ़ा लिए थे, कि वोटरों के बड़े तबके उसके खिलाफ गए। अब इस बारे में इतना अधिक लिखा जा चुका है कि जीत-हार के बाकी पहलुओं के बारे में भी सोच लिया जाना चाहिए।

केजरीवाल सरकार ने मेहनत करके जिस तरह दिल्ली की सरकारी स्कूलों को देश में सबसे अच्छा बनाया, जिस तरह उन्होंने केन्द्रीय बोर्ड के इम्तिहानों में इन स्कूलों को सबसे काबिल साबित किया, जिस तरह इस सरकार ने मुफ्त और रियायती, सस्ते बिजली-पानी का इंतजाम किया, प्रदूषण से लड़ाई लड़ी, उसे भी दिल्ली के लोगों ने देखा। इसके बाद केजरीवाल का आखिरी मास्टरस्ट्रोक था पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं के लिए मुफ्त सफर। दिल्ली की आधी वोटरों में से शायद नब्बे फीसदी की जिंदगी में इससे बड़ी राहत मिली। उन महिलाओं को भी जो शाहीनबाग में धरने पर बैठी हैं, और उन महिलाओं को भी जो बजरंग बली के मंदिर जाने के लिए मेट्रो का सफर करती हैं। ऐसा लगता है कि दिल्ली मेट्रो के किनारे खड़े बजरंग बली की आसमान छूती प्रतिमा को भी मेट्रो में मुफ्त चलती महिलाओं की राहत दिखी होगी और उन्होंने केजरीवाल को आशीर्वाद दिया। 

दूसरे राजनीतिक विश्लेषकों की जरूरी कुछ बातें भी गौर करनी चाहिए। केजरीवाल ने सीधे मोदी पर हमला नहीं किया और इस तरह मोदी प्रशंसकों की नाराजगी से बचे। दिल्ली में लोगों ने केजरीवाल को शहर चलाने फिर चुना है, लेकिन आज ही लोकसभा चुनाव हो जाए तो लोग फिर मोदी को चुनेंगे। कांग्रेस ने सोच-समझकर वोटों की कोशिश नहीं की, और भाजपा को हराने का पूरा मौका अकेले केजरीवाल को दिया। ऐसी कई बातें राजनीतिक विश्लेषकों ने लिखी है जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए। यह बात तो तकरीबन सभी ने लिखी है कि दिल्ली में विकास जीत गया और नफरत हार गई?

लेकिन आगे क्या? यह समझने की जरूरत है कि दिल्ली एक सीमित राज्य है, पूर्ण राज्य नहीं। और केजरीवाल पर न जमीन का जिम्मा है, न पुलिस का जिम्मा है, न अधिकार। ऐसे में देश के जलते-सुलगते मुद्दों से परे रहकर वे सिर्फ शहरी सरकार के सफल प्रशासक रहे हैं, और यह प्रयोग, इसकी कामयाबी दिल्ली से शुरू होकर दिल्ली के साथ ही खत्म हो जाते हैं। केजरीवाल-प्रयोग की दिल्ली से बाहर आज कोई संभावना नहीं दिखती। जो लोग केजरीवाल की शक्ल में देश में एक वैकल्पिक राजनीति देख रहे हैं, वे लोग कांच के मछलीघर में एक मछली की सफलता का समंदर तक विस्तार देख रहे हैं। केजरीवाल अगले संसदीय चुनाव में किसी मोदी-विरोधी गठबंधन का एक हिस्सा हो सकते हैं क्योंकि दिल्ली में सात लोकसभा सीटें हैं, आसपास के कुछ राज्यों में उनके कुछ वोट है, वे देश का एक सबसे चर्चित चेहरा हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय स्तर पर एक वैकल्पिक राजनीति नहीं दे रहे क्योंकि वे एक पूरी सरकार नहीं चला रहे थे। यह जरूर है कि केजरीवाल ने सरकार के जरूरी मुद्दों में ईमानदारी, जनकल्याण, विकास, कल्पनाशीलता, जवाबदेही को अनिवार्य साबित किया है जिन्हें नई सरकारें अवांछित बातें मानती हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि योगी आदित्यनाथ दिल्ली से कुछ सीखकर गए होंगे। बाकी फिर...।
-सुनील कुमार

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