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निर्भया का असली नाम बोलने और लिखने में क्या परेशानी है!
निर्भया का असली नाम बोलने और लिखने में क्या परेशानी है!
Date : 20-Mar-2020

राहुल कोटियाल

निर्भया मामले के दोषियों को फांसी दे दी गई है। चारों दोषियों को ये सजा दिल्ली की तिहाड़ जेल में दी गई। इससे पहले डेथ वारंट जारी होने के बावजूद फांसी दो बार टल गई थी। कल भी दोषियों ने पटियाला हाउस कोर्ट से लेकर ऊपरी अदालतों तक याचिकाएं लगाईं थीं, लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया।

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में एक चलती बस में 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार और बर्बरता की गयी थी। उसी महीने सिंगापुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। दोषियों को फांसी होने के बाद निर्भया की मां आशा देवी ने संतोष जताया है। उन्होंने इसे देश की बेटियों के लिए एक नई सुबह बताया।

निर्भया मामले के अपने न्यायिक अंजाम तक पहुंचने के बाद महिला सुरक्षा से जुड़े जो सवाल उन दिनों सारे देश की सुखिऱ्यों में छाए थे, वही सवाल एक बार फिर से उठने लगे हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर होनी चाहिए। यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि आशा देवी अपनी बेटी का असली नाम सार्वजनिक कर चुकी हैं। ऐसा करते हुए उनका कहना था, ‘मुझे उसका नाम उजागर करने में जऱा भी शर्मिंदगी नहीं है।’

निर्भया का असली नाम उजागर करने की बात करीब आठ साल पहले भी उठी थी। उस वक्त तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने इसकी मांग की थी। उनका कहना था कि बलात्कार से संबंधित जो नए कानून बनाए जा रहे हैं उन्हें इस बहादुर लडक़ी के नाम पर बनाया जाना चाहिए। ज्योति के माता-पिता के साथ ही किरण बेदी और अनुपम खेर जैसे बड़े नामों ने भी तब शशि थरूर के इस बयान का समर्थन किया था।

लेकिन इसके बाद भी निर्भया का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया था। इसलिए उसके साथ हुए अपराध के बाद जो नए कानून बने और बलात्कार पीडि़तों के लिए जो वित्तीय योजना शुरू की गई, उन्हें निर्भया नाम से ही जाना जाता है। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि बलात्कार पीडि़तों का नाम सार्वजनिक करना एक अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 228ए के तहत ऐसा करने वालों को दो साल तक की सजा का प्रावधान है।

2012 में जब नए कानून को निर्भया के असली नाम पर बनाने की मांग हो रही थी तो केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह भी कहा था कि ‘किसी व्यक्ति के नाम पर कानून बनाए जाने का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है।’ लेकिन निर्भया के वास्तविक नाम पर कानून बनाए जाने की मांग कर रहे लोगों का तर्क था कि यह प्रावधान यदि मौजूद नहीं भी है तो आसानी से बनाया जा सकता है। रंगा-बिल्ला मामले के पीडि़त गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के नाम पर बहादुरी पुरस्कार दिया जाता है। इनका उदाहरण देते हुए लोगों ने मांग की थी कि निर्भया के असली नाम पर भी नए कानून बनाए जा सकते हैं।

लेकिन कानून के कई दिग्गजों ने उस वक्त भी इस मांग का समर्थन नहीं किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर का तब कहना था, ‘यह सवाल सिर्फ निर्भया तक ही सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि बलात्कार के मामलों में पीडि़ता की पहचान उजागर करने के क्या प्रभाव हो सकते हैं?  दिल्ली का यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित हो चुका है इसलिए लोगों की सहानुभूति पीडि़त और उसके परिजनों के साथ है। लेकिन बलात्कार के मामलों में आज भी समाज पीडि़त को एक आम नागरिक की तरह नहीं स्वीकार करता। इसलिए उसकी पहचान उजागर करने की प्रथा शुरू नहीं होनी चाहिए।’

बलात्कार पीडि़तों को हमारा समाज कैसे देखता है? यह सवाल ही दरअसल उस प्रावधान को बनाए रखने का मूल कारण है जो बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर करना प्रतिबंधित करता है। इस पर टिप्पणी करते हुए कुछ समय पहले आशा देवी का कहना था, ‘बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने वाले को अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिये। पीडि़त या उनके परिवार शर्मिंदा क्यों हों?’

