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 गेट्स फाउंडेशन: कोरोना के बहाने
गेट्स फाउंडेशन: कोरोना के बहाने
Date : 24-Mar-2020

जे के कर
दुनिया के सबसे अमीरों में शुमार बिल गेट्स ने कोरोना वाइरस से लडऩे के लिए हाल ही में 751 करोड़ रुपया दान किया है। उनका कहना है कि उनका फाउंडेशन याने गेट्स फाउंडेशन दुनियाभर में कोरोना की दवा और टीका विकसित करने वालों के साथ मिलकर काम कर रहा है। उन्होंने कहा है हमारी प्राथमिकता है कि दवा और टीका निर्माण की क्षमता पर्याप्त हो, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों के मददगार साबित हो सके। जाहिरा तौर पर बिल गेट्स को दानवीर कर्ण माना जाता है परन्तु पड़ताल करने पर दूसरी ही बात उभरकर आती है।
सबसे पहली बात बिल गेट्स के दान उनकी ही बनाई गेट्स फाउंडेशन के जरिये दी जाती है। इसलिए गेट्स फाउंडेशन की पड़ताल करते हैं। बिल गेट्स ने दान देकर साल 2000 में इसकी स्थापना की थी। इसके ट्रस्टी तथा सह-चेयरमैन बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स हैं। इनके बाद इस फाउंडेशन के ट्रस्टी दुनिया के एक और रईस वरेन बफेट हैं। गेट्स फाउंडेशन के अध्यक्ष पद पर ट्राईवोर मुंडेल पदस्थ हैं जो साल 2011 में अपनी तैनाती के पहले नोवार्टिस, पार्क डेविस तथा फाइजऱ जैसी महाकाय दवा कंपनियों में उच्च पद पर आसीन थे।
बिल और मेलिंडा गेट्स ने साल 1999 में 750 मिलियन डॉलर का दान देकर ‘गावी’ अर्थात ग्लोबल एलायंस फॉर वैक्सीन इनिशियेटिव नाम के एक संस्था की शुरुआत कराई थी। आज भी गेट्स फाउंडेशन इस ‘गावी’ का पार्टनर है। यह ‘गावी’ दुनिया के गरीब देशों में वैक्सीन की जरूरत को पूरा करने का कार्य करती है। ‘गावी’ में गेट्स फाउंडेशन के अलावा विश्व-बैंक भी साझीदार है। खुद ‘गावी’ का कहना है कि साल 2014 में इस संगठन ने जितने वैक्सीन की सप्लाई की उसमें से 60 फीसदी भारत में सप्लाई किए गए। हालांकि, अपने घोषित तथा अघोषित उद्देश्यों को अमलीजामा पहनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ को भी साझीदार बनाया गया है। इसके बोर्ड में दो-तिहाई सदस्य वैक्सीन एलायंज पार्टनर इंस्टीट्यूट के होते हैं।
नवउदारवाद के युग में इस दानवीर कर्ण का अधिकांश दान नए वैक्सीन के ईजाद में खर्च होता है। बता दें कि इस तरह के नये वैक्सीन का उपयोग भारत और अफ्रीका जैसे देशों विकासशील देशों के सरकार के कंधों पर बंदूक रखकर किया जाता है, पहले दान में वैक्सीन दी जाती है उसके बाद उन वैक्सीन को सरकारी कार्यक्रमों में शामिल करवा दिया जाता है। इन वैक्सीनों की सप्लाई दुनिया की महाकाय वैक्सीन उद्योग के जरिये की जाती है। 
इसका उदाहरण भी हम दे देते हैं। साल 2017 के दिसंबर माह में स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री को चि_ी भेजकर सर्वत्र टीकाकरण कायक्रम में ॥क्कङ्क नाम की इस वैक्सीन को इंट्रोड्यूस करने का विरोध किया गया था। क्योंकि पंजाब के दो जिलों और दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे इंट्रोड्यूस किया गया था।
बता दें कि ॥क्कङ्क वैक्सीन का ट्रायल पहले विवादों में आ चुका था जब आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में टीकाकरण के बाद सात लड़कियों की मौत हो गई थी। स्वास्थ्य पर संसद की 72वीं स्थाई समिति ने इस तथ्य को हाईलाइट किया था।
