विचार / लेख

बहाना न बनाएं कि दिल्ली पुलिस...
बहाना न बनाएं कि दिल्ली पुलिस...
Date : 26-Feb-2020

पुष्यमित्र
दिल्ली पर कुछ लिखना चाहता हूँ, इस डर से नहीं लिखता कि अपने ही उन मित्रों की नफरत की खुराक नहीं बन जाऊं, जो पिछले तीन दिनों से लगातार इस कोशिश में हैं कि दंगा ठीक से भडक़ जाए, खूब मारकाट हो और फैसला हो जाए। कुछ मित्र लोगों को हथियार खरीदने के लिए उकसा रहे हैं तो कुछ मित्र उन लोगों को कायर कह रहे हैं जो घर में बैठे हैं। बाहर निकल कर खून खराबा नहीं कर रहे। ऐसे ज्यादातर मित्र दिल्ली से बाहर के हैं, सेफ पैसेज में बैठ कर इस तरह आग लगाने वाले पोस्ट लिख रहे हैं। 
उन्होंने मौतों को, विरोधी पक्ष के बीच फंसे लोगों के चेहरे पर उभर आए भय को, आगजनी, पत्थरबाजी और तनाव को देखा, समझा महसूस नहीं किया होगा। उनके लिए यह दंगा, यह नफरत, टीवी के किसी शो की तरह है, वे बाहर बैठे कर अपने पक्ष के दंगाईयों को चीयर अप और दूसरे पक्ष को हूट कर सकते हैं। सब फेसबुक पर खुले आम हो रहा है। अफसोस कि इस वक्त फेसबुक की कोई टीम इन पोस्टों की स्क्रीनिंग तक नहीं कर रही। पुलिस की साइबर सेल भी कुछ होती है, पता नहीं है।
मगर उसी वक्त दिल्ली से कुछ ऐसी कहानियां भी आ रही हैं, जो ताकत देती हैं। एक पड़ोसी जब दूसरे पड़ोसी को मुसीबत से बचाता है, संकट में शरण देता है। हत्या के भय से उबारता है। जब मोहल्ला खुद शांति मार्च निकालता है कि वह अपने मोहल्ले को जलने नहीं देगा। तब लगता है कि इतना अंधेरा नहीं, लोग जिंदा हैं, नफरत की फसल बनकर नहीं रह गए।
मेरे हिसाब से तो इस खून-खराबे के दो ही जिम्मेदार हैं, एक तो दिल्ली पुलिस, दूसरा टीवी मीडिया। ये दोनों अगर संवेदनशील होते तो दिल्ली का माहौल कभी खराब नहीं होता।
आप लाख मना करें, जिम्मेदारी केजरीवाल की भी है। एक नेता अपने इलाके को कैसे जलने से बचा सकता है वह नीतीश कुमार से सीखा जा सकता है। नीतीशजी से मेरी खूब असहमतियां रहती हैं। मगर अक्सर उन्हें देखा है बिहार को सांप्रदायिक होने से बचाते हुए, भाजपा के साथ रहने पर भी। कल भी जो किया वह यही काम था। लोग कह रहे हैं, इससे क्या फर्क पड़ेगा। यह केंद्र का विषय है। मेरा उनसे कहना है, अब बिहार एनआरसी-एनपीअआर के नाम पर नहीं जलेगा। यही कल के प्रस्ताव का सबसे बड़ा हासिल है।
मगर केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दिल्ली को जलने से बचाने के लिए क्या किया? जाकर राजघाट पर बैठ गए। क्या गांधी यही करते थे? वे नफरत को कम करने के लिए लगातार लोगों के बीच घूमते थे, उपवास करते थे और लोगों पर दबाव बनाते थे कि वे लिख कर दें, अब ऐसा नहीं करेंगे। डायरेक्ट एक्शन डे के बाद उन्होंने उस सुहारावर्दी को अमन का पैगाम चलाने के लिये मजबूर किया जो डायरेक्ट एक्शन डे का एक बड़ा कसूरवार था। वे सिर्फ प्रार्थना नहीं करते थे, प्रार्थना के साथ एक्शन में भी उतरते थे। दंगाइयों की भीड़ में घुस जाते थे। आप क्या कर रहे हैं।
सॉफ्ट हिंदुत्व और मोदी का लोकल विकल्प, अच्छा हिन्दू दिखने का जो नशा है वह आपको लोगों के दर्द से जुडऩे से रोक रहा है। आपकी रणनीति यही है कि देर सवेर सब ठीक हो जाएगा, लोग भूल जाएंगे। हिंदुओं के वोट नहीं टूटने चाहिये। इससे आप एक दो टर्म अपनी कुर्सी तो बचा लेंगे मगर इतिहास में एक समझौता वादी और कायर नेता के रूप में अपना नाम दर्ज होने से नहीं बचा पाएंगे। 
आपको ध्यान रखना चाहिए, दिल्ली की आधी से अधिक आबादी ने आपको अपना नेता चुना है। इसलिए नहीं कि जब उनका घर जल रहा हो, आप यह बहाना बनाएं कि दिल्ली की पुलिस आपकी नहीं है। आपके नेता अपने फ्लैट से बाहर नहीं निकलें। लोगों को संयम बरतने के लिए भी नहीं कहें। अफसोस।

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