संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 19 फरवरी :  जजों की पांच-पांच बरस से  खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं  सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 19 फरवरी : जजों की पांच-पांच बरस से खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट!
Date : 19-Feb-2020

जजों की पांच-पांच बरस से 
खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं 
सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट!

हिन्दुस्तान के किसी भी मामूली खाते-पीते आम घर में रसोई का सामान खत्म होने के हफ्ता-दस दिन पहले सामान लाकर रख दिया जाता है। उस घर को बहुत ही बुरे इंतजाम का शिकार माना जाता है जहां शक्कर, नमक, चायपत्ती, अदरक जैसे सामान खत्म हो जाते हों। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर भारत सरकार का वकील अदालत को कहता है कि देश की अदालतों में सैकड़ों पद इसलिए खाली पड़े हैं कि अदालतें समय पर भावी जजों के नाम केन्द्र सरकार को नहीं सुझाती हैं। अदालतों के खाली पदों को लेकर चल रही एक बहस में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि उच्च न्यायालयों में जजों के 36 फीसदी पद खाली होने के लिए न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। उन्होंने गिनाया कि अभी उच्च न्यायालयों के 396 खाली पदों में से 199 के लिए केन्द्र सरकार को कोई नाम भेजे ही नहीं गए हैं। उन्होंने कहा कि कई मामले तो ऐसे हैं जिनमें हाईकोर्ट कॉलेजियम पद खाली होने के पांच बरस बाद भी उसके लिए नाम नहीं सुझा रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में अदालत के चक्कर में फंसने वाले लोगों की लोकतंत्र और न्यायपालिका पर आस्था पूरी ही खत्म हो जाती है। कई मामलों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े रहते हैं, कई मामलों में फैसला सामने आने तक दोनों ही पार्टियां कंगाल हो जाती हैं, और हिन्दी के एक मशहूर उपन्यास में वर्णन के मुताबिक, जीतने वाले से अदालत के बाबू उसकी लंगोट भी उतरवा लेते हैं। ऐसे में जो एक सबसे बड़ी वजह इंसाफ में लेट-लतीफी की है, वह जजों की खाली कुर्सियां हैं। एक तिहाई से अधिक कुर्सियां खाली हैं, तो जाहिर तौर पर हर मामला एक तिहाई अधिक वक्त लंबा खिंच ही जाएगा। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति में सरकार को औसतन 127 दिन लगे हैं क्योंकि उसे प्रस्तावित नामों के बारे में खुफिया रिपोर्ट भी बुलानी पड़ती है। लेकिन दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कॉलेजिमय में ही नाम बढ़ाने में 119 दिन लगाए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मिलाकर 18 दिनों में ही फाईल क्लीयर कर दी। उन्होंने अदालती बहस के दौरान यह सुझाया कि चूंकि जज नियुक्त करने में अदालत और सरकार-राष्ट्रपति को एक साल लग जाता है, इसलिए जज रिटायर होने के एक साल पहले से नए जज के लिए नाम तय कर लिए जाने चाहिए ताकि कुर्सी खाली न रहे। पटना और राजस्थान हाईकोर्ट में तो जजों की 50 फीसदी से अधिक कुर्सियां खाली हैं। 

अब देश भर में इतनी सारी लॉ यूनिवर्सिटी खुली हुई हैं, अदालतों में लाखों वकील प्रैक्टिस कर रहे हैं, निचली अदालतों में दसियों हजार, या लाखों जज काम करते हैं, ऐसे में हाईकोर्ट जज बनाने के लिए लोगों के नाम की कमी तो होनी नहीं चाहिए। कुर्सियां खाली रहें, और मामलों के ढेर शहरी कचरे के ढेरों से ऊंचाई का मुकाबला करते रहें, तो लोकतंत्र तो गटर में ही चले गया मान लेना चाहिए। जब गरीब और बेबस लोग इंसाफ की उम्मीद में अदालती फैसला पाने के लिए पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और उसके बाद भी जरूरी नहीं है कि उन्हें इंसाफ मिले, हो सकता है कि उन्हें सिर्फ फैसला मिले, तो वैसे में रसोई के नमक-शक्कर की तरह अदालतों में जजों का इंतजाम समय रहते क्यों नहीं किया जा सकता? यह सिलसिला बहुत ही निराश करने वाला है। जो अदालत देश के हर व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाती है, उसके खुद के घर का हाल गड़बड़ है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज समय रहते अदालती रसोई के लिए अदरक-चायपत्ती का इंतजाम नहीं करते तो यह छोटी बात नहीं है। 

जून 2019 में केन्द्रीय कानून मंत्री ने संसद को बताया था कि देश के 25 हाईकोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 8 लाख से अधिक एक दशक से अधिक पुराने हैं। उस दिन सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ लाख से अधिक मामले चल रहे थे। इसके एक बरस पहले का एक और आंकड़ा है, जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि भारतीय अदालतों में तीन करोड़ तीस लाख मामले लंबित हैं। इनमें 16.58 लाख मामले अकेले बिहार में लंबित थे, जहां के हाईकोर्ट में जजों की आधी कुर्सियां खाली पड़ी हैं।

एक तरफ तो देश में आए दिन अलग-अलग किस्म के जुर्म के लिए अलग-अलग फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने की बात होती है, पूरे देश में चुनाव याचिकाओं की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनी हुई हैं ताकि सांसद या विधायक का कार्यकाल खत्म हो जाने के पहले उनकी पात्रता-अपात्रता पर फैसला हो सके। अदालतों के बड़े-बड़े जज अपने बीच के वकीलों या छोटे जजों के नामों में से अगर हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के लिए नाम तय नहीं कर सकते, तो यह हैरान करने वाली तकलीफदेह बात इसलिए भी है कि कुर्सी खाली होने के पहले ही उस कुर्सी के काबिल दावेदार-हकदार सामने रहते हैं, और जिस तरह लोक अदालतें लगाकर मामलों का बोझ खत्म करने की कोशिश होती है, अदालतों को अपने कॉलेजियम को भी लोक अदालत की तरह बिठाना चाहिए, हर खाली कुर्सी को भरने का काम भी करना चाहिए। कायदे की बात तो यह होगी कि किसी जज के रिटायर होने के पहले ही उसकी जगह नियुक्त होने वाले वकील और छोटे जज छांट लिए जाने चाहिए जिन्हें यह पता हो कि किस तारीख से उन्हें कहां काम सम्हालना है। हम जजों के नाम छांटकर सरकार को सुझाने की हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की प्रक्रिया को कम नहीं आंक रहे, उसका अतिसरलीकरण नहीं कर रहे, लेकिन उसे वक्त पर करने की जरूरत जरूर बता रहे हैं। आज हिन्दुस्तानी अदालतें जब अपनी खुद की खाली कुर्सियों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे, वे किसी दूसरे के साथ क्या इंसाफ करेंगी?
-सुनील कुमार

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