गौरतलब है कि नवंबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार से इससे जुड़े फाइलों को प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। आंध्रप्रदेश तथा गुजरात के आदिवासी इलाकों के 24 हजार लड़कियों को ‘शड्ढह्यद्गह्म्1ड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ह्यह्लह्वस्र4’ के नाम पर लगाया गया था। इस पुनीत काम को गेट्स फाउंडेशन से फंड लेने वाली संस्था क्क्रञ्ज॥ (क्कह्म्शद्दह्म्ड्डद्वद्वद्ग द्घशह्म् ्रश्चश्चह्म्शश्चह्म्द्बड्डह्लद्ग ञ्जद्गष्द्धठ्ठशद्यशद्द4 द्बठ्ठ ॥द्गड्डद्यह्लद्ध) ने अंजाम दिया था। वैक्सीन की सप्लाई विदेशी दवा कंपनी मर्क तथा ग्लैक्सो ने की थी। क्क्रञ्ज॥ के इस काम में ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ ष्टशह्वठ्ठष्द्बद्य शद्घ रूद्गस्रद्बष्ड्डद्य क्रद्गह्यद्गड्डह्म्ष्द्ध ने भी सहयोग दिया था। इससे हुई लड़कियों की मौत के बाद इसे रोक दिया गया।
बता दें कि भारत में ‘गावी’ के सहयोग से पेंटावेलेंट वैक्सीन, हेपेटाइटिस बी वैक्सीन, हेमोपेलस इंफुलेएंजा की वैक्सीन जैसे वैक्सीन को बढ़ावा दिया गया। दरअसल, भारत का टीकाकरण बाजार लंबे समय से सुप्तावस्था में था। जिसे ‘गावी’ और गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से जगाया गया है। अर्थात नये-नये टीके भारतीयों को ठोंके जा रहे हैं, भले ही भारतीय परिस्थियों के अनुसार ये अनावश्यक हैं।
हेपेटाइटिस-बी का हौव्वा खड़ा कर इसके टीके को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करवा दिया गया। हेपेटाइटिस बी का पीलिया फैलता है संक्रमित रक्तदान, शल्य क्रिया के संक्रमित औजारों या सुई से। कुछ हद तक यौन संबंधों से। चूंकि रक्तदान से पहले उसका परीक्षण कराया जाता है कि उस व्यक्ति को पीलिया, मलेरिया, एड्स या यौन रोग न हो। चिकित्सा तथा शल्यक्रिया के सभी औजारों को उपयोग के पहले संक्रमण रहित बनाया जाता है। वरन् चिकित्सा सेवा में रत चिकित्सकों तथा कर्मचारियों को मरीजों से पीलिया से पीडि़त होने का डर रहता है। इसीलिए हेपाटाइटिस-बी का टीका चिकित्सा कर्मचारियों के लिए जो मरीज के संपर्क में रहते हैं, उसके लिए आवश्यक है।
याद करिए जब दुनियाभर में बर्ड फ्लू का हौव्वा फैलाया गया था। डोनाल्ड रम्सफील्ड जनवरी 2001 से दिसंबर 2006 के बीच अमरीका के रक्षा सचिव थे तथा त्रद्बद्यद्गड्डस्र स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य में उनका काफी धन लगा था। त्रद्बद्यद्गड्डस्र स्ष्द्बद्गठ्ठष्द्गह्य ने बर्डफ्लू की दवा टैमिफ्लू का ईज़ाद किया था एवं इसे रोश नामक महाकाय दवा कंपनी के माध्यम से दुनियाभर में बेचती है। 
रम्सफील्ड अमरीका के रक्षा सचिव रहने के दौरान साल 2005 में दुनियाभर में बर्डफ्लू का हौव्वा फैलाया गया तथा इससे रम्सफील्ड ने अरबों कमाया। जबकि दुनियाभर के वाइरोलाजिस्ट चीख-चीखकर चेता रहे थे कि बर्डफ्लू, बर्डो की बीमारी है मनुष्यों की नहीं। इस कारण से इससे इतना डरने की जरूरत नहीं है। उस समय भारत सरकार ने भी टैमिफ्लू दवा को खरीदकर स्टाक कर लिया था। यह मामला संसद में भी उठा था।
अब सारी दुनिया में बिल गेट्स की वाहवाही हो रही है कि उन्होंने कोरोना वाइरस से लडऩे के लिए सबसे बड़ा निजी दान दिया है। हालांकि, यदि कोरोना वाइरस पर अकेले भारत के कई राज्य अलग-अलग रूप से इससे कई गुना ज्यादा रकम खर्च कर रहें हैं। निश्चित तौर पर मानव समाज कोरोना वाइरस को मात दे देगा लेकिन उसके बाद भी महाकाय दवा कंपनियां इससे अरबों डॉलर कमाती रहेंगी। आखिरकार, यदि लंबे समय तक कमाना है तो उसके लिए टीके का ईज़ाद तो करना ही पड़ेगा। और बिल गेट्स महोदय की गेट्स फाउंडेशन वही पुनीत कार्य ही तो कर रही है।

 

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