संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  20 अप्रैल : बोए पेड़ बबूल के तो  आम कहाँ से होय?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 20 अप्रैल : बोए पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय?
20-Apr-2020

बोए पेड़ बबूल के तो 
आम कहाँ से होय?

महाराष्ट्र में एक गांव में भीड़ ने वहां से गुजरते हुए तीन लोगों को पीट-पीटकर मार डाला। कार से जाते हुए इन लोगों पर पहले पत्थरों से हमला भी किया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि उस इलाके में बाहर से आने वाले लोगों को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही थीं। देश के लॉकडाउन के बीच यह कार वहां पहुँची आगे जाने के लिए, लेकिन बच्चा-चोरों के लेकर किडनी-चोरों तक, कई किस्म की अफवाहें थीं। भीड़ ने तीनों कार सवारों को मार डाला। बाद में सामने आया कि इनमें से दो साधू थे। गांव के 100 से अधिक लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। जाहिर है कि हिन्दुओं में से बहुतों की भावनाएं बहुत आहत भी हुई होंगी। सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े हिंदूवादी नेता देश के बाकी लोगों पर हमला बोल रहे हैं कि जो लोग मुस्लिमों की भीड़-हत्या पर विरोध करते थे वे आज चुप क्यों हैं ? उनका सवाल सही है, और उसका एक बड़ा छोटा सा जवाब भी सही है, कि मुस्लिमों की भीड़त्या के पीछे हिन्दू हमलावर थे, और इस बार हिन्दू साधुओं की भीड़त्या के पीछे हिन्दू ही हैं। अब इसमें किसी साम्प्रदायिक हमले की बात तो है नहीं, इसलिए देश के बाकी लोग इस पर बोलें तो क्या बोलें ? बहुत खराब हिंसा हुई है, पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया है, 114 लोगों को। 

आज दिक्कत यह हो गई कि सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने के 'राष्ट्रधर्मÓ में लगे हुए लाखों लोगों को इस भीड़त्या के साथ पहले के मुस्लिमों की भीड़त्या के नाम गिनाकर एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम नफरत भड़काने का धंधा मिल गया है। हिन्दू धर्म पर इसे हमला बताते हुए पोस्ट करते हुए इसकी तुलना मुस्लिमों की भीड़त्या से इस तरह हो रही है कि मानो इस बार मारने वाले मुस्लिम थे। इस बात को बड़ी धूर्तता से छुपा लिया जा रहा है कि मारने वाले भी हिन्दू थे। असत्य बोले बिना खालिस अर्धसत्य से यह धारणा बनाई जा रही है कि इस बार भीड़ ने हिन्दू साधुओं को मारा तो ये लोग चुप हैं जो कि उस वक्त मुस्मिल की भीड़त्या पर इतना बोल रहे थे। यह चालबाजी, यह धूर्तता मासूम नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई भी सांप्रदायिक बात मासूम नहीं होती। ऐसे लोग यह भी मानकर चलते हैं कि उनकी नफरत के ग्राहक परले दर्जे के बेवकूफ हैं जो कि इस जालसाजी को समझ नहीं पाएंगे। 

इस देश में भीड़ को हत्या का हक देने की शुरुआत हाल के बरसों में हुई। दर्जनों जगहों पर कहीं दलितों को मारा गया तो कहीं मुस्लिमों को। लेकिन मारने वाले बिना किसी अपवाद के हिन्दू रहे, और बाद में उनकी हिमायत में बड़े-बड़े बयान भी बड़े बड़े लोगों ने दिए। जम्मू में जिस मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक दस हिन्दू लोगों ने बलात्कार करके उसे मार डाला, उन मुजरिमों को बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर के हिन्दू भाजपाई मंत्री तक सड़कों पर उतरे, तिरंगे झंडे लिए हुए जुलूस निकाले गए। जिस देश में भीड़ के राज का इतना हिंसक सिलसिला शुरू किया गया, बढ़ाया गया, बचाया गया, उसके बारे में हमने बार-बार लिखा था कि मौके पर किया गया भीड़ का इंसाफ तभी तक सुहायेगा जब तक भीड़ के बीच कोई अपना ना फंसा हो। और वह दिन आ ही गया। जब देश में भीड़त्या की परंपरा शुरू कर दी गयी तो फिर एक न एक दिन यह तो होना ही था। आज भी नफरत के सौदागरों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि यह मौका मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का नहीं है। हिन्दू मारे, हिन्दू मरे, इसमें मुस्लिम क्या करे?

आज जो लोग देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतों से रोने-पीटने को कह रहे हैं, उनको समझना चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष ताकतें ही इतने बरसों से समझा रही थीं कि नफरत फैलाना बंद करो वरना किसी दिन यह आग दूसरे धर्मों को भी जला देगी, कातिलों के धर्मों को भी जला देगी, और महाराष्ट्र में अभी ठीक वही हुआ। देश में भीड़त्या की संस्कृति को भारतीय संस्कृति का दर्जा दिला देने वालों को अब भी समझ लेना चाहिए, वरना अगली भीड़त्या उनके घरवालों की भी हो सकती है, उन्हीं के धर्म वालों के हाथों।
-सुनील कुमार

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