आशादेवी का यह वाजिब सवाल कई बार उठता रहा है। लेकिन सवाल जितना सीधा है, इसका जवाब उतना ही उलझा हुआ। दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से महिलाओं से जुड़े मामलों पर शोध कर रहीं भूमिका चंदोला बताती हैं, ‘यदि हम ऐसी व्यवस्था बना पाएं जहां बलात्कार से पीडि़त किसी व्यक्ति को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न हो तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।  लेकिन आज की व्यवस्था में यह संभव नहीं है।’ वे आगे कहती हैं, ‘हमारे समाज में आज भी कई जगह पीडि़ता को ही दोषी समझा जाता है। कभी उसके पहनावे पर तो कभी उसके व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। पीडि़तों पर ये भी आरोप लगते हैं कि उन्होंने ही अपराधियों को उकसाया होगा। जहां पीडि़तों को इस नज़रिए से देखा जाता है वहां उनकी पहचान उजागर होना उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा।’

हालांकि ऐसे उदाहरण भी हैं जहां बलात्कार की शिकार हुई लड़कियों ने खुद ही अपनी पहचान उजागर की है। 2012 में हुए कोलकाता के चर्चित ‘पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले’ की पीडि़ता सुजैट जॉर्डन ने ऐसा किया था। लेकिन उनकी राह बिलकुल भी आसान नहीं रही। अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार की सूचना जब उन्होंने पुलिस की दी और यह मामला सुखिऱ्यों में आया तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन पर ही सवाल उठाए। ममता बनर्जी का कहना था कि सुजैट जॉर्डन के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है और वे सिर्फ उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए झूठे आरोप लगा रही हैं। ममता बनर्जी के ऐसे बयान के बाद कुछ लोगों ने सुजैट के घर पर हमला भी किया।

लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद सुजैट ने हिम्मत नहीं हारी और और अपनी लड़ाई पूरी ताकत से लड़ी। अदालत इस मामले के दोषियों को भी सजा सुना चुकी है। मार्च 2015 में सुजैट की एक बीमारी के चलते मौत हो गई लेकिन,आज वे एक ऐसा नाम बन चुकी हैं जो कई बलात्कार पीडि़तों को अपनी लड़ाई लडऩे की हिम्मत देता है। जब भी बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर करने की बात होती है, सुजैट जॉर्डन का जिक्र इसमें जरूर आता है।  महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर काम करने वाले जानकारों का मानना है कि सुजैट जॉर्डन जैसे लोग हमें उस व्यवस्था की तरफ बढ़ाते हैं जहां बलात्कार के पीडि़तों को नहीं बल्कि अपराधियों को शर्मिंदा होना पड़े। लेकिन यह व्यवस्था तभी संभव है जब सुजैट जॉर्डन जैसी हिम्मत और उस जैसा आत्मविश्वास हम अन्य लोगों में भी पैदा कर पाएं।

इन लोगों का यह भी मानना है कि जब तक हम बलात्कार होने पर ‘इज्जत लुट जाना’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते रहेंगे तब तक ऐसा संभव नहीं है। ये सिर्फ शब्द नहीं हैं। हमारा समाज बलात्कार की शिकार हुई किसी लडक़ी और उसके परिवार को सच में ऐसे देखता भी है जैसे अब उनकी इज्जत जा चुकी हो। इसलिए समाज का एक बड़ा वर्ग बलात्कार की घटना होने पर उसे छिपाने की ही कोशिश करता है। वह महसूस करता है कि ऐसा करने से वह अपनी ‘इज्जत’ बचाने की कोशिश कर रहा है। ऐसी व्यवस्थाओं से आगे बढऩे पर ही हम उस व्यवस्था तक पहुंच पाएंगे जहां बलात्कार के पीडि़तों को अपनी पहचान छिपाने और शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं होगी। (सत्याग्रह)

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