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कमल नयन से शक्ति की राम-मंदिर पूजा
कमल नयन से शक्ति की राम-मंदिर पूजा
Date : 22-Feb-2020

प्रकाश दुबे

विश्व हिंदू परिषद में नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चा खोलने वाले डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की नकेल कसने के लिए वर्ष 1914 में  विष्णु सदाशिव कोकजे को पहले उपाध्यक्ष बनाया। बाद में तोगडिय़ा केा बकायदा चुनाव में पराजित कर कोकजे अध्यक्ष बने। विहिप का प्रतिनिधित्व चंपत राय करेंगे। 
पांच फरवरी को रामजन्म भूमि तीर्थक्षेत्र न्यास की घोषणा के साथ ही कुछ साधु-संत दुर्वासा की तरह शाप देने के लिए उद्धत थे। वे मुदित होंगे। न्यास की घोषणा के अगले सप्ताह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और प्रदेश के वित्तमंत्री सतीश महाना ने प्रयाग जाकर वासुदेवानंद के दर्शन किए। पुष्पहारों से स्वागत किया। मंदिर निर्माण की योजना पर एकांत में चर्चा की। महंत वासुदेवानंद ने अयोध्या जाकर दो अन्य न्यासियों (अवध प्रांत के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख होम्योपैथ अनिल मिश्र और विमलेन्द्र मोहन मिश्र) से चर्चा की। मंदिर आंदोलन की कमान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हाथ में रही। 
पहली कतार में  साधु-संतों के साथ ही संघ का अनुषंगी संगठन विश्व हिंदू परिषद नजऱ आया। विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय ने 12 जनवरी को प्रस्तावित मंदिर के माडल का अनावरण किया था। घोषणा कर दी थी कि यही माडल अयोध्या में मूर्त रूप लेगा। न्यास में पांच प्रमुख शक्तियां सर्वोपरि हैं। विमलेंदु मोहन को अयोध्या का राजा कहा जाता है। अयोध्यावासियों के पप्पू भैया। अयोध्या मंडल के कमिश्नर एम. पी. अग्रवाल ने  विमलेंदु को 67 बिंदु 703 एकड़ जमीन के दस्तावेज सौंपे। साथ ही न्यास के रिसीवर का ओहदा प्रदान कर दिया। 
दूसरा संघ 16 फरवरी को अयोध्या में सरयू नदी के तट पर राम की पैड़ी में संघ की 101 शाखाओं के हजारों स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रदर्शन कर ताकत का अहसास कराया था। तीसरे वासुदेवानंद।  विश्व हिंदू परिषद में नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चा खोलने वाले डॉ. प्रवीण तोगडिय़ा की नकेल कसने के लिए वर्ष 1914 में  विष्णु सदाशिव कोकजे को पहले उपाध्यक्ष बनाया। बाद में तोगडिय़ा केा बकायदा चुनाव में पराजित कर कोकजे अध्यक्ष बने। विहिप का प्रतिनिधित्व चंपत राय करेंगे।  
न्यास की पहली बैठक में नृत्यगोपाल दास अध्यक्ष नियुक्त हुए। मुकदमा जारी होने के कारण प्रधानमंत्री ने महंतजी या राय को न्यासी नहीं बनाया। यह दायित्व न्यासियों पर छोड़ा जिन्होंने महंत नृत्य गोपाल दास को अध्यक्ष और चंपक राय को न्याया नियुक्त किया। मोदी सरकार उच्चतम न्यायालय को सफाई देगी कि हमने किसी ऐसे व्यक्ति को न्याया नहीं बनाया जिस पर मुकदमा चल रहा है। 
  संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने 21 मई 1964 को मुंबई में स्वामी चिन्मयानंद के साथ मिलकर विहिप की स्थापना की। संघ प्रमुख सदैव कहते थे कि विहिप और आरएसएस राजनीतिक संगठन नहीं है। संघ परिवार का इन दिनों इन दिनों संसद और विधानसभाओं जमकर प्रतिनिधित्व है। उस समय अलग माहौल था इसलिए 19 जून 1966 को मुंबई में शिवसेना का जन्म हुआ। 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में बालक माधव का जन्म हुआ था। 19 फरवरी को न्यास की पहली बैठक दिल्ली में आयोजित करना गोलवलकर जी को श्रद्धांजलि देने का निमित्त बना। संघ समर्थित संवाद माध्यम इस संयोग का उल्लेख करने से बचे।   
    निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेन्द्र दास को न्यासी के रूप में मताधिकार से वंचित रखा गया है। अन्य अखाड़ों को न्यास में स्थान न मिलने पर रोष है। रामानंदी संप्रदाय सहित कई वैष्णव संगठन न्यास के गठन से असंतुष्ट हैं। 85 वर्षीय महंत नृत्य गोपालदास वर्ष 2003 से रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष हैं। उनके वारिस महंत कमलनयन दास ने विमलेन्द्र मोहन मिश्र को न्यासी बनाने का विरोध करते हुए कहा-वह राजनीतिक व्यक्ति हैं। विमलेन्द्र कांग्रेस के करीबी थे। बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़े और हारे। 
उन्होंने बीस वर्ष पहले अपनी मां के नाम दर्ज दस एकड़ भूमि विश्व हिंदू परिषद को दान की थी। वहां विहिंप ने कार्यशाला बनाकर मंदिर के लिए पत्थरों की तराश शुरु की थी। विमलेन्द्र राम के वंशज होने के कारण राजा नहीं हैं। उनके पूर्वज को संतानविहीन राजा ने गोद लिया था। 
चर्चा यह भी है कि 1857 की क्रांति में गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़े। युद्ध में पराजित होने के बाद उनकी संपत्ति जब्त हो गई। अयोध्या उनकी रियासत का हिस्सा था।  अंग्रेजों की खिदमत तथा स्वतंत्रता संग्राम का विरोध करने पर अयोध्या विमलेन्द्र के पुरखों को ईनाम में मिला।  राजा कहलाए।
 अंचल के वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह पूरी कहानी सुना सकते हैं।  विमलेन्द्र उर्फ पप्पू भैया के न्यासी पद की पात्रता पर आंच नहीं आती। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने तो विभीषण को लंका का राज ही सौंप दिया था। हिंदू साधु संगठनों में वासुदेवानंद के नाम पर विवाद है।   इलाहाबाद हाइकोर्ट के 22 सितम्बर 2017 के निर्णय में वासुदेवानंद को बद्रिकाश्रम का शंकराचार्य पद से वंचित करते हुए कहा था कि पट्टाभिषेक के समय वे दंडी सन्यासी नहीं थे। चावर, छत्र,  सिंहासन का प्रयोग करने से उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी।  महंत वासुदेवानंद गोरेगांव मुंबई के आसाराम आश्रम के सेवा साधना शिविर सक्रिय रहे हैं।
 द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने तो आरोप लगाया कि उन्होंने अदालत में फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए। साधु-संतों के आपसी विवाद की छाया मंदिर निर्माण पर न पड़े, इसका ध्यान सरकार और न्यासी के रूप में नियुक्त प्रशासनिक अधिकारियों को रखना होगा। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रसिद्ध कविता राम की शक्ति पूजा में प्रसंग है कि 108 कमल की पूजा में एक कमल कम पड़ गया। राम ने अपनी आंख निकालकर चढ़ाने का प्रयास किया। आंख मतलब दृष्टि। मंदिर निर्माण के सकारात्मक पक्षधर निराला के संकेत से सीख पा सकते हैं-रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,  शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन। 
 चार न्यासियों में केन्द्र सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा के सचिव स्तर के अधिकारी को नियुक्त करेगी। उत्तर प्रदेश सरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एक न्यासी का नाम तय करेगी। उनके सिवा अयोध्या का जिला कलेक्टर न्यासी होगा। न्यास के सदस्य अपना सभापति या अध्यक्ष तय करेंगे। 
शर्त यह है कि ये सब हिंदू हों। अध्यक्ष महंत नृन्य गोपाल दास हिंदू हैं। यदि कलेक्टर हिंदू नहीं है तो अतिरिक्त कलेक्टर पदेन न्यासी होगा। विश्व हिंदू परिषद का गठन करने के बाद सरसंघाचालक गुरु गोलवलकर ने कहा था-हिंदू हिंदुस्तानियों के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द है। यह धर्मों से ऊपर है। उनके कथन को आज भी संघ दोहराता है। संविधान में धर्म के आधर पर प्रतिनिधित्व का उल्लेख नहीं है।
 मुंबई के सिद्धि विनायक में बरसों पहले महाराष्ट्र सरकार ने मुसलमान को ट्रस्टी नियुक्त किया। बवाल मचा। शिवसेना के तत्कालीन प्रमुख बाल ठाकरे ने निर्णय का स्वागत किया।  सरकार की  हिंदू की परिभाषा अलग होगी। वरना हिंदू धर्म की अनिवार्यता की शर्त रखने की आवश्यकता ही नहीं थी। उम्मीद करें कि विवाद सुलझेंगे। मिलजुलकर निर्माण की ओर पहलकदमी होगी। 
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 

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